
Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber
By Monica Gupta



By Monica Gupta
कई बार हम पूरा लेख लिख देते हैं पर उसका टाईटल समझ नही आता. कई बार टाईटल दिमाग में आ जाता है पर लेख क्या लिखे ये समझ के बाहर होता है. इस व्यंग्य को लिखने के बाद माथा पच्ची शुरु हुई कि क्या नाम दिया जाए. बहुत घोडे दौडाए पर जब बिल्कुल भी समझ नही आया तब टीवी चला लिया उन दिनों अब तक 56 फिल्म बहुत प्रचार मे थी. बस … मुझे भी नाम मिल गया … क्योंकि 35 व्यंग्य थे इसलिए नाम दे दिया “अब तक 35”
“अब तक 35” में मेरे लिखे 35 हास्य व्यंग्य हैं. ये मेरी चौथी किताब है. इसमें अधिकतर राष्ट्रीय समाचार पत्र जैसे “दैनिक भास्कर” के राग दरबारी कालम, “दैनिक जागरण “आदि तथा कुछ आकाशवाणी जयपुर और हिसार में प्रसारित हुए हैं. उन सभी को मिला कर इसे पुस्तक का रुप दिया है. सन 2009 में दिल्ली के शिल्पायन द्वारा प्रकाशित किताब में 103 पेज हैं.
उसी में से एक हास्य व्यंग्य आपके समक्ष है …
एक्सीडेंट हो गया ……!!!
जुल्फी मियां घबराए हुए चले आ रहे थे । चेहरा सुर्ख लाल, हाथ-पांव कांपते हुए मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि मियां, आज तो एक्सीडेंट हो गया . यार-दोस्त उनकी हालत देखकर घबरा गए । छोटू को चाय आर्डर किया और उन्हें कुर्सी पर बैठाकर खैर-खबर जाननी चाही कि आखिर हुआ कैसे कि इतने में सतीश बोल पड़ा, यार सड़क पर इतने गड्डें हैं, कोर्इ हाल है क्या, वहीं उलझ गए होंगे और एक्सीडेंट हो गया हेाना है ।
मनप्रीत ने अपनी राय रखी, ओये! तेनू की पता …. ऐ लोकल बसैं होन्दी हैं ना उसदे ऊपर लटक-लटक के जान्दें ने लौकी ……. मैं तां कहदां हां की जुल्फी मियां भी किसे बस इच लटक के जा रहे होंगे तैं उदैं विचों डिग पए होणगे ।
तभी रोनी ने टोका, हे मार्इप्री, मनप्रीत गुस्से से बोला, ओए नां ठीक लया कर … अंग्रेजी दा पुत्तर …….गल करदा है … मैंने बात गिड़ते देख उनकी सुलह करवार्इ और रोनी से पूछा तो उसने बताया कि वेरी सिम्पल, द ओनली रीजन इज मोबाइल यार ! पीपल टाक टू मच वार्इल ड्रार्इविंग, आर्इ थिंक दिस इस द ओनली रिजन आफ एक्सीडेंट ।
तभी तार्जन अपनी तातली आवाज में बोला, मु…….. मुझे पता है……… तोर्इ गाय तामने अचानक आ दर्इ होगी । औल तुल्फी मियां चलक पल गिल पले होंदे। तभी खुद को हीरो समझने वाला शहिद बोला, ओ कम ओन यार, यू नो, ये सब दोस्ती का चक्कर है । मोटरसाइकिल और स्कूटर या साइकिल चलाते समय एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं और गाना गाते सड़क पर अपना दुपहिया भगाते हैं । आर्इ थिंक, दिस इज द रिजन, फ्रेंडस ।
तभी कमल हकलाता हुआ बोला …..त ….त……त…..तुम…..स…. सब गलत हो…….! इ…….इतना ….स…. स….. सारा काफिला च…. च….. चलता ……. है ……. ब …..ब ….बस ……. किसी …….. ग….. ग….. गाड़ी…… ने ठोक दि…. दि…. दिया होगा ! बे…. बे…. बेचारे ….. जु….. जु…. जुल्फी मियां ……..! तभी मेरा ध्यान जुल्फी मियां की तरफ गया । चाय उनके हाथ में ज्यों की त्यों रखी थी और चाय में काली मलार्इ जम चुकी थी ।
