Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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June 17, 2015 By Monica Gupta

बाल कहानी अहसास

 

 writing on paper photo

बाल कहानी अहसास

प्रिय मम्मी,

मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपको क्या और कैसे लिखूं पर मुझे माफ कर दो। मेरी उन गलतियों की जोकि मैंने की और आपको तंग किया। आप आज अस्पताल में मेरी ही वजह से हैं, लेकिन सच मानो, मेरा न तो कोर्इ गन्दा दोस्त है और न ही मैं इंटरनेट या टी.वी. देखकर बिगड़ा हूं। मुझे खुद भी नहीं पता कि मैं ऐसा क्यों हो रहा हूं। वैसे तो मैंने बहुत गलतियां की हैं पर कुछ एक के लिए मैं ………………!आपको याद होगा कि एक दिन आपने मुझसे बार-बार पूछा था कि चुप-चुप क्यों हूं। असल में मैंने जानबूझ कर अनिल को बाल मारी थी। उसे आँख के नीचे सात टांके लगे थे। नोटिस मिला कि आपको बुलाया है तो मैंने झूठ-मूठ अपनी तरफ से ही लिख दिया कि मैं बीमार हूं इसलिए आ नहीं सकती। आपके सार्इन भी कर दिए थे। झूठ के हस्ताक्षर किये थे ना इसलिए डर रहा था कि सच्चार्इ पता लगेगी तो मैं फँस ही ना जाऊँ। एक बार जब आपने मेरी पसन्द का खाना नहीं बनाया तो मैं मुंह फुला कर अपने कमरे में चला गया था।

सन्नी लिख ही रहा था तभी दरवाजे की घंटी बजी। सन्नी ने फटाफट अपनी चिठ्ठी तकिए के नीचे छिपा दी और दरवाजा खोलने चला गया। बाहर सन्नी के दादा जी खड़े थे। वो अन्दर आ गए और बोले कि उसकी मम्मी को ग्लूकोज लग रहा है, ब्लड़ प्रेशर बहुत कम है। एक घण्टे में उसके पापा खिचड़ी लेने आएंगे। चाची बनाकर तैयार रखेगी। सभी ने हामी की मुद्रा में गर्दन हिला दी। चाची मम्मी की बीमारी के कारण कुछ दिनों के लिए यहां आर्इ हुर्इ हैं, पर चाची को अपने बेटे नमन के अलावा कोर्इ दिखता ही नहीं, सन्नी से तो वो सीधे मुंह बात ही नहीं करती। कल मैगी बनार्इ और चाकलेट केक बनाया तो सारा अकेले ही नमन ही खा गया। सन्नी सोच रहा था कि मम्मी होती तो उसका कितना ख्याल रखती। सन्नी ने दादाजी को बताया कि उसकी चाची अभी बाजार गर्इ हुर्इ है। आने वाली होगी।

दादाजी अपना न्यूज चैनल लगा कर बैठ गए। सारा घर कितना गंदा हो रहा था। उसकी मम्मी सारा दिन घर कितना साफ रखती थी। सन्नी अपनी बात मम्मी तक चिठ्ठी के माध्यम से पहुंचाना चाह रहा था। उसे डर लग रहा था कि वो जल्दी से चिठ्ठी लिखे, और वो उड़ कर उसकी मम्मी तक पहुंच जाए और मम्मी उसको माफ करके ठीक होकर जल्दी से घर आ जाए।
सन्नी की मम्मी सन्नी को बहुत प्यार करती थी। पर जबसे सन्नी आठंवी क्लास में आया है तभी से कुछ बदल गया है। सीधे मुंह बात नहीं करता, उलटे सीधे जवाब देता, मम्मी कोर्इ घर का काम कहती तो साफ मना कर देता। मम्मी ने कर्इ बार प्यार से तो कर्इ बार गुस्से से समझाया पर उसने कभी समझने की कोशिश नहीं की। लेकिन आज शायद मम्मी को अस्पताल तक ले जाने का दोषी शायद वो खुद ही है।
सन्नी जल्दी से चिठ्ठी लिख कर मम्मी तक पहुंचाना चाहता था। वो चाह रहा था कि जब अस्पताल में मम्मी के लिए खिचड़ी जाए तो वो चिठ्ठी भी चली जाए। उसकी चाची भी बाजार से आ गर्इ थी और बर्तनों की उठा-पटक तेज हो गर्इ।
सन्नी अपने कमरे में गया और तकिए के नीचे से चिठ्ठी निकाली ………….. कमरे में चला गया था। उसने आगे लिखना शुरू किया …………. मम्मी, आपने बहुत मनाया और रात को होटल से खाना मंगवाने का वायदा भी किया पर मैं मुँह बना कर ही पड़ा रहा और उसी शाम मैंने आपके पर्स से पाँच सौ रूपये चुरा लिए थे। आप तो मेरे ऊपर शक कर ही नहीं सकती थी और काम वाली बाई तुलसी को आपने काम से निकाल दिया। वो बेचारी रोती रही कि उसने चोरी नहीं की ……….। उसके बाद आपने दूसरी कामवाली भी नहीं रखी और मैंने भी आपको सच्चार्इ नहीं बतार्इ। एक बार संजय अंकल आए थे तो मैंने उनकी सिग्रेट भी पी थी पर थोड़ी सी।
जब आप हर रोज सुबह मुझे स्कूल जाने के लिए उठाती, मुझे दूध देती और मेरे बालों को सहलाती तो मुझे बड़ा गुस्सा आता कि क्या है, सुबह-सुबह मेरी नींद खराब कर देती हैं ……….. काश मम्मी की तबियत ही खराब हो जाए ताकि न मुझे दूध पीना पड़े और न ही स्कूल जाना पड़े। सारा दिन घर पर मजे से बैठ कर टी.वी. देखूं। पर मम्मी, सच, आज आपको अस्पताल गए चार दिन हो गए हैं। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि चालीस दिन हो गए हैं।

