Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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September 24, 2015 By Monica Gupta

सोशल मीडिया और हम

 

social media photo

 

सोशल मीडिया और हम

शोशा सोशल मीडिया का ….

सोशल बनाया … सोशल बनाया … सोशल बनाया आपने … !!!

वैसे एक बात तो माननी पडेगी कि फेसबुक या अन्य सोशल नेट वर्क ने हमें बहुत एक्टिव बना दिया है. पहले जब कोई त्योहार होता तो पापा  या घर के बडे लोग अक्सर कन्नी काटते थे कि मैं जाकर क्या करुगां तुम लोग ही हो आओ.  वही  अब जब से सोशल नेट वर्क सक्रिय हुआ है  पापा लोग खुद जाना पसंद करने लगें हैं और मम्मी  जो हर में कोई भी त्योहार साधारण  घरेलू साडी मे त्योहार मनाती  अब पूरा सज धज के तैयार होकर इसे मनाती है और सभी सपरिवार फोटो खिचवाने के लिए आगे आते हैं इतना ही  नही बच्चे भी चाह्ते है कि  उनकी पूरी फैमिली की तस्वीर हो  इसलिए घर के दादा दादी, नाना नानी बुआ, चाचा सभी मिल कर मनाए ताकि फेसबुक पर ज्यादा  से ज्यादा कमेंटस बटोर सकें  और कोशिश  यही रहती है कि फटाफट फोटो अपलोड कर दें चलिए , इसमें बुरा क्या है … इसी बहाने से ही सही … सब एक तो हो जाते हैं इसलिए थैक्स यू है जी फेसबुक और  अन्य सोशल नेट वर्किंग साईटस का  !!

सोशल बनाया … सोशल बनाया … सोशल बनाया आपने … !!!

सोशल मीडिया और हम

September 24, 2015 By Monica Gupta

गूगल सर्च और कार्टून

गूगल सर्च और कार्टून

आज गूगल सर्च मे मेरे बनाए कुछ दिखाई दिए. बहुत अच्छा लगा …

गूगल सर्च और कार्टून ((मोनिका ग़ुप्ता)

गूगल सर्च और कार्टून ((मोनिका ग़ुप्ता)

September 24, 2015 By Monica Gupta

फेसबुक मित्र

facebook friend photo

 

फेसबुक मित्र

कुछ देर पहले गेट पर घंटी बजी. एक लडकी थी उसने बताया कि वो पीछे वाली कालोनी मे काम करती हैं. निशा दीदी ने भेजा है. मैं खुश हो गई कि शायद नई काम वाली बाई मुझे मिल गई. मैं जैसे ही कुछ बोलने को हुई वो बोली दीदी ने बताया कि आप फेसबुक करती रहती हो. उनका वाई फाई नही चल रहा. आप जरा मेरे दो तीन कमेंट कर दोंगें और फोटो भी बदलनी है.

मैने बाहर जाने का बहाना बना दिया और मना कर दिया. फिर निशा को फोन करके सारी बात पूछी तो वो बोली कि इस काम वाली ने दुखी कर रखा है खुद तो लिखना आता नही english मे… मुझसे ही लिखवाती है शुरु शुरु में तो मुझे बुरा नही लगा अब तो काम छोड कर बैठ जाती है और कभी इस पर कमेंट कभी इस पर लाईक, कभी उसकी यहां फोटो खीचों कभी वहां … इसलिए अब वो उसके आते ही वाई फाई बंद कर देती है … !!

हे भगवान !!! फेसबुक पर भी कौन कैसा है कुछ पता नही चलता … हम समझते कुछ और हैं और निकलता कुछ और !! वैसे आपने तो देखभाल के ही फेसबुक मित्र बनाए होंगें … है ना ??? क्या पता वो भी आपकी फ्रेंड लिस्ट मे … !!! जिसके कमेंट उसकी मालकिन ….. !!!

फेसबुक मित्र के बारे मे आपका कोई अनुभव हो तो जरुर बताईगा !!

September 24, 2015 By Monica Gupta

रक्तदान सोशल मीडिया और हमारे दायित्व

रक्तदान सोशल मीडिया और हमारे दायित्व

रक्तदान सोशल मीडिया और हमारे दायित्व  – सबसे पहले मैं आप सभी से यह जानना चाहूगीं कि अपनी बात को दूसरो तक पहुचाने के कौन कौन से साधन होते हैं. फोन, मोबाईल , कम्प्यूटर, अखबार, टीवी…

जी बिल्कुल, और इसके साथ साथ एक और है और वो है किसी महिला को बता दें यानि tell a women    बात अपने आप दूर बहुत दूर तक चली जाएगी.