किसी गहरी सोच में डूबे जुल्फी मियां ने फिर बताया कि उनका एक्सीडेंट हो गया । मैंने भी पूछा क्या कोर्इ शराब पीकर गाड़ी चला रहा था जो उसने टक्कर मार दी । उन्होंने न की मुद्रा में सिर हिलाया । इसी बीच में छोटू गर्म चाय का नया गिलास देकर चला गया था । मैंने फिर पूछा कि कहीं बंद फाटक के नीचे से तो नहीं निकल रहे थे कि ट्रेन आ गर्इ हो । उन्होंने फिर से न की मुद्रा में सिर झटक दिया । हम सब हैरान परेशान हो चुके थे पर जुल्फी मियां हमारी किसी भी बात से सहमत ही नहीं थे । हम आपस में बातें करने लगे कि आजकल बस या जीप के ड्रार्इवर के पास लाइसेंस तो होता नहीं है बस ड्राइवर बन जाते हैं और छोटे-छोटे बच्चे धड़ल्ले से स्कूटी, कार, मोटरसाइकिल चलाते हैं ।
तभी जुल्फी मियां ने चाय का गिलास मेज पर रखा और चिल्लाते हुए बोले नहीं, अम्मा यार, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । वो तो ….. वो तो….. राह से गुजरते वक्त चश्मेबददूर बानो हमें मिल गर्इ थी । हमारी उनसे और उनकी हमसे ….नजरें इनायत हुर्इ… और फिर चार हुई … बस समझो कि ऐसा एक्सीडेंट हुआ कि….. बस…..!! ये कहते हुए खुदा हाफिज करते हुए, मुस्कुराते हुए बाहर निकल लिए और हम सब अपना सिर पकड़ कर बैठ गए ।
कैसा लगा ??? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है … 😆
By Monica Gupta

जवाब लाजवाब
उफ़………….. इनकी हाजि़र जवाबी
हाजिरजवाबी अनूठी कला है, जब इसमें हास्य व्यंग्य का मिश्रण हो जाए तो मजा दुगुना हो जाता है और अगर यह हास्य व्यंग्य विश्व प्रसिद्ध हस्तियों का हो तो कहना ही क्या……..।
इस लेख में हम कुछ विश्व प्रसिद्ध हस्तियों के चुटीले अंदाजो से आपको रूबरू करवा रहे हैं।
सरोजनी नायडू
भारत कोकिला सरोजनी नायडू को कौन नही जानता। एक प्रखर राजनैतिक कार्यकर्ता, संवेदनशील कवयित्री और देश की स्वतंत्रता ही जिनका उददेश्य था। वो समय-समय पर हल्की-फुल्की टिप्पणियाँ करने से बाज नही आती थी। एक बार वो किसी सम्मेलन में गर्इ। वहाँ फोटो खीचने के लिए फोटोग्राफरों की लार्इन लग गर्इ। तब उन्होनें उनसे कहा, चलो भर्इ, जल्दी करो। मैं सब ओर से एक जैसी ही हूँ, मोटी और गोल-मटोल।
मार्च 1947 में जब वो प्रथम एशिआर्इ संबंध सम्मेलन के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित की गर्इ तो हाल खचाखच भरा हुआ था। वो उठी। भीड़ का जायजा लिया और बोली कि इस अपार भीड़ को देखकर मैं इतनी भावुक हो उठी हूँ कि मेरे मुहँ से आवाज ही नही निकल पा रही है। किसी महिला के मुहँ से आवाज ना निकलना कोर्इ मामूली बात नही है।
एक बार एक राजनैतिक कार्य के सिलसिले में गोपाल कृष्ण खोखले श्यामवर्णी नायडू से मिले और सोचा कि उनके रंग पर उन्हें खिजाया जाए। अत: उन्होने मुस्कुराते हुए चुटकी ली, क्या आप मृत्यु के इतनी निकट पहुँच गर्इ हैं कि उसकी परछार्इयों ने आपकी ऐसी रंगत बना दी है। सरोजनी उनका मतलब समझ गर्इ। मगर वह बिल्कुल नही झिझकी और हँस कर बोली, नहीं मैं जीवन के इतने निकट आ गर्इ हूँ कि उसकी तपिश ने मुझे झुलसा दिया है।
विनोबा भावे