मम्मी, आपकी बहुत याद आ रही है अब प्लीज, घर आ जाओ। मेरी सारी गलतियों की सजा पिटार्इ करके दे दो। सन्नी के लिखे अक्षर धुंधले हो गए। पर वो जल्दी से चिठ्ठी लिखकर उसे मम्मी तक पहुंचाना चाह रहा था इसलिए उसने फटाफट आँसू पोंछे और लिखना जारी रखा।
मम्मी, मैं आपसे माफी मांगता हूं और वायदा करता हूं कि जितना प्यार से आप मुझसे बात करती हो उससे भी ज्यादा प्यार से रहूंगा आपका कहना मानूंगा और आपके हाथ से सुबह-सुबह दूध पी पीऊंगा। मम्मी पता है आज मैं मंदिर भी गया था वहां से चरणामृत पीकर आपकी तबियत की भगवान से विनती की कि हे भगवान जी, मेरी मम्मी को फटाफट ठीक कर दो।
तभी आवाज आर्इ कि उसकी चाची ने सारा सामान टोकरी में रख दिया है। सन्नी के पापा भी घर आ गए थे बोले कुछ तबियत ठीक है। उसने फटाफट कागज मोड़ कर उस पर ‘सिर्फ मम्मी के लिए लिख दिया और प्लेट के नीचे नैपकिन के ऊपर अपनी चिठ्ठी को धड़कते दिल से रख दिया। मम्मी का हँसता चेहरा बार-बार उसे नज़र आ रहा था।
पापा जल्दी में थे और चले गए। सन्नी डर रहा था। मम्मी पढ़ेगी तो क्या सोचेगी ……….. अगर उस चिठ्ठी को किसी और ने पढ़ लिया तो ……….!!
पर अब कुछ नहीं हो सकता था चिठ्ठी जा चुकी थी। सन्नी को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने इतनी जल्दी में चिठ्ठी क्यों दे दी। ना नीचे ढ़ंग से अपना नाम लिखा। बिना खाना खाए अपना कमरा ठीक करके वो चुपचाप सो गया। चाची एक बार उससे खाने का पूछने आर्इ लेकिन उसके मना करने पर उन्होंने दुबारा उससे पूछा नहीं। बस, अब सन्नी मन ही मन चाह रहा था कि मम्मी जल्दी घर आ जाए …………. तो वो कभी भी मम्मी को तंग नहीं करेगा। उधर उसे चिठ्ठी का भी डर लग रहा था कि मम्मी उसके बारे में क्या सोचेंगी। वो मन ही मन चाहने लगा कि मम्मी वो कागज देखे ही नहीं और खाना वापिस आने पर वो उस चिठ्ठी को फाड़ कर फैंक देगा। और हमेश के लिए अच्छा बच्चा बन जाएगा। यह बात भी बिल्कुल सच है कि उसकी मम्मी बहुत प्यार करती थी और जब वो बतमीजी से बोलता, कहना नहीं मानता तो वो उसकी बातें दिल से लगा लेती उधर से काम वाली बार्इ के जाने के बाद वो सारा काम खुद करने लगी। टैन्शन और काम के बोझ से अचानक उनकी तबियत बिगड़ गर्इ और अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। आज सन्नी को महसूस हो रहा था कि वो मम्मी के बिना  कुछ भी नहीं। पापा तो काम में ही व्यस्त रहते हैं और दादी-दादा गाँव में रहते हैं चाची-चाचा दूसरे शहर में रहते हैं।
यहीं सोचते-सोचते वो सो गया। शाम को आँख खुली तो पापा की आवाज आ रही थी कि अस्पताल में उन्होंने खाना नहीं खाया। पर तबियत बेहतर है शायद कल घर ही आ जाए। सन्नी उठ कर बाहर भागा। उसने टोकरी में देखा तो चिठ्ठी वैसी ही रखी मिल गर्इ शायद किसी ने पढ़ी ही नहीं थी। सन्नी ने फटाफट टोकरी से वो चिठ्ठी निकाल कर उसे अपनी अलमारी में छिपा दिया। सोच कि समय मिलने पर फैंक दूंगा।
मम्मी कल घर आ जाएगी तो आज घर का माहौल कुछ हलका था। सन्नी सभी से बात कर रहा था और चाची के साथ घर की सफार्इ भी करवा रहा था। उसमें एक नया जोश भरा था।
बड़ी मुश्किल से दिन बीता। दोपहर को मम्मी घर आ गए। वो बहुत कमजोर लग रही थीं। सन्नी ने मम्मी को फल काट कर दिए। शाम को मम्मी के पास ही लेटा रहा था। एक-दो दिन में चाची और दादा जी भी चले गए थे। मौका मिलते ही उसने वो चिठठी भी फाड़ कर फैंक दी थी। मम्मी अब काफी ठीक होने लगी थी।

पर एक बात सन्नी को कभी पता नहीं लगेंगी कि उस दिन मम्मी ने उसकी चिठ्ठी पढ़ ली थी लेकिन सन्नी को महसूस तक नहीं होने दिया ताकि उसे दुख न हो कि उनके बेटे ने कितने गलत काम किए हैं। पर अब उसने गलती सुधार ली है और वायदा किया है तो उनके लिए यही बहुत था। उस दिन अस्पताल में चिठ्ठी पढ़ने के बाद उनसे खाना नहीं खाया गया और सन्नी की बाल सुलभ भावनाओं को समझते हुए चिठ्ठी उसकी जगह पर रखकर उन्होंने वापिस भिजवा दी थी। घर में ये बात किसी को भी पता नहीं चली।
अब सब ठीक है। सन्नी अच्छा बच्चा बन गया है। मम्मी का कहना मानता है और स्कूल में किसी से झगड़ा नहीं करता। सन्नी खुश है कि मम्मी ने उसकी चिठ्ठी नहीं पढ़ी और मम्मी खुश है कि सन्नी ने चिठ्ठी में अपनी सारी गलितयों को मानकर माफी माँग ली है और अब वो सुधर रहा है। तुलसी ने भी काम पर आना दुबारा से शुरू कर दिया। सन्नी ही उसे लेकर आया। मम्मी के पूछने पर सन्नी ने बताया कि जब आपकी तबियत बिल्कुल ठीक हो जाएगी तब दुबारा हटा देना। मम्मी ने सब जानते-बूझते उससे कुछ नहीं कहा और मेरा अच्छा बेटा कहकर उसे बाँहों में ले लिया।

बाल कहानी अहसास …. कहानी आपको कैसी लगी… आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है 🙂

June 17, 2015 By Monica Gupta

अब तक 35

ab tak 35 by monica                                               अब तक 35

कई बार हम पूरा लेख लिख देते हैं पर उसका टाईटल समझ नही आता. कई बार टाईटल दिमाग में आ जाता है पर लेख क्या लिखे ये समझ के बाहर होता है. इस व्यंग्य को लिखने के बाद माथा पच्ची शुरु हुई कि क्या नाम दिया जाए. बहुत घोडे दौडाए पर जब बिल्कुल भी समझ नही आया तब टीवी चला लिया उन दिनों अब तक 56 फिल्म बहुत प्रचार मे थी. बस … मुझे भी नाम मिल गया … क्योंकि 35 व्यंग्य थे इसलिए नाम दे दिया “अब तक 35”

“अब तक 35”  में मेरे लिखे 35 हास्य व्यंग्य हैं. ये मेरी चौथी किताब है. इसमें अधिकतर राष्ट्रीय समाचार पत्र जैसे “दैनिक भास्कर” के राग दरबारी कालम,  “दैनिक जागरण “आदि तथा कुछ आकाशवाणी जयपुर और हिसार  में प्रसारित हुए हैं. उन सभी को मिला कर इसे पुस्तक का रुप दिया है. सन 2009 में दिल्ली के शिल्पायन द्वारा प्रकाशित किताब में 103 पेज हैं.

उसी में से एक हास्य व्यंग्य आपके समक्ष है …

एक्सीडेंट हो गया ……!!!
जुल्फी मियां घबराए हुए चले आ रहे थे । चेहरा सुर्ख लाल, हाथ-पांव कांपते हुए मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि मियां, आज तो एक्सीडेंट हो गया .  यार-दोस्त उनकी हालत देखकर घबरा गए । छोटू को चाय आर्डर किया और उन्हें कुर्सी पर बैठाकर खैर-खबर जाननी चाही कि आखिर हुआ कैसे कि इतने में सतीश बोल पड़ा, यार सड़क पर इतने गड्डें हैं, कोर्इ हाल है क्या, वहीं उलझ गए होंगे और एक्सीडेंट हो गया हेाना है ।

मनप्रीत ने अपनी राय रखी, ओये! तेनू की पता …. ऐ लोकल बसैं होन्दी हैं ना उसदे ऊपर लटक-लटक के जान्दें ने लौकी ……. मैं तां कहदां हां की जुल्फी मियां भी किसे बस इच लटक के जा रहे होंगे तैं उदैं विचों डिग पए होणगे ।

तभी रोनी ने टोका, हे मार्इप्री, मनप्रीत गुस्से से बोला, ओए नां ठीक लया कर … अंग्रेजी दा पुत्तर …….गल करदा है … मैंने बात गिड़ते देख उनकी सुलह करवार्इ और रोनी से पूछा तो उसने बताया कि वेरी सिम्पल, द ओनली रीजन इज मोबाइल यार ! पीपल टाक टू मच वार्इल ड्रार्इविंग, आर्इ थिंक दिस इस द ओनली रिजन आफ एक्सीडेंट ।

तभी तार्जन अपनी तातली आवाज में बोला, मु…….. मुझे पता है……… तोर्इ गाय तामने अचानक आ दर्इ होगी । औल तुल्फी मियां चलक पल गिल पले होंदे। तभी खुद को हीरो समझने वाला शहिद बोला, ओ कम ओन यार, यू नो, ये सब दोस्ती का चक्कर है । मोटरसाइकिल और स्कूटर या साइकिल चलाते समय एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं और गाना गाते सड़क पर अपना दुपहिया भगाते हैं । आर्इ थिंक, दिस इज द रिजन, फ्रेंडस ।