मोनिका गुप्ता

मोनिका गुप्ता

 रक्तदान सोशल मीडिया और हमारे दायित्व

डाक्टर इटेलिया ने मुझे महिला होने के नाते अपनी बात कहने का मौका दिया मैं उनका बहुत धन्यवाद करती हूं.

तो बात हो रही है महिलाओ की. आज हर क्षेत्र मे महिलाए आगे हैं. अगर रक्तदान की बात करें तो महिलाएं उसमे भी आगे हैं. बढ चढ कर आगे आती है पर जब होमोग्लोबिन चैक होता है तो नतीजा शून्य. अगर सौ महिलाए भी रक्तदान के लिए आती हैं तो मात्र 5 या 7 ही रक्तदान कर पाती हैं बाकि एनिमिक होती हैं. अक्सर रक्तदान कैम्प में यह देखने को मिल ही जाता है और अगर आकंडो की बात करे तो दुनिया भर में 818 मिलीयन महिलाएं एनीमिया की मरीज हैं और जिसमे से 520 बिलीयन एशिया की महिलाएं हैं.

अखबार में आए एक सर्वे से यह पता लगा है कि  देश की आधी महिलाए और 70% बच्चे एनीमिक है. उतर प्रदेश, बिहार, उडीसा, राजस्थान  और झारखंड  में तो हालत और भी ज्यादा खराब हैं.

ये एक कडवा सच है जिसे हमे स्वीकार करना ही पडेगा कि रक्तदान को लेकर जितनी जागरुकता आनी चाहिए वो नही आ पा रही है.

उफ!! महिलाए! बच्चे !!! कडवा सच !!!

वैसे कडवा सच पर एक प्रसंग भी याद आ रहा है. आप कहें तो मैं सुनाऊ. एक आदमी की पत्नी की मृत्यु हुई और उसने दूसरे शादी कर ली. उसका छ साल का एक बेटा था. शादी के कुछ समय बाद उसने अपने बेटे से पूछा कि नई मां कैसी लगी. इस पर बेटा बोला कि नई मां सच्ची है और पहले वाली मां झूठी. यह सुनकर पिता को हैरानी हुई. उन्होने जिज्ञासा वश पूछा कि वो कैसे तब बेटे ने बताया कि पहली वाली मां जब वो शरारत करता तो वो डाट्ती और गुस्से मे कहती कि खाना नही देगी. पर थोडी देर बाद गोद मे बैठा कर प्यार से पुचकार कर वो खाना खिलाती. नई मां भी उसकी शरारत पर यही कह्ती है गुस्सा होती है और कहती है कि वो खाना नही देगी और वो सच बोलती है वाकई में,  वो खाना नही देती आज दो दिन हो गए मुझे खाना नही दिया.

बच्चे ने सच बोलना पर उसे सुनना और निगलना मुश्किल हो गया है ना !!

तो बात हो रही थी कडवे सच की. सोचने की बात यह है कि ऐसा क्या करें!!! ऐसा क्या तरीका अपनाए कि लोग रक्तदान की महत्ता को समझे और ज्यादा से ज्यादा आगे आए.

ये भी नही है अखबारो मे आ गया कि देश की आधी महिलाए एनिमिक हैं तो यह सुन कर हम सब रक्तदान करने लगेगें या फिर कांफ्रेस या मींटिंग मे सुनेगें कि रक्तदान जरुरी है करना चाहिए इससे शरीर भी स्वस्थ रहता है तो हम सब रक्तदान करने लगेगें.

हां, पर एक बात जरुर हो सकती है कि अगर रक्तदान की अपील ऐसा व्यक्ति करे जिसे लगातार रक्त की आवश्यकता पडती रहती हैं या उनका कोई रिश्तेदार संदेश के माध्यम से अपनी बात कहे तो जरुर एक बदलाव आ सकता है. कुछ दिनो पहले नेट के माध्यम से मैने  कुछ मरीजो से बात की और उनके संदेश ब्लाग और सोशल नेट वर्किंग साईट पर डाला तो उनकी दिल से निकली बात का असर सीधा दिल पर हुआ और बहुत लोग उनका संदेश सुनकर रक्तदान के लिए तैयार हो गए. आप सुनना चाहेंग़ें.