विनोबा भावे ने स्वयं को निर्धनों और शोषितो से जोड़े रखा। उन्होनें भूदान आंदोलन के जरिए सामाजिक सुधारो को नर्इ दिशा दी। सौम्य और मृदुभाषी विनोबा अपनी नपी तुली टिप्पणियों की बदौलत स्वयं को विवादो से दूर ही रखते थे। एक बार कुछ पत्रकार विनोबा जी का साक्षात्कार लेने उनके आश्रम गए। विनोबा जी ने उनका सत्कार किया और पत्रकारों के प्रश्न का जवाब देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उन्होंने माँग रखी कि पहला प्रश्न वो पूछेंंगें। पत्रकार सोचने लगे कि आखिर विनोबा जी के मन में क्या है। तब विनोबा ने उनसे पूछा कि वो किस भाषा में अपने दिए गए प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करतें हैं। पत्रकार जानते थे कि आचार्य भाषाविद हैं। उन्होनें निश्चय किया कि भाषा के चयन का निर्णय वे खुद ही लें। पर सभी पत्रकार जड़वत रह गये जब आचार्य ने उत्तर दिया कि उनकी नजर में सर्वोतम भाषा मौन भाषा है। और शांत भाव से आश्रम में टहलने लगे।
सर सी.वी. रमन
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सर सी.वी. रमन को कौन नही जानता। उन्होनें प्रकाश के संगठन और व्यवहार पर नया सिद्धांत खोज निकाला, जिसे रमण प्रभाव के नाम से जाना गया। इस विशिष्ट खोज की 25वीं जयंती के अवसर पर वो पैरिस गए हुए थे। वहाँ कुछ फ्रांसीसी वैज्ञानिको ने इस मौके पर भव्य समारोह का आयोजन किया। वर्दी में सजे-धजे बैरे अतिथियों को मनपसंद पेय पेश कर रहे थे। एक बैरा रमण के पास आया और उसने शैम्पेन भरे गिलासो की ट्रे उन की ओर बढ़ा दी लेकिन रमण ने उसे नही लिया। बार-बार उन्होनें विनम्रता से इंकार किया कि वह पीते नही है लेकिन फिर सोचने लगे कि उन्हें इस इंकार का कोर्इ कारण अवश्य बताना होगा। इसी उधेड़बुन में लगे थे कि जल्दी ही उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया। उनके पास खड़ी एक महिला ने अपने साथी को बताया कि यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सी.वी. रमण हैं। यह रमण प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। बस, यह बात सुनकर जो दोस्त उन्हें पीने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, वह उनकी ओर मुडे़ और बहुत सौम्यता से बोले, मित्रों, आपने अल्कोहल पर रमण प्रभाव अवश्य देखा होगा पर मैं आपको रमण पर अल्कोहल प्रभाव देखने का अवसर कभी नही दूँगा। उनके इस विनोदपूर्ण जवाब से लोगों में हँसी के फव्वारे फूट गये।
अल्बर्ट आइंस्टीन
अल्बर्ट आइंस्टीन भौतिकी के क्षेत्र में हुए सभी आधुनिक विकासों के श्रेय के हकदार हैं। अपने बारे में उन्होंनें कुछ पत्रकारों और फोटोग्राफरों के बारे में कहा कि वो अजायब घर में रखने लायक वस्तु हैं। वह मुख्यधारा से छिटक कर बाहर गिर गए हैं। फोटोग्राफरों द्वारा विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें खींचने के बाद उनसे उनके व्यवसाय के बारे में पूछा गया तो उन्होंनें तपाक से जवाब दिया कि वो तो माड़ल का काम ही कर रहें हैं, तरह-तरह के पोज़ में फोटो खिचवा कर। उनसे जब उनकी खोज के बारे में जनप्रतिक्रिया की राय पूछी गयी तो उन्होंनें कहा कि अगर मेरा सिद्धांत सफल रहा तो जर्मन दावा करेंगें कि मैं एक जर्मन हूँ। और सिवस कहेंगें कि मैं एक सिवस हूँ। किन्तु यदि असफल रहा तो सिवस कहेंगें कि मैं जर्मन हूँ और जर्मन कहेंगें कि मैं एक यहूदी हूँ।
एक बार आइंस्टीन के बेटे ने उनसे पूछा कि वो इतने प्रसिद्ध कैसे हैं। इस पर उन्होंनें कहा कि बेटे, एक बार एक अंधा कीड़ा फुटबाल पर चलने कि कोशिश कर रहा था उसे यह नही मालूम था कि वो गोल है। मगर इस मामले में मैं भाग्यशाली निकला, यह बात मेरे ध्यान में आ गर्इ।