तभी कमल हकलाता हुआ बोला …..त ….त……त…..तुम…..स…. सब गलत हो…….! इ…….इतना ….स…. स….. सारा काफिला च…. च….. चलता ……. है ……. ब …..ब ….बस ……. किसी …….. ग….. ग….. गाड़ी…… ने ठोक दि…. दि…. दिया होगा ! बे…. बे…. बेचारे ….. जु….. जु…. जुल्फी मियां ……..! तभी मेरा ध्यान जुल्फी मियां की तरफ गया । चाय उनके हाथ में ज्यों की त्यों रखी थी और चाय में काली मलार्इ जम चुकी थी ।

किसी गहरी सोच में डूबे जुल्फी मियां ने फिर बताया कि उनका एक्सीडेंट हो गया । मैंने भी पूछा क्या कोर्इ शराब पीकर गाड़ी चला रहा था जो उसने टक्कर मार दी । उन्होंने न की मुद्रा में सिर हिलाया । इसी बीच में छोटू गर्म चाय का नया गिलास देकर चला गया था । मैंने फिर पूछा कि कहीं बंद फाटक के नीचे से तो नहीं निकल रहे थे कि ट्रेन आ गर्इ हो । उन्होंने फिर से न की मुद्रा में सिर झटक दिया । हम सब हैरान परेशान हो चुके थे पर जुल्फी मियां हमारी किसी भी बात से सहमत ही नहीं थे । हम आपस में बातें करने लगे कि आजकल बस या जीप के ड्रार्इवर के पास लाइसेंस तो होता नहीं है बस ड्राइवर बन जाते हैं और छोटे-छोटे बच्चे धड़ल्ले से स्कूटी, कार, मोटरसाइकिल चलाते हैं ।

तभी जुल्फी मियां ने चाय का गिलास मेज पर रखा और चिल्लाते हुए बोले नहीं, अम्मा यार, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ । वो तो ….. वो तो….. राह से गुजरते वक्त चश्मेबददूर  बानो हमें मिल गर्इ थी । हमारी उनसे और उनकी हमसे ….नजरें इनायत हुर्इ… और फिर चार हुई … बस समझो कि ऐसा एक्सीडेंट हुआ कि….. बस…..!! ये कहते हुए खुदा हाफिज करते हुए, मुस्कुराते हुए बाहर निकल लिए और हम सब अपना सिर पकड़ कर बैठ गए ।

 

कैसा लगा ??? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है … 😆

June 16, 2015 By Monica Gupta

जवाब लाजवाब

जवाब लाजवाब

उफ़………….. इनकी हाजि़र जवाबी

हाजिरजवाबी अनूठी कला है, जब इसमें हास्य व्यंग्य का मिश्रण हो जाए तो मजा दुगुना हो जाता है और अगर यह हास्य व्यंग्य विश्व प्रसिद्ध हस्तियों का हो तो कहना ही क्या……..।
इस लेख में हम कुछ विश्व प्रसिद्ध हस्तियों के चुटीले अंदाजो से आपको रूबरू करवा रहे हैं।

सरोजनी नायडू
भारत कोकिला सरोजनी नायडू को कौन नही जानता। एक प्रखर राजनैतिक कार्यकर्ता, संवेदनशील कवयित्री और देश की स्वतंत्रता ही जिनका उददेश्य था। वो समय-समय पर हल्की-फुल्की टिप्पणियाँ करने से बाज नही आती थी। एक बार वो किसी सम्मेलन में गर्इ। वहाँ फोटो खीचने के लिए फोटोग्राफरों की लार्इन लग गर्इ। तब उन्होनें उनसे कहा, चलो भर्इ, जल्दी करो। मैं सब ओर से एक जैसी ही हूँ, मोटी और गोल-मटोल।

मार्च 1947 में जब वो प्रथम एशिआर्इ संबंध सम्मेलन के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित की गर्इ तो हाल खचाखच भरा हुआ था। वो उठी। भीड़ का जायजा लिया और बोली कि इस अपार भीड़ को देखकर मैं इतनी भावुक हो उठी हूँ कि मेरे मुहँ से आवाज ही नही निकल पा रही है। किसी महिला के मुहँ से आवाज ना निकलना कोर्इ मामूली बात नही है।

एक बार एक राजनैतिक कार्य के सिलसिले में गोपाल कृष्ण खोखले श्यामवर्णी नायडू से मिले और सोचा कि उनके रंग पर उन्हें खिजाया जाए। अत: उन्होने मुस्कुराते हुए चुटकी ली,  क्या आप मृत्यु के इतनी निकट पहुँच गर्इ हैं कि उसकी परछार्इयों ने आपकी ऐसी रंगत बना दी है। सरोजनी उनका मतलब समझ गर्इ। मगर वह बिल्कुल नही झिझकी और हँस कर बोली,  नहीं मैं जीवन के इतने निकट आ गर्इ हूँ कि उसकी तपिश ने मुझे झुलसा दिया है।

विनोबा भावे
विनोबा भावे ने स्वयं को निर्धनों और शोषितो से जोड़े रखा। उन्होनें भूदान आंदोलन के जरिए सामाजिक सुधारो को नर्इ दिशा दी। सौम्य और मृदुभाषी विनोबा अपनी नपी तुली टिप्पणियों की बदौलत स्वयं को विवादो से दूर ही रखते थे। एक बार कुछ पत्रकार विनोबा जी का साक्षात्कार लेने उनके आश्रम गए। विनोबा जी ने उनका सत्कार किया और पत्रकारों के प्रश्न का जवाब  देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उन्होंने माँग रखी कि पहला प्रश्न वो पूछेंंगें। पत्रकार सोचने लगे कि आखिर विनोबा जी के मन में क्या है। तब विनोबा ने उनसे पूछा कि वो किस भाषा में अपने दिए गए प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करतें हैं। पत्रकार जानते थे कि आचार्य भाषाविद हैं। उन्होनें निश्चय किया कि भाषा के चयन का निर्णय वे खुद ही लें। पर सभी पत्रकार जड़वत रह गये जब आचार्य ने उत्तर दिया कि उनकी नजर में सर्वोतम भाषा मौन भाषा है। और शांत भाव से आश्रम में टहलने लगे।

सर सी.वी. रमन

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सर सी.वी. रमन को कौन नही जानता। उन्होनें प्रकाश के संगठन और व्यवहार पर नया सिद्धांत खोज निकाला, जिसे रमण प्रभाव के नाम से जाना गया। इस विशिष्ट खोज की 25वीं जयंती के अवसर पर वो पैरिस गए हुए थे। वहाँ कुछ फ्रांसीसी वैज्ञानिको ने इस मौके पर भव्य समारोह का आयोजन किया। वर्दी में सजे-धजे बैरे अतिथियों को मनपसंद पेय पेश कर रहे थे। एक बैरा रमण के पास आया और उसने शैम्पेन भरे गिलासो की ट्रे उन की ओर बढ़ा दी लेकिन रमण ने उसे नही लिया। बार-बार उन्होनें विनम्रता से इंकार किया कि वह पीते नही है लेकिन फिर सोचने लगे कि उन्हें इस इंकार का कोर्इ कारण अवश्य बताना होगा। इसी उधेड़बुन में लगे थे कि जल्दी ही उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया। उनके पास खड़ी एक महिला ने अपने साथी को बताया कि यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सी.वी. रमण हैं। यह रमण प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। बस, यह बात सुनकर जो दोस्त उन्हें पीने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, वह उनकी ओर मुडे़ और बहुत सौम्यता से बोले,  मित्रों, आपने अल्कोहल पर रमण प्रभाव अवश्य देखा होगा पर मैं आपको रमण पर अल्कोहल प्रभाव देखने का अवसर कभी नही दूँगा। उनके इस विनोदपूर्ण जवाब  से लोगों में हँसी के फव्वारे फूट गये।