पहला संदेश है संगीता वधवा का

35 साल की संगीता  मुम्बई में रहती हैं अपनी पढाई पूरी करके यह आजकल हशू अडवाणी मैमोरियल फांऊंडेशन हैल्थ एड केयर थैलीसिमिया सेंटर में PRO  और Counseller की भूमिका निभा रही हैं.संगीता थैलीसीमिया मेजर की मरीज हैं.

संगीता ने बताया कि जब वो 5 साल की हुई तब  समझ आना शुरु हुआ  कि कुछ समझ नही आ रहा कि यह हो क्या रहा है. संगीता की बहन भी मेजर की मरीज थी. उनके मम्मी पापा और भईया कभी एक अस्पताल तो कभी दूसरे अस्पताल खून के लिए भागते रहते. लोग आटा चीनी मांगने एक दूसरे के घर जाते है पर वो खून मांगने लोगो के घर जाते थे. एक समय ऐसा आया जब रिश्तेदार भी कतराने लगे कि कही खून के साथ साथ पैसा भी न मांग लें क्योकि खर्चा भी बहुत हो जाता था. जब दूसरे बच्चे पिकनिक पर जाते थे तब वो लोग ब्लड ट्रास्फ्यूजन के लिए होस्पीटल जाते. पढने की इच्छा होती तो लोग दबे स्वर मे पेरेंट्स को कहते कि क्या फायदा पढा के मर तो जाना ही है इन्हें … वो अक्सर पापा से पूछ्ती कि वो ही क्यो? तब पापा उसे समझाते कि वो भगवान के स्पेशल बच्चे हैं और भगवान हमारा टेस्ट ले रहा है. बिना धबराए उस टेस्ट मे हमें खरा उतरना है.

5 साल के बाद से और आज तक लगभग 700 बार खूब चढ चुका है. अगस्त 2010 में जब बडी बहन की डेथ हुई तब अचानक ऐसा महसूस होना शुरु हुआ कि सही जानकारी न होने के अभाव से उसकी डेथ हुई है. बस तब से एक जुनून एक आग सी दिल में भर गई कि कुछ भी हो जाए जनता को इसके बारे मे जागरुक करना ही करना है. एक संस्था बनाई FACE,  FIGHT ,  FINISH के नाम से.

आज वो संगीता जो जीने की इच्छा खो चुकी थी आज उन लोगों की काऊंसलिंग कर रही है जो जीने की इच्छा छोड चुके हैं.तो क्या हम भी एक पहल ………………………………….!!!! .

अगला संदेश है जम्मू निवासी जगदीश कुमार का.

50 वर्ष  के जगदीश कुमार जम्मू में रहते हैं. सीनियर लेक्च्चर हैं. हीमोफीलिया से पीडित जगदीश कुमार ने सन 94 में हीमोफीलिया सोसाईटी बनाई और उन्होने सैकेडो ऐसे मरीजो को गोद लिया हुआ है और उनकी देखभाल मे अपनी आधी तन्खाह खर्च करते हैं.

जगदीश कुमार ने बताया कि जब वो 9 साल के थे तब से उन्हे महसूस हुआ कि उनके शरीर के साथ कुछ न कुछ जरुर असामान्य है. 34 साल के होते होते उन्हें  अपनी बीमारी का पता चल गया. इसी बीमारी के चलते उन्हें अपने तीन बेहद करीबी  प्रियजनों को खोना पडा.

उनका कहना है

कि रक्त का कोई विकल्प नही. आज हम सब आपकी दया के मोहताज है. हमारे जीवन को चलाने के लिए आपके सहयोग की आवश्यकता है. अगर  आज वो संदेश भेज पा रहे हैं तो उसके पीछे वो 248 लोग हैं जिनका खून इनकी रगो मे दौड रहा है. यू तो वर्ष चलते चलते रुक जाते हैं आपका खून मिले तो दौड लगाते हैं. कुदरत की देन कहे या कोई करिश्मा. बस आपके सहयोग से जीवन चला रहे हैं. अब आपको स्वैच्छिक रक्तदान की महत्ता  समझनी होगी ताकि हम जैसे अनेको घरों के चिराग बुझने से बच जाए. दिल से निकली बात सीधा दिल पर ही लगती है. इसलिए जीवन मृत्यु के बीच मे झूलते ऐसे मरीज एक उदाहारण बन सकतेहैं.

इसके अतिरिक्त On line Competition भी करवा सकते हैं किसी तारीख विशेष पर यह प्रतियोगिता करवा कर जनता का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है.Colourful posters बना कर भी आकर्षित किया जा सकता है.