एक बार आइंस्टीन ने फोटोग्राफर ए.डब्लयू रिचडऱ्स से मजाक में कहा मुझे अपने चित्रों से नफरत है। यदि इनकी वजह न होती…….. फिर अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले कि इनकी वजह न होती तो वो………. एक औरत नज़र आते।
जवाब लाजवाब
अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग
पेनिसलिन की खोज के लिए प्रसिद्ध अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग मितभाषी व्यकित थे। एक बार वो बंदरगाह के निकट होटल में ठहरे जहाज को पानी में तैरते देख रहे थे। उन्हें वो दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन भूख तेज़ लगने के कारण वो भोजनकक्ष की ओर चल पड़े। तभी सामने से दो पत्रकार आ रहे थे। उन्होंनें अदब से नमस्ते करके यह पूछना चाहा कि जब एक महान वैज्ञानिक नाश्ते के लिए जा रहा हो तो उसके मन में क्या विचार उमड़ते हैं। फ्लेमिंग ने भी अपनी मुद्रा गम्भीर कर ली और बोले कि विचार तो बहुत उमड़ते हैं। पत्रकार भी अपने पैन लेकर तैयार हो गए कि शायद कोर्इ ऐसी बात सुनने को मिले जो कल की सुर्खियाँ बन सकें। फ्लेमिंग ने कहा कि वो वाकर्इ में इस समय विशेष बात ही सोच रहा हूँ। यह खबर आपके लिए किसी वरदान से कम नही होगी……..। लेकिन जल्दी ही उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। उत्तर मिला, मैं एक विशेष बात सोच रहा हूँ कि मैं नाश्ते में कितने अंडे़ खाँऊ……… एक या …… दो………
जवाब लाजवाब
By Monica Gupta

प्रसन्न हुए भगवान
गाँव में साधु बाबा पधारे हुए थे। उन्होंने गाँव वालों के मन में यह बात ड़ाल दी थी कि मुझे भगवान ने भेजा है। वह तुम सभी से नाराज है। इसका प्रमाण भी दिखाया कि जब वह पूजा के लिए कच्चा दूध रखतें हैं तो वह स्वयं उबलने लगता है।भोले-भाले गाँव वाले उनकी बातों में आ गए। बाबा की तो चांदी हो गर्इ। वह दोनों हाथों से धन लेने लगे बहुत से लोग बाबा की सेवा भी करने लगे किसलिए? अरे भार्इ। भगवान का गुस्सा कम करने के लिए दान, दक्षिणा और सेवा का काम जरूरी था।
समय बीतता रहा। लेकिन हर रोज कच्चे दूध में उबाल आता रहा और बाबा कहते भगवान अब भी नाराज है, दान बढ़ाओ। बहुत दिन बीते बाबा वहाँ से जाने की सोचने लगे कि रूपया खूब इक्ठ्ठा हो गया अब खिसका जाए बहुत बुद्धु बना लिया यहाँ के लोगों को।
एक दिन बाबा के यहाँ झाड़ू-बुहारी करने वाले चंदू ने सफार्इ के दौरान एक थैले में ढ़ेर सारा चूना देखा। उस नासमझ ने सोचा शायद कोर्इ गलती से यहाँ रख गया होगा। भला चूने की डलियां बाबा के किस काम की। यह सोच कर वह दीवारों पर पुतार्इ करने के लिए उसने तुरन्त वो चूना भिगो दिया। पर यह क्या ? पानी में से तो बुलबुले उठने लगे। पहले तो उसने सोचा कि वह भगवान की ही नाराजगी है पर बाद में उसने सोचा कि चूना गरम होता है बुलबुले या भाप तो उठेगी ही।
अब चन्दू को बाबा की पोल समझ आ रही थी। वह समझ गया था कि चूना, बाबा ने अपनी कुटिया में क्यों रखा ? उसने असल में कुछ चीजें ताप या उष्मा क्रियाए करती है। कुछ उष्मा शोषी होती हैं। जिस कारण पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि चूना उष्माक्षेपी है वह पानी के संयोग कर उष्मा देता है। चूने की डलिया पानी में डालने पर भाप निकलना इसका उदाहरण है। अब रही बात दूध उबलने की तो उस दूध में उपसिथत पानी से कि्रया कर उष्मा निकालता है और दूध उबलता हुआ प्रतीत होता है।