अल्बर्ट आइंस्टीन

 

albert einstein photo

Photo by Smithsonian Institution

अल्बर्ट आइंस्टीन भौतिकी के क्षेत्र में हुए सभी आधुनिक विकासों के श्रेय के हकदार हैं। अपने बारे में उन्होंनें कुछ पत्रकारों और फोटोग्राफरों के बारे में कहा कि वो अजायब घर में रखने लायक वस्तु हैं। वह मुख्यधारा से छिटक कर बाहर गिर गए हैं। फोटोग्राफरों द्वारा विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें खींचने के बाद उनसे उनके व्यवसाय के बारे में पूछा गया तो उन्होंनें तपाक से जवाब दिया कि वो तो माड़ल का काम ही कर रहें हैं, तरह-तरह के पोज़ में फोटो खिचवा कर। उनसे जब उनकी खोज के बारे में जनप्रतिक्रिया की राय पूछी गयी तो उन्होंनें कहा कि अगर मेरा सिद्धांत सफल रहा तो जर्मन दावा करेंगें कि मैं एक जर्मन हूँ। और सिवस कहेंगें कि मैं एक सिवस हूँ। किन्तु यदि असफल रहा तो सिवस कहेंगें कि मैं जर्मन हूँ और जर्मन कहेंगें कि मैं एक यहूदी हूँ।
एक बार आइंस्टीन के बेटे ने उनसे पूछा कि वो इतने प्रसिद्ध कैसे हैं। इस पर उन्होंनें कहा कि  बेटे, एक बार एक अंधा कीड़ा फुटबाल पर चलने कि कोशिश कर रहा था उसे यह नही मालूम था कि वो गोल है। मगर इस मामले में मैं भाग्यशाली निकला, यह बात मेरे ध्यान में आ गर्इ।
एक बार आइंस्टीन ने फोटोग्राफर ए.डब्लयू रिचडऱ्स से मजाक में कहा  मुझे अपने चित्रों से नफरत है। यदि इनकी वजह न होती…….. फिर अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले कि इनकी वजह न होती तो वो………. एक औरत नज़र आते।

जवाब लाजवाब

अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग
पेनिसलिन की खोज के लिए प्रसिद्ध अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग मितभाषी व्यकित थे। एक बार वो बंदरगाह के निकट होटल में ठहरे जहाज को पानी में तैरते देख रहे थे। उन्हें वो दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन भूख तेज़ लगने के कारण वो भोजनकक्ष की ओर चल पड़े। तभी सामने से दो पत्रकार आ रहे थे। उन्होंनें अदब से नमस्ते करके यह पूछना चाहा कि जब एक महान वैज्ञानिक नाश्ते के लिए जा रहा हो तो उसके मन में क्या विचार उमड़ते हैं। फ्लेमिंग ने भी अपनी मुद्रा गम्भीर कर ली और बोले कि विचार तो बहुत उमड़ते हैं। पत्रकार भी अपने पैन लेकर तैयार हो गए कि शायद कोर्इ ऐसी बात सुनने को मिले जो कल की सुर्खियाँ बन सकें। फ्लेमिंग ने कहा कि वो वाकर्इ में इस समय विशेष बात ही सोच रहा हूँ। यह खबर आपके लिए किसी वरदान से कम नही होगी……..। लेकिन जल्दी ही उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। उत्तर मिला, मैं एक विशेष बात सोच रहा हूँ कि मैं नाश्ते में कितने अंडे़ खाँऊ……… एक या …… दो………

जवाब लाजवाब

June 16, 2015 By Monica Gupta

प्रसन्न हुए भगवान

प्रसन्न हुए भगवान

 

  milk in a bowl photo

Photo by Joelk75

गाँव में साधु बाबा पधारे हुए थे। उन्होंने गाँव वालों के मन में यह बात ड़ाल दी थी कि मुझे भगवान ने भेजा है। वह तुम सभी से नाराज है। इसका प्रमाण भी दिखाया कि जब वह पूजा के लिए कच्चा दूध रखतें हैं तो वह स्वयं उबलने लगता है।भोले-भाले गाँव वाले उनकी बातों में आ गए। बाबा की तो चांदी हो गर्इ। वह दोनों हाथों से धन लेने लगे बहुत से लोग बाबा की सेवा भी करने लगे किसलिए? अरे भार्इ। भगवान का गुस्सा कम करने के लिए दान, दक्षिणा और सेवा का काम जरूरी था।

समय बीतता रहा। लेकिन हर रोज कच्चे दूध में उबाल आता रहा और बाबा कहते भगवान अब भी नाराज है, दान बढ़ाओ। बहुत दिन बीते बाबा वहाँ से जाने की सोचने लगे कि  रूपया खूब इक्ठ्ठा  हो गया अब खिसका जाए बहुत बुद्धु बना लिया यहाँ के लोगों को।

एक दिन बाबा के यहाँ झाड़ू-बुहारी करने वाले चंदू ने सफार्इ के दौरान एक थैले में ढ़ेर सारा चूना देखा। उस नासमझ ने सोचा शायद कोर्इ गलती से यहाँ रख गया होगा। भला चूने की डलियां बाबा के किस काम की। यह सोच कर वह दीवारों पर पुतार्इ करने के लिए उसने तुरन्त वो चूना भिगो दिया। पर यह क्या ? पानी में से तो बुलबुले उठने लगे। पहले तो उसने सोचा कि वह भगवान की ही नाराजगी है पर बाद में उसने सोचा कि चूना गरम होता है बुलबुले या भाप तो उठेगी ही।

अब चन्दू को बाबा की पोल समझ आ रही थी। वह समझ गया था कि चूना, बाबा ने अपनी कुटिया में क्यों रखा ? उसने असल में कुछ चीजें ताप या उष्मा क्रियाए करती है। कुछ उष्मा शोषी होती हैं। जिस कारण पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि पानी के संयोग से ठंडी हो जाती हैं। जबकि चूना उष्माक्षेपी है वह पानी के संयोग कर उष्मा देता है। चूने की डलिया पानी में डालने पर भाप निकलना इसका उदाहरण है। अब रही बात दूध उबलने की तो उस दूध में उपसिथत पानी से कि्रया कर उष्मा निकालता है और दूध उबलता हुआ प्रतीत होता है।

हर शाम की तरह इस शाम को भी बाबा की कुटिया के आगे भारी भीड़ जमा होने लगी यह जानने के लिए कि भगवान अभी प्रसन्न हुए या नाराज ही चल रहे हैं। पूजा का समय हो चला था, बाबा ने पूरी कुटिया छान मारी पर उन्हें कही चूना ही नहीं मिल रहा था। उन्होंने सोचा कि आज मैं गांव वालों को कच्चे दूध से ही पूजा करवा देता हूँ, कह दूँगा भगवान खुश हो गए और मैं यहाँ से किसी दूसरे गाँव चला जाऊँगा। पर लालच का क्या करते ? बाबा ने सोचा यहाँ तो इतना पैसा, सोना, चांदी मिल रहा है। दूसरे गाँव में मिले ना मिले। वह सोच ही रहे थे तभी उन्हें बाहर से कुछ आवाजें आती सुनार्इ दी। वो बाहर आए तो चंदू लोगों को कुछ बताकर पूजा करवा रहा था। उसने गाँव वालों को बतालाया कि किस तरह बाबा हमारी आंखों में धूल झोंक कर कच्चे पानी मिले दूध में चूने की ड़लियां ड़ालते रहे। और हमें यह कुछ ही देर में उबलता हुआ दिखने लगता।
पोल खुल चुकी थी। चारों तरफ से बाबा घिर चुके थे। मरता क्या न करता उन्होंने अपनी गलती मान ली और मुझे पुलिस के हवाले ना किया जाए यह हाथ जोड़कर निवेदन करने लगे। गाँव वालों को दया आ गर्इ।
गाँव वालों ने सारा पैसा, सोना, चाँदी, जवाहरात लौटा देने पर बाबाा को माफी दे दी और उसे गाँव से निकाल दिया गया। आखिर कुछ गलती तो उनकी भी थी। इस तरह अंधविश्वास में जीना भी तो गलत है।

June 16, 2015 By Monica Gupta

नारियल का फैसला – कैसे बचे बाबाओं से

naariyala-ka-faisala

नारियल का फैसला – ( बाल कहानी) टोने टोटके , पाखंड के खिलाफ पोल खोलती कहानी है नारियल का फैसला. भारतीय संस्कृति में नारियल को बहुत पवित्र माना जाता है… नारियल का फैसला क्या लिया ये जानने के लिए पढनी होगी कहानी