अपना या अपनी संस्था का अच्छा सा प्रोफाईल बना कर भी लोगो का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है. ताकि जनता को लगे कि सही मायनो मे कौन किस तरह से और कितना काम कर रहा है और अगर वो भी इस कार्य का हिस्सा बनना चाहे तो बन सकें. उसमे अपनी उपलब्धियां और विस्तार से जानकारी होनी चाहिए.

एक ऐसी ही जानकारी को मैने भी कम्पाईल किया है. आईएसबीटीआई के स्वर्णिम 40 साल एक झलक.

जनता मे रक्तदान को लेकर भ्रांतियां बहुत हैं. डाक्टर आदि के साथ रुबरु वार्ता करवा कर या उन्हे ब्ल्ड बैंक का दौरा करवा कर उनकी भ्रांतियां दूर की जा सकती है.  उपहार स्वरुप कुछ रक्तदान से जुडी समृति चिन्ह दें ताकि वो उसे हमेशा याद रखें.

दसवीं, बारहवीं के तथा कालिजो के छात्रो के बीच मे विभिन्न प्रतियोगिताए जैसे स्लोगन, निबंध या क्विज आदि करवा कर बच्चो को रक्तदान के प्रति आरम्भ से ही जागरुक किया जा सकता है.

होली इत्यादि पर रक्तदान करके लोगो का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है.

अखबार में  अच्छे कलरफुल लेखों के माध्यम से जागरुक किया जा सकता है और रक्तदान से सम्बंधित कार्टून बना कर भी लोगो मे जागरुकता लाई जा सकती है.

किसी की प्रशंसा करके भी उसे प्रोत्साहित किया जा सकता है. जैसाकि ट्रांस्कान 2013 की इतनी खूबसूरत साईट बनाई है. इतनी मेहनत की गई है. वाकई मे पूरी टीम बधाई की पात्र है. किसी को उत्साहित करके भी हम  …. !!!

जागरुक करने के लिए कोई ईवेंट कर सकते हैं , कुछ हट कर कर दिखा सकते हैं ताकि जनता के मन मे जिज्ञासा बनी रहे. जैसाकि पिछ्ले साल अखिल भारतीय तेरापंथी युवक परिषद ने रक्तदान कैम्प लगाया था.जो कि अपने आप में ही एक रिकार्ड है.

आईएसबीटीआई ने 12 अगस्त को एक विशाल ब्लड ड्राप बना कर एक कीर्तिमान कायम किया. आईएसबीटीआई सोच मे था कि कुछ नया कुछ हट कर किया जाए तभी उनकी मुलाकात ब्लड कनेक्ट एनजीओ से हुई. इसे आईआईटी दिल्ली के छात्रोने शुरु किया था. उन्होने सुझाया कि एक विशाल ब्लड् ड्राप बनाते हैं  जिसमें युवाओ को खडा करेगे. इससे पहले यह वर्ड रिकार्ड साउथ कोरिया के नाम था. जिसमे 3000 लोग खडे थे. बस तब से संस्था  इस ईवेंट मे जुट गई और यह सफल रहा. लाल कैप और लाल टीशर्ट पहने हरियाणा के कुरुक्षेत्र की ऐतिहासिक धरती पर इस विशाल ड्राप मे 3069 युवा खडे हुए जिन्होने या  तो रक्तदान किया था या फिर रक्तदान प्रेरक के रुप मे काम कर रहे हैं.

अच्छा तो तब लगा जब यह ईवेंट खत्म हुआ और बाद मे भी बहुत लोग आ आकर पूछ्ने लगे कि रक्तदान कैम्प कहां लगेगा हम भी रक्त दान करके विशाल ड्राप का हिस्सा बनना चाह्ते हैं.

कोई शक नही कि आज हमारे सामने सोशल नेट वर्किंग का विशाल क्षेत्र खुला पडा है. फेसबुक, ब्लाग, ट्वीटर , गूगल प्लस वेब साईट ना जाने कितने आपशन है पर जरुरी है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जाए और उससे भी ज्यादा जरुरी है कि अपने भीतर की आग को, कुछ करने के जज्बे को जगाया जाए. खुद को उत्साहित किया जाए.

क्योकि ….

जीत की खातिर जनून चाहिए / जिसमे उबाल हो ऐसा खून चाहिए/ ये आसमां भी आएगा जमी पर / बस इरादों मे जीत की गूंज चाहिए!!!

धन्यवाद

जय रक्तदाता

मोनिका गुप्ता

(ये मेरी पीपीटी के अंश हैं जोकि सूरत ट्रांस्कान 2013 में बोली गई)

रक्तदान सोशल मीडिया और हमारे दायित्व  कैसी लगी?? जरुर बताईगा !!