हर शाम की तरह इस शाम को भी बाबा की कुटिया के आगे भारी भीड़ जमा होने लगी यह जानने के लिए कि भगवान अभी प्रसन्न हुए या नाराज ही चल रहे हैं। पूजा का समय हो चला था, बाबा ने पूरी कुटिया छान मारी पर उन्हें कही चूना ही नहीं मिल रहा था। उन्होंने सोचा कि आज मैं गांव वालों को कच्चे दूध से ही पूजा करवा देता हूँ, कह दूँगा भगवान खुश हो गए और मैं यहाँ से किसी दूसरे गाँव चला जाऊँगा। पर लालच का क्या करते ? बाबा ने सोचा यहाँ तो इतना पैसा, सोना, चांदी मिल रहा है। दूसरे गाँव में मिले ना मिले। वह सोच ही रहे थे तभी उन्हें बाहर से कुछ आवाजें आती सुनार्इ दी। वो बाहर आए तो चंदू लोगों को कुछ बताकर पूजा करवा रहा था। उसने गाँव वालों को बतालाया कि किस तरह बाबा हमारी आंखों में धूल झोंक कर कच्चे पानी मिले दूध में चूने की ड़लियां ड़ालते रहे। और हमें यह कुछ ही देर में उबलता हुआ दिखने लगता।
पोल खुल चुकी थी। चारों तरफ से बाबा घिर चुके थे। मरता क्या न करता उन्होंने अपनी गलती मान ली और मुझे पुलिस के हवाले ना किया जाए यह हाथ जोड़कर निवेदन करने लगे। गाँव वालों को दया आ गर्इ।
गाँव वालों ने सारा पैसा, सोना, चाँदी, जवाहरात लौटा देने पर बाबाा को माफी दे दी और उसे गाँव से निकाल दिया गया। आखिर कुछ गलती तो उनकी भी थी। इस तरह अंधविश्वास में जीना भी तो गलत है।
By Monica Gupta

नारियल का फैसला – ( बाल कहानी) टोने टोटके , पाखंड के खिलाफ पोल खोलती कहानी है नारियल का फैसला. भारतीय संस्कृति में नारियल को बहुत पवित्र माना जाता है… नारियल का फैसला क्या लिया ये जानने के लिए पढनी होगी कहानी
आज दोपहर ही गांव से दादी अम्मा का तार आया है। उसमें लिखा था कि दादी बीमार है, तुरन्त चले आओ. तार पढ़ने के बाद मनोज के पापा का मन दफ्तर में नहीं लगा।
वह तुरन्त ही दो-तीन दिन की छुट्टी लेकर मनोज और अपनी पत्नी मनीषा के साथ गांव रवाना हो गए। रास्ते भर वह सोचते रहे कि अम्मा को शहर ले आएंगे। यहीं उनका इलाज करवाएंगे। तीन घंटे में वह गांव पहुंच गए।
वहाँ अड़ोसी-पड़ोसी इकटठे हुए थे। गांव की यही बात अच्छी है कि एक-दूसरे का सब बेहद ख्याल रखतें हैं। दादी के घर पहुंचे तो देखा, दादी बैठी हुर्इ थी। वह बहुत ही परेशान दिख रही थी। पापा ने उन्हें हाथ लगा कर देखा पर वह गर्म नहीं था।
मनोज के पापा ने राहत की साँस ली। दादी अम्मा के पड़ोसी छाछ ले आए। थोड़ा रूक कर मनोज के पापा ने पूछा, अम्मा बुखार कब उतरा? अम्मा बोली बुखार तो था ही नहीं। पर अब चढ़ेगा। मनोज के पिता हैरान रह गए।
लेकिन वो तार भिजवाया था आपने ? पापा बोले। हाँ, भिजवाया तो था, तुझे जो बुलवाना था। इसलिए भिजवाना पड़ा। अम्मा रूआंसी होकर बोली। मनोज के साथ-साथ उसके मम्मी-पापा को दाल में कुछ काला लगा। उन्होंने पूछा, भर्इ, बताएं ना आखिर क्या बात है?
तभी गांव के सरपंच दीनू काका बोले, बेटे बात ये है कि हमारे गांव में एक साधु महाराज पधारे हैं और अम्मा भी उनके दर्शनों के लिए गर्इ थी। अब बात यह है कि किस व्यक्ति का और किसके परिवार का भविष्य उज्ज्वल होता है ? यह सब बाबा एक नारियल देकर ज्ञात कर लेते हैं। क्या नारियल से?