नारियल का फैसला – कैसे बचे बाबाओं से

आज दोपहर ही गांव से दादी अम्मा का तार आया है। उसमें लिखा था कि दादी बीमार है, तुरन्त चले आओ. तार पढ़ने के बाद मनोज के पापा का मन दफ्तर में नहीं लगा।

वह तुरन्त ही दो-तीन दिन की छुट्टी लेकर मनोज और अपनी पत्नी मनीषा के साथ गांव रवाना हो गए। रास्ते भर वह सोचते रहे कि अम्मा को शहर ले आएंगे। यहीं उनका इलाज करवाएंगे। तीन घंटे में वह गांव पहुंच गए।

वहाँ अड़ोसी-पड़ोसी इकटठे हुए थे। गांव की यही बात अच्छी है कि एक-दूसरे का सब बेहद ख्याल रखतें हैं। दादी के घर पहुंचे तो देखा, दादी बैठी हुर्इ थी। वह बहुत ही परेशान दिख रही थी। पापा ने उन्हें हाथ लगा कर देखा पर वह गर्म नहीं था।

मनोज के पापा ने राहत की साँस ली। दादी अम्मा के पड़ोसी छाछ ले आए। थोड़ा रूक कर मनोज के पापा ने पूछा, अम्मा बुखार कब उतरा?  अम्मा बोली बुखार तो था ही नहीं। पर अब चढ़ेगा। मनोज के पिता हैरान रह गए।

लेकिन वो तार भिजवाया था आपने ? पापा बोले। हाँ, भिजवाया तो था, तुझे जो बुलवाना था। इसलिए भिजवाना पड़ा। अम्मा रूआंसी होकर बोली। मनोज के साथ-साथ उसके मम्मी-पापा को दाल में कुछ काला लगा। उन्होंने पूछा, भर्इ, बताएं ना आखिर क्या बात है?

तभी गांव के सरपंच दीनू काका बोले, बेटे बात ये है कि हमारे गांव में एक साधु महाराज पधारे हैं और अम्मा भी उनके दर्शनों के लिए गर्इ थी। अब बात यह है कि किस व्यक्ति का  और किसके परिवार का भविष्य उज्ज्वल होता है ? यह सब बाबा एक नारियल देकर ज्ञात कर लेते हैं। क्या नारियल से?

मनोज के मम्मी-पापा ने उत्सुकता से पूछा। मनोज की मम्मी को भी ऐसे जादुर्इ बाबा के किस्से बहुत अच्छे लगते थे। तब दीनू काका ने बताया कि, बाबा एक नारियल लेने को कहते हैं। वहां बहुत से नारियल रखे होते हैं।

जिस नारियल को हम हाथ लगाते हैं, बाबा उसे खोलते हैं। अब अगर उसमें से फूल निकले तो उसका तथा  उसके परिवार का जीवन खुशहाल रहता है पर जिस नारियल में आग लग जाती है, उसके परिवार का नाश हो जाता है।

बस, अम्मा तीन बार से बाबा के पास नारियल दिखवाने जा रही है और हर बार नारियल में आग निकल रही है। अम्मा को वहम हो गया कि उनके परिवार पर जरूर मुसीबतें आने वाली हैं। इसलिए उन्होंने आप सभी को तार देकर बुलवाया है।

मनोज की मम्मी को चिंतित हो गर्इ पर मनोज समझदार बालक था। वह जिस विधालय में पढ़ता था, वहां उनको यह शिक्षा भी दी जाती थी कि ढ़ोंगी साधु कैसे भोली-भाली जनता को लूटते हैं, उसे पता था कि उस बाबा ने क्या पाखंड किया होगा।

अगले दिन मनोज और उसके मम्मी-पापा तथा दादी सब उसी दरबार में गए। मनोज ने कहा, इस बार नारियल वो ही उठाएगा। बाबा के दरबार में खूब भीड़ थी। गांव वाले बाबा पर खूब चढ़ावा चढ़ा रहे थे। चारों तरफ जबर्दस्त धूप की खुशबू फैली हुर्इ थी।

मनोज अपने साथ एक नारियल लेकर गया और बाबा से बोला, बाबा मेरा भविष्य बताइए। बाबा ने उसे ड़ांटा, मूर्ख, तू हमारा अपमान करता है, सिर्फ हमारे द्वारा रखे नारियल से ही भविष्य बताया जाएगा क्योंकि ये पूजा किए गए नारियल हैं। तब उसने अपना नारियल अपने पापा को दे दिया और बाबा द्वारा रखे नारियल में से एक नारियल उठा लिया। मनोज नारियल उठाते ही उसे सूंघने लगा।

अब बाबा कुछ सकपकाए। बोले, मूर्ख, नारियल क्यों सूंघता है? मनोज बोला, बाबा मैं परिवार की सुख-समृद्धि वाला नारियल चाहता हूँ। इसलिए आपको ऐसा ही नारियल सूंघ कर दूंगा, जिसमें हमारे परिवार का कल्याण हो।

भीड़ के सभी लोग सकते में आ गए। पूरी भीड़ में खामोशी सी छा गर्इ। बाबा भी कुछ परेशान हो गए। मनोज ने एक नारियल हाथ में लिया और बोला , बाबा, आप इसे खोलें , इसमें अवश्य ही फूल होंगें। बाबा ने उसे हाथ में लेकर पानी के कुछ छींटे देकर उसे पवित्र कर कुछ मंत्र पढ़े और जब उसे खोला तो उसमें फूल निकले।

क्यों, दादी माँ, अब तो कोर्इ बीमार नही पड़ेगा, देखो, अब फूल निकला है नारियल में।

बाबा को पोल खुलती नज़र आर्इ। उन्होंने शिष्यों से कहा कि आज उनकी तबियत ठीक नहीं है। अब वह दरबार कल सुबह लगाएंगे। लेकिन अब पासा पलट चुका था। बाबा को स्टेज पर जबर्दस्ती रोककर मनोज ने बताना शुरू कर किया, आमतौर पर साबुत नारियल के सिर पर तीन काली बिन्दी बनी होती है।

बस थोड़ी सी सावधानी से, इसमें से एक बिन्दी में छेद करके छोटी सी फूलों की 2या 3 कलियां नारियल में ड़ाल दी जाती हैं। करीब सात घण्टे पहले ही और फिर छेद को आराम से बंद कर दिया जाता है। ये तो बात रही कि नारियल में फूलों के निकलने की। अब बात बची है नारियल में आग लगने की।

तो होता यूं है कि नारियल के बालों या जटाओं में सोडियम के बहुत ही छोटे छोटे टुकड़े जो तेल से भिगो कर निकाले जाते हैंं। उन्हें इसमें छिपा कर रख देतें है और जब आप लोग नारियल चुन कर देतें हैं तो बाबा, उसमें जल छिड़क कर उसे शु़द्ध करते हैं, जो कि एक बहाना ही है।

असल में,  होता यह है कि केरोसिन युक्त सोडियम धातु पर पानी डलते ही वह जलने लगती है। बस, बाबा कह देते हैं कि परिवार पर कष्ट आएगा और वो भोली-भाली जनता से धन, गहने, जमीन आदि खूब ऐंठते हैं। क्यों बाबा, मैंने सब ठीक कहा ना। अगर कुछ भूल गया हूँ तो बता देंं।

मनोज ने अपनी बात पूरी की। बाबा सिर झुकाए बैठे रहे। उनकी पोल खुल चुकी थी। ये कुछ और नही बस जादू की ट्रिक्स ही थीं  उनके पास सारे गहने, रूपया, जमीन आदि वापिस करने के अलावा कोर्इ दूसरा रास्ता नहीं था। चारों तरफ मनोज की जय-जयकार होने लगी। दादी तो एकदम हक्की-बक्की सी बैठी ही रह गर्इ। वो बहुत खुश हुर्इ कि ढ़ोंगी को सबक मिल गया।

नारियल का फैसला

नारियल का फैसला

नारियल का फैसला कहानी आपको कैसी लगी … ???