 

 

 

September 23, 2015 By Monica Gupta

ऐसा भी होता है

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ऐसा भी होता है

कई बार कुछ ऐसा पढने या सुनने को मिल जाता है कि लगता ही नही है कि यह हकीकत है. ऐसा लगता है मानो कोई फिल्मी कहानी है और किरदार अपना अपना काम खत्म कर के चले जाएगे. पर ये हकीकत है.जिसे मै आपको जरुर बताना चाहूगी. बात है सन 2012 की जिसे मैने नेट पर ही पढा था.

 पूना के एक जाने माने industrialist श्री जावेरी पूनावाला हैं और उनका ड्राईवर है देवी दत्तजोकि पिछ्ले तीस सालो से उनके यहां कार चला रहा है.श्री पूनावाला उस समय जरुरी मीटिंग के सिलसिले मे पूना आए हुए थे जब उन्हे पता चला कि उनके ड्राईवर की मृत्यु हो गई है. उन्होने सारे काम रोक कर देवी दत्त के परिवार वालो से विनती की कि वो जरा उनका इंतजार करे और वो तुरंत हैलीकाप्टर से मुम्बई रवाना हो गए. वापिस लौट कर उन्होने उसी गाडी को सजवाया जिसे देवीदत्त चलाया करते थे और उसमे देवीदत्त का पार्थिव शरीर रखवाया और उस गाडी को स्वंय चला कर घाट तक ले कर गए.

जब उनसे पूछा कि उन्होने ऐसा क्यो किया तो उन्होने कहा कि देवीदत्त मे दिन रात उनकी सेवा की. वो उसके बहुत आभारी है जिसके एवज मे वो इतना तो कर ही सकते है.इसके साथ साथ देवीदत्त बहुत गरीबी से ऊपर उठे थे और इन हालातो मे उन्होने अपनी लडकी को सी.ए. बनाया है जोकि तारीफ के काबिल है.
श्री जावेरी ने बताया कि इसमे कोई शक नही कि रुपया तो हर कोई कमा लेता है पर हमे उन लोगो का भी धन्यवादी होना चाहिए जिनका सफलता मे योगदान रहा. उनका ऐसा मानना है और उन्होने वही किया.
वाकई मे,यह मानवता का एक शानदार उदाहरण है जो कुछ ना कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है कि ऐसा भी होता है.

September 23, 2015 By Monica Gupta

घरेलू नौकर और चुगली

just think photo

Photo by SodanieChea

घरेलू नौकर और चुगली

कुछ दिन पहले मार्किट में एक जानकार मिल गई. बाते करते हुए वो बोली कि वो भी उसी तरफ जा रही हैं मुझे ड्राप कर देगीं. मै मना न कर सकी. कार ड्राईवर चला रहा था और सारे रास्ते कभी वो अपनी सास की तो कभी अपनी ननदों की बुराई करती रही. बीस मिनट का रास्ता मुझे  दो घंटे का लगा, मेरे असहज होने की दो वजह थी एक तो उनका बुराई करना और दूसरा कार चालक भी सुन रहा होगा. वो भी क्या सोचता होगा अपनी मालकिन के बारे में. मैने एक बार उन्हे इशारा किया कि ड्राईवर सुन रहा है बाद मे बात कर लेंगें  पर मेरी बार अनसुनी कर दी गई और बोलती ही रही.

एक अन्य पडोसन काम वाली बाई के साथ आधा आधा घंटा बतियाती रहती है. सभी घरों का इतिहास खंगालने के बाद चाय पानी पिला कर उसे विदा करती है और ये रोज की बात है. वही एक अन्य महिला सब्जी वाले से सारी बाते करती है. अरे!! आप सब्जी लो और जाओ पर नही ..वो तो उसे ये तक बता देती है कि आज सब्जी नही लेंगें. हफ्ते के लिए बाहर जा रहे हैं. किसी के समझाने पर नही उसे तब समझ आया जब घर पर चोरी हो गई.

आज माहौल ऐसा नही है. समय बहुत बदल गया है. चाहे मालिश करने वाला हो,काम वाली बाई हो, माली हो या घरेलू नौकर अपने दुखडे उनके आगे न रोए तो बेहतर….. अपनापन दिखाए और प्यार से रखे पर अपने ही परिवार के सदस्यों की बुराई उनसे न करें  … क्योकि एक बार उन्हें भनक लग गई ना तो वो उसका भरपूर फायदा उठा सकते हैं बेशक अपवाद भी हैं पर बहुत कम इसलिए बहुत समझ कर रहने की आवश्यकता है … वैसे आप तो ऐसे नही होंगें … अगर हैं तो जरा नही बहुत सोचने की दरकार है… बाकि आप खुद भी समझदार हैं … है ना !!!