मनोज के मम्मी-पापा ने उत्सुकता से पूछा। मनोज की मम्मी को भी ऐसे जादुर्इ बाबा के किस्से बहुत अच्छे लगते थे। तब दीनू काका ने बताया कि, बाबा एक नारियल लेने को कहते हैं। वहां बहुत से नारियल रखे होते हैं।
जिस नारियल को हम हाथ लगाते हैं, बाबा उसे खोलते हैं। अब अगर उसमें से फूल निकले तो उसका तथा उसके परिवार का जीवन खुशहाल रहता है पर जिस नारियल में आग लग जाती है, उसके परिवार का नाश हो जाता है।
बस, अम्मा तीन बार से बाबा के पास नारियल दिखवाने जा रही है और हर बार नारियल में आग निकल रही है। अम्मा को वहम हो गया कि उनके परिवार पर जरूर मुसीबतें आने वाली हैं। इसलिए उन्होंने आप सभी को तार देकर बुलवाया है।
मनोज की मम्मी को चिंतित हो गर्इ पर मनोज समझदार बालक था। वह जिस विधालय में पढ़ता था, वहां उनको यह शिक्षा भी दी जाती थी कि ढ़ोंगी साधु कैसे भोली-भाली जनता को लूटते हैं, उसे पता था कि उस बाबा ने क्या पाखंड किया होगा।
अगले दिन मनोज और उसके मम्मी-पापा तथा दादी सब उसी दरबार में गए। मनोज ने कहा, इस बार नारियल वो ही उठाएगा। बाबा के दरबार में खूब भीड़ थी। गांव वाले बाबा पर खूब चढ़ावा चढ़ा रहे थे। चारों तरफ जबर्दस्त धूप की खुशबू फैली हुर्इ थी।
मनोज अपने साथ एक नारियल लेकर गया और बाबा से बोला, बाबा मेरा भविष्य बताइए। बाबा ने उसे ड़ांटा, मूर्ख, तू हमारा अपमान करता है, सिर्फ हमारे द्वारा रखे नारियल से ही भविष्य बताया जाएगा क्योंकि ये पूजा किए गए नारियल हैं। तब उसने अपना नारियल अपने पापा को दे दिया और बाबा द्वारा रखे नारियल में से एक नारियल उठा लिया। मनोज नारियल उठाते ही उसे सूंघने लगा।
अब बाबा कुछ सकपकाए। बोले, मूर्ख, नारियल क्यों सूंघता है? मनोज बोला, बाबा मैं परिवार की सुख-समृद्धि वाला नारियल चाहता हूँ। इसलिए आपको ऐसा ही नारियल सूंघ कर दूंगा, जिसमें हमारे परिवार का कल्याण हो।
भीड़ के सभी लोग सकते में आ गए। पूरी भीड़ में खामोशी सी छा गर्इ। बाबा भी कुछ परेशान हो गए। मनोज ने एक नारियल हाथ में लिया और बोला , बाबा, आप इसे खोलें , इसमें अवश्य ही फूल होंगें। बाबा ने उसे हाथ में लेकर पानी के कुछ छींटे देकर उसे पवित्र कर कुछ मंत्र पढ़े और जब उसे खोला तो उसमें फूल निकले।
क्यों, दादी माँ, अब तो कोर्इ बीमार नही पड़ेगा, देखो, अब फूल निकला है नारियल में।
बाबा को पोल खुलती नज़र आर्इ। उन्होंने शिष्यों से कहा कि आज उनकी तबियत ठीक नहीं है। अब वह दरबार कल सुबह लगाएंगे। लेकिन अब पासा पलट चुका था। बाबा को स्टेज पर जबर्दस्ती रोककर मनोज ने बताना शुरू कर किया, आमतौर पर साबुत नारियल के सिर पर तीन काली बिन्दी बनी होती है।
बस थोड़ी सी सावधानी से, इसमें से एक बिन्दी में छेद करके छोटी सी फूलों की 2या 3 कलियां नारियल में ड़ाल दी जाती हैं। करीब सात घण्टे पहले ही और फिर छेद को आराम से बंद कर दिया जाता है। ये तो बात रही कि नारियल में फूलों के निकलने की। अब बात बची है नारियल में आग लगने की।
तो होता यूं है कि नारियल के बालों या जटाओं में सोडियम के बहुत ही छोटे छोटे टुकड़े जो तेल से भिगो कर निकाले जाते हैंं। उन्हें इसमें छिपा कर रख देतें है और जब आप लोग नारियल चुन कर देतें हैं तो बाबा, उसमें जल छिड़क कर उसे शु़द्ध करते हैं, जो कि एक बहाना ही है।
असल में, होता यह है कि केरोसिन युक्त सोडियम धातु पर पानी डलते ही वह जलने लगती है। बस, बाबा कह देते हैं कि परिवार पर कष्ट आएगा और वो भोली-भाली जनता से धन, गहने, जमीन आदि खूब ऐंठते हैं। क्यों बाबा, मैंने सब ठीक कहा ना। अगर कुछ भूल गया हूँ तो बता देंं।
मनोज ने अपनी बात पूरी की। बाबा सिर झुकाए बैठे रहे। उनकी पोल खुल चुकी थी। ये कुछ और नही बस जादू की ट्रिक्स ही थीं उनके पास सारे गहने, रूपया, जमीन आदि वापिस करने के अलावा कोर्इ दूसरा रास्ता नहीं था। चारों तरफ मनोज की जय-जयकार होने लगी। दादी तो एकदम हक्की-बक्की सी बैठी ही रह गर्इ। वो बहुत खुश हुर्इ कि ढ़ोंगी को सबक मिल गया।

नारियल का फैसला
नारियल का फैसला कहानी आपको कैसी लगी … ???