Photo by YIM Hafiz

June 16, 2015 By Monica Gupta

झंडा उंचा रहे हमारा

झंडा उंचा रहे हमारा

 

indian flag photo

Photo by Darshan Simha

 

हमारा तिरंगा
बच्चों, मैं भारत की शान हूँ। तीन रंग लिए मैं सभी को निराला और मन भावन लगता हूँ। पता है, मैं हूँ कौन? जी हाँ, मैं हूँ भारत देश का ध्वज, यानि झण्ड़ा।
जब भी आप मुझे लहराते-फहराते देखते होंगे तो आपके मन में विचार जरूर उठता होगा कि आखिर मेरा जन्म कब कहाँ और कैसे हुआ। आज मैं आपको अपने सफर की कहानी सुनाता हूँ। मेरा रूप जैसा आप आज देखते हैं ऐसा नहीं था। मुझमें समय-समय पर बहुत बदलाव आए पर अब मेरी पहचान बन चुकी है। विदेशों में अनेक झण्ड़ों के बीच में मैं शान से इठलाता हूँ। पता है, 29 मर्इ, 1953 को मैं एवरेस्ट पर लहरा रहा था। मेरी कहानी कोर्इ एक दिन या एक समय की छोटी सी कहानी नहीं है। मेरा मस्तक ऊँचा रखने के लिए हजारों वीर सैनिकों ने बलिदान दे दिया। अपना खून पानी की तरह बहा दिया पर मेरी शान कम ना होने दी।
आपने रामायण या महाभारत तो जरूर पढ़ी होगी। उस समय की पताका या झण्ड़ा यानि मैं लम्बे त्रिभुज आकार में था। मेरे ऊपर भगवान सूर्य का चित्र अंकित रहता था। लंका में भी अलग प्रकार का झण्ड़ा फहराया जाता था। संस्कृत में भगवान विष्णु की पूजा में लिखे एक श्लोक को गरूड़ ध्वज कहा गया जबकि गीता में अर्जुन के ध्वज को कपि ध्वज के नाम से जाना गया। समय-समय मेरे रूप में परिवर्तन आता रहा। अंग्रेज़ी राज्य द्वारा स्थापित सरकारी भवन व मुख्य स्थानों पर यूनियन जैक फहराने लगा। बीसवीं सदी के शुरू में जब देशवासियों की कुछ आँखें खुली। अंग्रेज़ी अत्याचारों से जनता तंग आ चुकी थी। पता है, भारत का पहला झण्ड़ा 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौराहे पर फहराया गया। तब मुझमें तीन रंग लाल, पीला और हरा थे। लाल रंग वाले भाग में आठ सफेद कमल थे। बीच वाले पीले रंग पर नीले रंग में वन्देमातरम लिखा था। नीचे हरे भाग पर बायीं तरफ सफेद सूर्य और दायीं ओर आधे चन्द्रमा के बीच एक तारा बना हुआ था।
मैड़म कामा के दिमाग  में देश के लिए झण्ड़ा तैयार करने का विचार आया। जो झण्ड़ा उन्होंने बताया उसमें केसरिया, सफेद तथा हरा रंग रखा गया। पता है, केसरिया भाग में कमल तथा सात नक्षत्र थे। वन्देमातरम को विशेष लोकप्रियता मिली हुर्इ थी। बंकिम चन्द्र चटर्जी जोकि बगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे उन्होंने वन्देमातरम की रचना 1882 र्इ0 में की थी। समय धीरे-धीरे चल रहा था कि अचानक जलियाँवाला बाग के घटनाक्रम ने मेरा रूप ही बदल दिया। सन 1923 में झण्ड़े रंग-रूप, आकार का ध्यान रखा गया। मेरी लम्बार्इ और चौड़ार्इ में तीन और दो का अनुपात रखा गया। तीन रंग लाल, हरा, तथा सफेद रखा गया। सफेद रंग पर चरखे को अंकित किया गया। मुझ पर चरखा इस कारण लगाया गया क्योंकि गाँधीजी स्वदेशी प्रचार कर रहे थे। खददर को उस समय विशेष मान्यता दी गर्इ थी। सिर्फ चरखा ही लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकता था। इसलिए चरखे को मुझ पर अंकित करवाने की विशेष मान्यता मिली। अभी बात कुछ बननी शुरू ही हुर्इ थी कि सन 1923 में मर्इ महीने में नागपुर के वासी ने रोक दिया। बस तब काफी कहा-सुनी हुर्इ और झण्ड़ा सत्याग्रह का आरम्भ हो गया। 18 जुलार्इ 1923 को झण्ड़ा सत्याग्रह दिवस मनाने की घोषणा हो गर्इ थी और पता है इस आन्दोलन के कर्णधार कौन थे- लौह पुरूष सरदार वल्लभ भार्इ पटेल।
मेरे बारे में अनेको गीत लिखे गए जो उन लोगों के लिए प्रेरणा बने जो चाहते थे कि भारत आजाद हो, स्वतंत्र हो। समूचे राष्ट्र का एक ही लक्ष्य बन गया था कि यूनियन जैक के स्थान पर जब मैं फहरूंगा वही दिन हमारा सर्वश्रेष्ठ दिवस होगा। वीरों की मेहनत रंग लार्इ। 26 जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने की परम्परा पणिड़त जवाहर लाल नेहरू द्वारा आरम्भ की गर्इ। फिर मुझमें काफी बदलाव आए। चरखे का रूप छोटा कर दिया गया। हर रंग विशेष सूचक बना दिया गया। सन 1933 र्इ0 में मुम्बर्इ में एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि मेरा रंग तिरंगा ही होगा और 3 गुणा 2 का आयताकार होगा और मेरे तीन रंग भगवा, श्वेत तथा हरा होगा। 30 अगस्त,1933 र्इ0 का दिन ध्वज दिवस के रूप में मनाया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी यह साबित कर दिया कि राष्ट्रीय ध्वज ही किसी देश के गौरव का चिन्ह है और मेरा सम्मान ही देश का सम्मान है।
22 जुलार्इ 1947 र्इ0 को मुझे नया रूप प्रदान किया गया। अनुपात भी पहले वाला था, रंग भी तीन थे किन्तु सफेद रंग पर बने चरखे के स्थान पर चक्र अंकित कर दिया गया। यह चक्र सारनाथ के स्तम्भ से लिया गया जोकि लगभग ढ़ार्इ हजार से भी पहले अशोक ने बनवाया था। इसी स्तम्भ के ऊपर बनी शेरों की त्रिमूर्ति राज्य चिन्ह के रूप में स्वीकार की गर्इ।
चक्र में चौबीस रेखाएं हैं। इनका अभिप्राय चौबीस घण्टों से बताया गया है। दिन-रात, चौबीस घण्टे हम अपने कार्यों  में लगे रहे यही प्रेरणा हमें चक्र देता है। दूसरी ओर चक्र का अर्थ हम गतिशीलता से भी लगा सकते हैं। जहाँ एक ओर सफेद रंग को विद्वानों ने सादा जीवन उच्च विचार का प्रतीक माना है वहीं हरा रंग विश्वास का प्रतीक है जोकि मनुष्य की अनिवार्य अच्छार्इ है। हरियाली को भी हरे रंग में माना गया है। मुझ में हरे रंग को इसलिए भी स्थान मिला है क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। केसरिया रंग की प्रेरणा से ही वीरों में, नौजवानों में त्याग और बलिदान की ललक बढ़ी थी।
सच, मैं किसी राज्य या वर्ग का ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का हूँ। मैं जहाँ भी लहराऊंगा उन सभी को स्वतंत्रता, प्रेम और भार्इचारे का सन्देश देता ही रहूंगा।
झण्ड़ा ऊंचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

जय हो                         जय हो                                            जय हो

June 16, 2015 By Monica Gupta

Nature

Nature

 plant and sun photo

Nature  (poem)