घरेलू नौकर और चुगली कैसा लगा ??? जरुर बताईगा !!! यदि आपका कोई अनुभव भी हमसे सांझा करना चाहे तो भी आपका स्वागत है !!

 

September 23, 2015 By Monica Gupta

सफलता की कहानी

 

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सफलता की कहानी

रक्तदान के क्षेत्र में एक प्रेरणा है अशोक कुमार

रक्तदाता श्री अशोक कुमार

रक्तदान से सम्बंधित एक कार्यक्रम चल रहा था. मीडिया, नेता, वक्ता, टीचर, डाक्टर आदि बहुत सज्जन मौजूद थे. सभी बहुत ध्यान पूर्वक कार्यक्रम सुन रहे थे तभी अचानक दरवाजा खुला और एक पुलिस वाले भीतर आए. उन्हे देख कर अन्य लोगो की तरह मेरे मन मे भी यही सवाल उठ रहा था कि यह यहां किसलिए आए हैं इनका यहां क्या काम है. इतने मे उन्हे स्टेज पर बुलाया गया. मैने सोचा कि स्पीच वगैरहा देकर चले जाएगे. पर स्पीच के दौरान सुना कि वो तो स्वयं रक्तदाता हैं और अभी तक 45 बार रक्तदान कर चुके हैं और 15 बार रक्तदान के कैम्प लगा चुके हैं. उनकी बातो से प्रभावित होकर मैने विस्तार से उनसे बात की.

सफलता की कहानी

उनका पूरा नाम है श्री अशोक कुमार. 3 सितम्बर सन 1972 मे जन्मे अशोक जी का जन्म हरियाणा के करनाल मे हुआ. पिता आर्मी मे थे. उन्होने सन 1962 और 1965 की लडाई भी लडी इसलिए बचपन से ही वो उनसे प्रेरित थे और बस एक ललक थी कि बडे होकर या तो आर्मी या पुलिस मे जाना है. कालिज मे जाने के बाद एनसीसी ज्वाईन कर ली थी. वैसे ना तो उन्हे सांइस और ना ही कामर्स का शौक था पर बडो के कहने पर उस विषय को लेना पडा. इससे पहले मैं कुछ और पूछती उन्होने बताया कि आज की तारीख मे उनके पास चार डिग्री बीकाम, एमकाम, एलएलबी और एलएलएम की हैं. फिर सन 98 मे वो पुलिस मे भर्ती हुए और आजकल हरियाणा के कुरुक्षेत्र मे वो फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट हैं.

रक्तदान के बारे मे अपने पहले अनुभव को उन्होने इस तरह से बताया कि सन 90 मे जब एनएसएस का कैम्प लगा था तब वो और उनके तीन चार दोस्त रक्तदान करने गए. तब अपने तीनो दोस्तो मे वो ही रक्तदान कर पाए और उनके दोस्त किसी ना किसी वजह से रक्त दान नही कर पाए. उस दिन इनमे एक अलग सा ही आत्मविश्वास आ गया और बस तभी से रक्तदान की शुरुआत हुई. एक और अच्छी बात यह भी हुई कि घर पर सभी ने शाबाशी दी और प्रोत्साहित किया. वैसे भी आर्मी मे समय बेसमय रक्त की जरुरत तो पडती ही रहती थी तब उनके पिता भी हमेशा आगे रहते. यही भावना उनके मन मे भी घर कर गई थी कि वो भी कभी भी जरुरतमंद को अवश्य खून दिया करेगें.

अब मेरे मन मे एक ही सवाल था कि पुलिस वालो के लिए अक्सर लोग बोलते है कि ये लोग तो खून पीतें हैं. इस पर वो मुस्कुराते हुए बोले कि यकीनन बोलते हैं और कई बार दुख भी होता है पर खुद काम अच्छा करते चलो तो कोई परेशानी नही आएगी. एक बार का वाक्या याद करते हुए उन्होने बताया सन 2010 मे जब उन्होने खून दान किया तो अखबार मे प्रमुखता से खबर छपी तो श्री सुधीर चौधरी (आईपीएस) ने भी यही बात की थी और शाबाशी भी दी थी कि बहुत अच्छा कार्य कर रहे हों. तब भी विश्वास को एक नया बल मिला था.