By Monica Gupta

झंडा उंचा रहे हमारा
हमारा तिरंगा
बच्चों, मैं भारत की शान हूँ। तीन रंग लिए मैं सभी को निराला और मन भावन लगता हूँ। पता है, मैं हूँ कौन? जी हाँ, मैं हूँ भारत देश का ध्वज, यानि झण्ड़ा।
जब भी आप मुझे लहराते-फहराते देखते होंगे तो आपके मन में विचार जरूर उठता होगा कि आखिर मेरा जन्म कब कहाँ और कैसे हुआ। आज मैं आपको अपने सफर की कहानी सुनाता हूँ। मेरा रूप जैसा आप आज देखते हैं ऐसा नहीं था। मुझमें समय-समय पर बहुत बदलाव आए पर अब मेरी पहचान बन चुकी है। विदेशों में अनेक झण्ड़ों के बीच में मैं शान से इठलाता हूँ। पता है, 29 मर्इ, 1953 को मैं एवरेस्ट पर लहरा रहा था। मेरी कहानी कोर्इ एक दिन या एक समय की छोटी सी कहानी नहीं है। मेरा मस्तक ऊँचा रखने के लिए हजारों वीर सैनिकों ने बलिदान दे दिया। अपना खून पानी की तरह बहा दिया पर मेरी शान कम ना होने दी।
आपने रामायण या महाभारत तो जरूर पढ़ी होगी। उस समय की पताका या झण्ड़ा यानि मैं लम्बे त्रिभुज आकार में था। मेरे ऊपर भगवान सूर्य का चित्र अंकित रहता था। लंका में भी अलग प्रकार का झण्ड़ा फहराया जाता था। संस्कृत में भगवान विष्णु की पूजा में लिखे एक श्लोक को गरूड़ ध्वज कहा गया जबकि गीता में अर्जुन के ध्वज को कपि ध्वज के नाम से जाना गया। समय-समय मेरे रूप में परिवर्तन आता रहा। अंग्रेज़ी राज्य द्वारा स्थापित सरकारी भवन व मुख्य स्थानों पर यूनियन जैक फहराने लगा। बीसवीं सदी के शुरू में जब देशवासियों की कुछ आँखें खुली। अंग्रेज़ी अत्याचारों से जनता तंग आ चुकी थी। पता है, भारत का पहला झण्ड़ा 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौराहे पर फहराया गया। तब मुझमें तीन रंग लाल, पीला और हरा थे। लाल रंग वाले भाग में आठ सफेद कमल थे। बीच वाले पीले रंग पर नीले रंग में वन्देमातरम लिखा था। नीचे हरे भाग पर बायीं तरफ सफेद सूर्य और दायीं ओर आधे चन्द्रमा के बीच एक तारा बना हुआ था।
मैड़म कामा के दिमाग में देश के लिए झण्ड़ा तैयार करने का विचार आया। जो झण्ड़ा उन्होंने बताया उसमें केसरिया, सफेद तथा हरा रंग रखा गया। पता है, केसरिया भाग में कमल तथा सात नक्षत्र थे। वन्देमातरम को विशेष लोकप्रियता मिली हुर्इ थी। बंकिम चन्द्र चटर्जी जोकि बगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे उन्होंने वन्देमातरम की रचना 1882 र्इ0 में की थी। समय धीरे-धीरे चल रहा था कि अचानक जलियाँवाला बाग के घटनाक्रम ने मेरा रूप ही बदल दिया। सन 1923 में झण्ड़े रंग-रूप, आकार का ध्यान रखा गया। मेरी लम्बार्इ और चौड़ार्इ में तीन और दो का अनुपात रखा गया। तीन रंग लाल, हरा, तथा सफेद रखा गया। सफेद रंग पर चरखे को अंकित किया गया। मुझ पर चरखा इस कारण लगाया गया क्योंकि गाँधीजी स्वदेशी प्रचार कर रहे थे। खददर को उस समय विशेष मान्यता दी गर्इ थी। सिर्फ चरखा ही लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकता था। इसलिए चरखे को मुझ पर अंकित करवाने की विशेष मान्यता मिली। अभी बात कुछ बननी शुरू ही हुर्इ थी कि सन 1923 में मर्इ महीने में नागपुर के वासी ने रोक दिया। बस तब काफी कहा-सुनी हुर्इ और झण्ड़ा सत्याग्रह का आरम्भ हो गया। 