एक तरफ
तपता सूरज
जलती धरा
मन बेचारा
अकेला पड़ा………बेसहारा
दूसरी ओर
नन्हा पौधा
गर्मी की मार
सह ना सका
और
पनपते ही कुम्हला गया
काश
मिल जाता
किसी का सहारा
या फिर शीतल धरा
और पनप जाता
पर……
वो चुपचाप…….खामोश सा
पड़ा रहा
मन भी ऐसा ही है
खामोश, चुपचाप
एकदम अलग-अलग
काश……..
मन कुछ कर सकता
झुलसते पौधे को देखकर
सहला सकता
तभी अचानक
रूक गए मेरे पानी पीते हाथ
उड़ेल दिया पानी
उस नन्हें पर
तब तक
सूरज की लौ
पड़ चुकी थी मद्धम
ठण्ड़े झोंको से
आने लगी उसमे जान
इधर………..
मुस्कुरा उठा मेरा मन
उधर….
जलती धरा भी
शांत हो गर्इ
अब……..
नन्हें को मिल गया था एक सहारा
शीतल धरा का
एक तरफ……….
प्रकृति खिलखिलार्इ
दूसरी तरफ……….
मन मुस्कुराया

Nature

June 16, 2015 By Monica Gupta

योग दिवस

cartoon Yoga diwas by monica gupta21 जून को योग दिवस मनाया जाएगा. सरकारी दफ्तर के सभी  कर्मचारी  इसी में जुटे हैं और कार्य शून्य …

| Zee News Hindi

नयी दिल्ली : सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन ने राजपथ पर आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह का गणतंत्र दिवस समारोह जैसा कवरेज करने की योजना तैयार की है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शरीक होंगे।

सूत्रों ने बताया कि समारोह के कवरेज के लिए दूरदर्शन 20 हाईडेफिनिशन कैमरे लगाएगा। संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर घोषित किया है। दो कैमरे इंडिया गेट के उपर लगाए जाएंगे और इंडिया गेट से विजय चौक तक के विहंगम दृश्य को दिखाने के लिए हाइड्रोलिक क्रेन पर कई कैमरे लगाए जाएंगे। ऐसा अनुमान है कि समारोह के दौरान योगासन करने के लिए रिकॉर्ड संख्या में लोग हिस्सा लेंगे। सूत्रों ने बताया कि करीब 18 कैमरे मुख्य मंच को कवर करेंगे और प्रस्तुतियों का पूरा कवरेज सुनिश्चित करेंगे।

इसके सीधे प्रसारण के लिए कई आउटडोर प्रसारक वाहनों को भी सेवा में रखा जाएगा। सूत्रों ने बताया है कि इसका कवरेज अंतरराष्ट्रीय मानक का हो यह सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक उपकरण का इस्तेमाल होगा।

समारोह के सीधे प्रसारण के लिए इंजीनियर, सिनेमेटोग्राफर और अन्य संबंधित विशेषज्ञों का एक विशेष दल ड्यूटी पर होगा। क्रू के ज्यादातर सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, कॉमनवेल्थ खेल इत्यादि जैसे विशाल समारोहों के आउटडोर प्रोडक्शन का अनुभव हासिल है। | Zee News Hindi

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : देश-विदेश में समारोहों में हिस्सा लेंगे सरकार के वरिष्‍ठ मंत्री

21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए मोदी सरकार के वरिष्ठ मंत्री देश-विदेश में समारोहों में हिस्सा लेंगे। बीजेपी ने भी सभी राज्य इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए कहा है। मगर ये नसीहत भी दी है कि इस मौक़े पर पार्टी का झंडा या चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने के बजाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोटो लगाया जाए।

सूत्रों के मुताबिक़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में राजपथ पर आयोजित मुख्य कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पटना में योग दिवस के कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज न्यूयार्क, वित्त मंत्री अरुण जेटली सैन फ्रांसिस्को और अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला शिकागो के कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे…..

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June 16, 2015 By Monica Gupta

स्वच्छता एक अहसास

स्वच्छता एक अहसास

sawacchta  book by monica gupta

स्वच्छता एक अहसास…

2009 में प्रकाशित हुई ये मेरी तीसरी किताब है. 56 पेज की है तो ये छोटी सी किताब पर इस किताब में आसाधारण गांव के लोगों की जागरुकता का वर्णन है कि कैसे मात्र 90 दिन में उनमें जागरुकता आई और हरियाणा के सिरसा के 333 गांवों को स्वच्छ बना दिया.

स्वच्छता एक अहसास

पुस्तक को लेकर आपके मन में ढ़ेरो सवाल उठ रहें होंगें कि आखिर इस पुस्तक के माध्यम से स्वच्छता का अहसास कैसे करवाया जा सकता है। सच पूछो तो, हम सभ्य समाज के सभ्य नागरिक हैं, पढे़- लिखे और समझदार भी हैं लेकिन सही मायनों में देखा जाए तो अनपढ़ और असभ्य की श्रेणी में आते हैं क्योंकि जिस समाज में हम रहतें हैं उसी को गंदा कर रहें हैं।

यहां बात भ्रष्टाचार की नहीं बलिक उस कूडे़- कर्कट की है जो हमारें चारों तरफ फैला है और कूडेदान एक तरफ खडे़- खडे़ गंदगी का मुँह ही ताकते रह जातें हैं और तो और सड़क के किनारें, दीवारों की ओट को शौचालय का रूप देकर दिन-रात गंदगी में इजाफा किया जा रहा है। सड़क पर चलते हुए थूकना और पूरी सड़क को कूडादान समझना आम बात है।

अगर यह पढ़े- लिखे सभ्य समाज को चित्रित करता है तो गाँव वालों को किस श्रेणी में रखेंगें क्योंकि वो तो वैसे भी अनपढ़, सीधे-साधारण गरीब, किसान और मज़दूर होतें हैं।
स्वच्छता एक अहसास
भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के अन्तर्गत गाँव वासियों की सोच में एक ऐसा बदलाव, ऐसी जागरूकता देखने को मिली जिसकी सपनें में भी कल्पना नहीं की जा सकती थी। बस, यहीं मुझे पुस्तक लिखने का मकसद मिल गया कि आज जो अहसास इन गाँव वासियों को हो रहा है उसकी महक उन लोगों तक भी पहुँचे जो अभी तक इससे अछूते हैं।

मैनें अपनी तरफ से पुस्तिका में स्वच्छता और उससे आए बदलाव के बारे में जानकारी देने की पूरी कोशिश की है और मुझे उम्मीद ही नही पूरा विश्वास है कि इसको पढ़ने के बाद आप भी और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने में मदद करेंगें।

स्वच्छता एक अहसास  …

स्वच्छ भारत मिशन …

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) पंचायतीराज विभाग, भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही एक महत्वपूर्ण योजना है जिसका पूर्व में नाम निर्मल भारत अभियान था। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के निम्न उद्देश्य हैं:-
1. ग्रामीण क्षेत्रों के सामान्य जीवन स्तर में सुधार लाना।
2. समस्त ग्राम पंचायतों को निर्मल एवं स्वच्छ बनाना।
3. ग्रामीण क्षेत्र के समस्त शासकीय विद्यालयों को स्वच्छता सुविधाओं (स्वच्छ स्कूल शौचालय जलापूर्ति सहित) से आच्छादित करना साथ ही छात्र-छात्राओं को स्वास्थ्य, शिक्षा एवं साफ-सफाई की आदतों को बढ़ावा देना।
4. ग्रामीण क्षेत्र के समस्त आंगनवाड़ी केन्द्रों को स्वच्छता सुविधाओं से आच्छादित करना।?
5. सामान्य पर्यावर्णीय स्वच्छता हेतु ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबन्धन अर्थात् कूड़े कचरे एवं बेकार पानी की उचित निकासी पर कार्य करना।
मानव मल एवं पर्यावरण में इधर-उधर पड़े कूड़े-कचरे एवं बेकार पानी के कारण विभिन्न प्रकार के रोग जैसे डायरिया, मलेरिया, कालरा, जापानी इन्सेफ्लाइटिस, पोलियो जैसी भयानक बीमारियों की रोकथाम हेतु, जल स्रोतों को सुरक्षित रखने हेतु, पर्यावर्णीय स्वच्छता हेतु यह योजना अत्यन्त आवश्यक है।हमारे प्रधान मंत्री जी द्वारा आरम्भ किया गया