कोई मजेदार बात सोचते हुए उन्होने बताया कि जब भी वो कैम्प लगाते है कि जानी मानी शखसियत को बुलाते हैं. एक बार ( नाम नही बताया) जब उन्होने अपने कैम्प मे आने का निमत्रंण दिया तो पहले तो उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया पर बाद मे बोले कि उन्हे रक्त देख कर ही डर लगता है इसलिए वो नही आ पाएगे. पर बहुत प्रयास और समझाने के बाद वो आए और पूरे समय कैम्प पर ही रहे पर रक्तदान के नाम से आज भी कतराते हैं.

अशोक जी ने बहुत गर्व से बताया कि आज की तारीख मे लगभग 1000 पुलिस विभाग के लोग उस मुहिम से जुडे हैं और वो जब भी खुद कैम्प आयोजित करते हैं ज्यादा से ज्यादा पुलिस को जोडते हैं ताकि समाज मे फैली धारणा को वो बदल सकें. समाज सेवा मे मात्र रक्तदान ही नही वो भ्रूण हत्या, वृक्षारोपण, सडक दुर्धटना मे घायल लोगो की मदद करना और गरीब बच्चो को छात्रवृति भी प्रदान करवाते हैं. आज की तारीख मे अशोक जी के पास दो नेशनल एवार्ड हैं. 15 स्टेट एवार्ड ,13 जिले व प्रशासन की ओर से मिले सम्मान और 23 एनजीओ की तरफ से मिले विशेष सम्मान मिले है जोकि बहुमूल्य हैं. मैं उनकी बातों से शत प्रतिशत सहमत थी.

अंत मे जब मैने पूछा कि जनता के लिए क्या संदेश है इस पर वो बोले कि एक कविता लिखी हैं. ये बात फिर चौका गई क्योकि पहली बात तो वो पुलिस वाले फिर रक्तदाता और फिर अब कवि भी. अपना संदेश उन्होने कुछ इस तरह से रखा….

आओ मिल कर कसम ये खाए

खून की कमी से ना कोई मरने पाए

जात पात और मजहब से उपर उठ कर

इंसानियत की जोत जगाए

हम तो है भारत वासी देख का गौरव ऊंचा बढाए !!!

अशोक जी इसी तरह रक्तदान की मुहिम को आगे बढाते रहॆं. आईएसबीटीआई परिवार की ओर से ढेरो शुभकामनाएं !!!!

सफलता की कहानी आपको कैसी लगी ?? जरुर बताईगा !!

मोनिका गुप्ता

September 22, 2015 By Monica Gupta

Audio-व्यंग्य बिजली जाने का सुख- मोनिका गुप्ता

Audio-व्यंग्य बिजली जाने का सुख- मोनिका गुप्ता

http://radioplaybackindia.blogspot.in/…/bijli-jane-ka-sukh-… लीजिए सुनिए … मेरा लिखा व्यंग्य मेरी ही आवाज मे … व्यंग्य है .. बिजली जाने का सुख ..

बिजली जाने का सुख …

 व्यंग्य बिजली जाने का सुख

 हैरान होने की कोई जरुरत नही, बिजली कटस को देखते हुए मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि बिजली जाने के तो सुख ही सुख है.सबसे पहले तो समाज की तरक्की मे हमारा योगदान है भले ही वो अर्थ आवर ही क्यो न हो. और  बिजली नही तो बिल भी कम आएगा और उन पैसों से ढेर सारी शापिंग.

वृद्ध् लोग बिजली न होने पर हाथ का पखां करेगें तो कन्धों के जोडो की अकडन खुल जाएगी. घरो मे चोरी कम होगी कैसे ? अरे भई, बिजली ना होने की वजह से नींद ही नही आएगी जब सोएगें नही तो चोर आएगा कैसे..

 बिजली ना रहने से सास बहू के आपसी झगडे कम होगें दोनो बजाय एक दूसरे को कोसने के बिजली विभाग को कोसेगीं हैं इससे मन की भडास भी निकल जाएगी और मन को अभूतपूर्व शांति भी मिलेगी. बिजली न होने से दोस्ती भी हो जाएगी.

अब बिजली ना होने पर आप घर से बाहर निकलेगे अडोस पडोस मे पूछेगे लाईट के बारे में. फिर धीरे धीरे  जान पहचान होगी  और दोस्ती हो जाएगी. बिजली न होने की वजह से आप श्रृंगार  और वीर रस के  कवि या लेखक बन सकते हैं. ऐसे लेख निकलेगें आपकी कलम से कि बस पूछिए ही मत.और तो और आप जोशीले भी बन सकते है बिजली घर मे ताला लगाना, तोड फोड , जलूस की अगवाई में महारथ हासिल हो सकती है.बातें तो और भी है पर हमारे यहाँ 3घंटे से लाईट गई हुई है और अब इंवरटर में लाल लाईट जल गई है.