18 जुलार्इ 1923 को झण्ड़ा सत्याग्रह दिवस मनाने की घोषणा हो गर्इ थी और पता है इस आन्दोलन के कर्णधार कौन थे- लौह पुरूष सरदार वल्लभ भार्इ पटेल।
मेरे बारे में अनेको गीत लिखे गए जो उन लोगों के लिए प्रेरणा बने जो चाहते थे कि भारत आजाद हो, स्वतंत्र हो। समूचे राष्ट्र का एक ही लक्ष्य बन गया था कि यूनियन जैक के स्थान पर जब मैं फहरूंगा वही दिन हमारा सर्वश्रेष्ठ दिवस होगा। वीरों की मेहनत रंग लार्इ। 26 जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने की परम्परा पणिड़त जवाहर लाल नेहरू द्वारा आरम्भ की गर्इ। फिर मुझमें काफी बदलाव आए। चरखे का रूप छोटा कर दिया गया। हर रंग विशेष सूचक बना दिया गया। सन 1933 र्इ0 में मुम्बर्इ में एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि मेरा रंग तिरंगा ही होगा और 3 गुणा 2 का आयताकार होगा और मेरे तीन रंग भगवा, श्वेत तथा हरा होगा। 30 अगस्त,1933 र्इ0 का दिन ध्वज दिवस के रूप में मनाया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी यह साबित कर दिया कि राष्ट्रीय ध्वज ही किसी देश के गौरव का चिन्ह है और मेरा सम्मान ही देश का सम्मान है।
22 जुलार्इ 1947 र्इ0 को मुझे नया रूप प्रदान किया गया। अनुपात भी पहले वाला था, रंग भी तीन थे किन्तु सफेद रंग पर बने चरखे के स्थान पर चक्र अंकित कर दिया गया। यह चक्र सारनाथ के स्तम्भ से लिया गया जोकि लगभग ढ़ार्इ हजार से भी पहले अशोक ने बनवाया था। इसी स्तम्भ के ऊपर बनी शेरों की त्रिमूर्ति राज्य चिन्ह के रूप में स्वीकार की गर्इ।
चक्र में चौबीस रेखाएं हैं। इनका अभिप्राय चौबीस घण्टों से बताया गया है। दिन-रात, चौबीस घण्टे हम अपने कार्यों में लगे रहे यही प्रेरणा हमें चक्र देता है। दूसरी ओर चक्र का अर्थ हम गतिशीलता से भी लगा सकते हैं। जहाँ एक ओर सफेद रंग को विद्वानों ने सादा जीवन उच्च विचार का प्रतीक माना है वहीं हरा रंग विश्वास का प्रतीक है जोकि मनुष्य की अनिवार्य अच्छार्इ है। हरियाली को भी हरे रंग में माना गया है। मुझ में हरे रंग को इसलिए भी स्थान मिला है क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। केसरिया रंग की प्रेरणा से ही वीरों में, नौजवानों में त्याग और बलिदान की ललक बढ़ी थी।
सच, मैं किसी राज्य या वर्ग का ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का हूँ। मैं जहाँ भी लहराऊंगा उन सभी को स्वतंत्रता, प्रेम और भार्इचारे का सन्देश देता ही रहूंगा।
झण्ड़ा ऊंचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
जय हो जय हो जय हो

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