महात्मा गांधी ने जिस भारत का सपना देखा था उसमें सिर्फ राजनैतिक आजादी ही नहीं थी, बल्कि एक स्वच्छ एवं विकसित देश की कल्पना भी थी। महात्मा गांधी ने गुलामी की जंजीरों को तोड़कर मां भारती को आजाद कराया। अब हमारा कर्त्तव्य है कि गंदगी को दूर करके भारत माता की सेवा करें। मैं शपथ लेता हूं कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूंगा और उसके लिए समय दूंगा।

हर वर्ष 100 घंटे यानि हर सप्ताह 2 घंटे श्रमदान कर के स्वच्छता के इस संकल्प को चरितार्थ करूंगा। मैं न गंदगी करूंगा न किसी और को करने दूंगा। सबसे पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से, मेरे मुहल्ले से, मेरे गांव से एवं मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूंगा।

मैं यह मानता हूं कि दुनिया के जो भी देश स्वच्छ दिखते हैं उसका कारण यह है कि वहां के नागरिक गंदगी नहीं करते और न ही होने देते हैं। इस विचार के साथ मैं गांव-गांव और गली-गली स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार करूंगा। मैं आज जो शपथ ले रहा हूं, वह अन्य 100 व्यक्तियों से भी करवाऊंगा। वे भी मेरी तरह स्वच्छता के लिए 100 घंटे दें, इसके लिए प्रयास करूंगा। मुझे मालूम है कि स्वच्छता की तरफ बढ़ाया गया मेरा एक कदम पूरे भारत देश को स्वच्छ बनाने में मदद करेगा।

 

राजस्थान सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को अब घरों में शौचालय बनाना अनिवार्य कर दिया है.

राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को अब घरों में शौचालय बनाना अनिवार्य होगा. सरकार से पचास हजार का कर्जा लेने वाले काश्तकारों के लिए भी कर्ज लेने के लिए इस शर्त को पूरा करना होगा.

राज्य सरकार द्वारा स्वच्छ भारत मिशन योजना के तहत मार्च 2018 तक प्रदेश को खुले में शौच से मुक्त करने के अनूठे कार्यक्रम में ऐसी कई शर्तें जरूरी की गई है.

खास यह कि कर्मचारियों को 20 जून तक शर्त की पालना के लिए निर्धारित प्रपत्र में उद्घोषणा करनी होगी। इसके आधार पर ही उन्हें जुलाई माह में होने वाली वार्षिक वेतन वृद्धि, मानदेय,ऋण आदि स्वीकृत के लाभ दिए जाएंगे. इस कार्यक्रम की निगरानी मुख्यमंत्री कार्यालय कर रहा है. : , – Regional News – Samay Live

June 16, 2015 By Monica Gupta

मैं हूं कौन

व्य़ंग्य

मैं हूं कौन

अरे दीवानों … मुझे पहचानो … कहां से आया … मैं हूं कौन ???
मैं हूं कौन .. जी हाँ, क्या आप जानते हैं कि मै हूँ कौन …चलिए मैं हिंट देता हूँ .. सबसे पहले मै यह बता दूं कि मैं आम आदमी नही हूँ . मुझसे मिलने के लिए लोगो की भीड लगी रहती है पर मै जिला उपायुक्त नही हूँ. मेरे आगे पीछे 4-4 अंगरक्षक घूमते हैं पर मै पुलिस कप्तान भी नही हूँ .मेरे पीछे दिन रात जनता पडी रहती है पर मै कोई स्वामी जी या कही का महाराज भी नही हूँ. मेरे बच्चे स्कूल मे प्रथम आते हैं और सभी स्कूल के प्रोग्रामो मे हिस्सा लेते हैं सारा स्टाफ मेरा सम्मान करता है पर मै स्कूल का प्रिसीपल भी नही हूँ.
जिले मे कोई भी कार्यक्रम होता है तो मुझे जरुर बुलाया जाता है . मेरे साथ फोटो खिचवाई जाती है. रिबन कट्वाया जाता है ताली बजा कर स्वागत किया जाता है मेरी बातो को समाचार पत्र मे मुख्य स्थान दिया जाता है पर मै किसी समाचार पत्र का सम्पादक भी नही हूं. मेरे पास सभी खास अफसरो के फोन आते रहते है या मै जब भी फोन करता हू तो वो तुरंत पहचान जाते हैं और मुझे और मेरे परिवार को भोजन पर बुलाते हैं. मुझे देख कर कौन कितना जला भुना या कितना खुश हुआ मैं सब जानता हूँ.

फिर  मैं हूं कौन…..

 

spoon  photo

 

आप सोच रहे होगें कि मैं यकीनन ही कोई पागल हूं जो ऐसे ही बात किए जा रहा है तो जनाब, मै बताता हू कि मै कौन हूँ . मै हूँ “चमचा” एक दम चालू चक्रम चमचा .लोगो की चापलूसी करने मे सबसे आगे .थूक कर चाट्ने मे सबसे आगे . शहर मे कौन बडा अफसर है कौन नेता है उनकी पत्नी, बच्चे और तो और उनके कुतॆ का नाम उसकी पसंद ना पसंद सभी मुझे पता है . सभी को खुश रखना मेरा परम धर्म है तभी तो लोग मुझे फोन करके मुझसे मिलने को बैचेन रहते हैं क्योकि वो जानते है कि मै ही उनके काम करवा सकता हूँ.
मै भी महान हूँ पता है जब मेरा मन होता है तब फोन उठाता हूँ

जब मन नही होता तब फोन उठाता ही नही चाहे कितनी घंटी बजती रहे. मै जानता हूँ कि जिसने मेरे पास चक्कर लगाने है वो तो लगाएगा ही चाहे घंटो ही इंतजार ही क्यो ना करना पडे
ना सिर्फ बडे लोगो से बलिक मीडिया से भी मै बना कर रखता हूँ. समय समय पर मैं प्रैस कांफ्रैस करता रहता हूँ ताकि वो सैट रहे. लोगो के काम के लिए लंबी कतार मेरे घर या दफतर मे कभी भी देखी जा सकती है . पता है मै गिरगिट की तरह रंग बदलने मे माहिर हूँ.

कल जो मेरा जानी दुश्मन था आज वो मेरे साथ बैठ कर चाय पी रहा होता है.या आज मै जिसके संग चाय पी रहा हू वो कल मेरा जानी दुश्मन बन सकता है काम निकलवाने के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ किसी भी हद तक जा सकता हूँ. बस अधिकारी लोग खुश रहने चाहिए.

ये चमचागिरि मुझे अपने बडो से विरासत मे नही मिली बलिक समय और हालात को देखते हुए मुझे सीखनी पडी .मै जानता हूँ कि भले ही लोग मुझे पीठ पीछे गाली देते होगें मुझे अकडू की उपाधि भी दे दी होगी पर मुझे कोई असर नही. मै आज जो भी हूँ बहुत खुश हूँ.
तो दोस्तो, अगर आप भी खुश रहना चाहते हैं तो एक बार चमचागिरी के मैदान मे आ जाओ यकीन मानो एक बार समय तो लगेगा, अजीब भी लगेगा पर कुछ समय बाद आपको खुद ही अच्छा लगने लगेगा.
सच पूछो तो आज का समय शराफत, महेनत और ईमानदारी का नही है क्योकि उनकी कोई कद्र ही नही है या ये कहे कि सबसे ज्यादा पिसता ही शरीफ आदमी है इसलिए तो मुझे भी चमचागिरी को अपनाना पडा. तो अगर आप सुखी रहना चाहते है अपने सारे काम भी निकलवाना चाहते हैं तो बनावट और दिखावे की दुनिया मे आपका स्वागत है बिना देरी किए तुरंत आए और अधिक जानकारी के लिए शहर के किसी भी बडे अफसर से आप मेरा पता पूछ सकते हैं….

मैं हूं कौन…..

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सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग लेखन

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग लेखन – Social Networking Sites aur Blog Writing –  Blog kya hai .कहां लिखें और अपना लिखा publish कैसे करे ? आप जानना चाहते हैं कि लिखने का शौक है लिखतें हैं पर पता नही उसे कहां पब्लिश करें … तो जहां तक पब्लिश करने की बात है तो सोशल मीडिया जिंदाबाद […]

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