बिजली विभाग का फोन नो रिप्लाई  आ रहा है गुस्से मे मेरा बीपी बढ रहा है डाक्टर को फोन किया तो वो बोले तुरंत आ जाओ. अब ओटो का खर्चा, डाक्टर की फीस ,दवाईयो का खर्चा सभी के फायदे ही फायदे हैं और कितने सुख गिनवाऊँ बिजली जाने के.

 

Monica Gupta

Monica Gupta

Audio-व्यंग्य बिजली जाने का सुख- मोनिका गुप्ता

September 22, 2015 By Monica Gupta

नेता जी

कार्टून नेता (मोनिका ग़ुप्ता)

कार्टून नेता (मोनिका ग़ुप्ता)

नेता जी

कोई शक नही कि आजकल सभी डेंगू से डरे हुए हैं एक बाईट हालत खराब कर रही है. वही ये देखिए एक प्रतियोगिता हो रही है कि किसकी बाईट ज्यादा तेज…  नेता जी की या डेंगू मच्छर की …

किसमें कितना है दम !!!

नेता जी

September 22, 2015 By Monica Gupta

शराब और लडकियां

 

शराब और लडकियां

आज सुबह टीवी पर खबर देख कर मन खराब हो गया. अरे नही !! किसी  नेता के  बड बोले बयान नही देखे ?? उनसे तो मनोरंजन होता है मन खराब नही होता.. असल में, सुबह खबर देखी कि महिला शराब पी कर हंगामा कर रही थी और बहुत अंट शंट  बोल रही थी. खबर एक नही बल्कि तीन तीन थी. दो खबर देरहादून की थी और एक मुम्बई की. एक ने तो हद ही कर दी थाने में ही पुलिस के सामने  बोतल गटक रही थी. मेरा तो देख कर ही सिर शर्म से झुक गया … हे भगवन !! क्या होगा इस देश का !!  मुझे याद आई आज से तीन साल पहले की बात.. नेट पर एक फोटो देखी जिसमे तीन चार महिलाए बीयर की दुकान के बाहर खडी है और दो बीयर पी रही है.. मैने उस समय यह सोच कर सिर झटक दिया कि  ये सब ट्रिक होगी फोटोग्राफी की.. ऐसे थोडे ही ना होता है …

इसी बात के कुछ समय बाद लंच के लिए दिल्ली के जान माने होटल में गए. हमारे सामने एक यंग लडका लडकी आ कर बैठे. सामने ही बैठे  थे इसलिए उनकी आवाज भी साफ आ रही थी. लडकी ने वेटर से पहले शराब मगवाई.  फिर दोनो ने पी. हालाकि लडका बार बार मना कर रहा था.  लडकी ने दूसरी बोतल भी मगवाई. मुझे यह देख कर गुस्सा आ रहा था. इस पर मुझे  ही डांट भी पड गई कि कौन सी दुनिया में रह रही हो मोनिका .. ये तो यहां आम बात है … तू खाना खा आराम से … !!! थोडी देर में लडकी की आवाज ज्यादा तेज हो गई . लडका उसे कुछ समझा रहा था था और फिर  लडका  टुन्न हुई  लडकी को पकड कर  बाहर ले जा रहा था.

अगर ये कुछ साल पहले की बात है तो यकीनन अब तो बहुत तरक्की हो गई होगी  so called समाज में … लडकियां  और भी आगे निकल गई होगी… हैरानी की बात तो ये है कि अगर इस बारे मे हम टोके तो हम ओल्ड फैशन हैं. और अगर लडकी खुद बहक जाए और भगवान न करे इसके साथ कुछ गलत हो जाए तो उम्मीद करते हैं कि हम मोमबती ले कर सबसे आगे आए..

हैरानी है कि जहां बहुत गांव की महिलाए शराब की दुकान बंद करवाने के लिए धरने पर बैठी रहती है और समाज के ठेके दारों से भिड भी जाती हैं वही समाज का एक तबका ऐसा शर्मनाक भी है ..

          !!drink 1                                drink2

बेशक, बहुत पढ लिख गई हैं  लडकियां ,अपने पैरो पर खडी हो गई हैं पर प्लीज  शर्म करिए … अपनी मर्यादा न लांघे !!!

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