
Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber
By Monica Gupta


By Monica Gupta
By Monica Gupta
( व्यंग्य )
दैनिक भास्कर की मधुरिमा मे प्रकाशित
By Monica Gupta
(व्यंग्य)
By Monica Gupta
दौरा बनाम दौरा ….
आज अचानक सुबह सुबह नेता जी ने घोषणा कर दी कि अभी विदेश दौरे पर जाने की बजाय वो सीधा तिहाड के दौरे पर जाएगे क्योकि भारी अव्यवस्थाओ के चलते वहां देखना भी बहुत जरुरी है. आनन फानन में सायरन बजाती हुई गाडियो का काफिला अगले ही पल तिहाड के भीतर था.
काजू और बादाम खाते हुए नेता जी ने बहुत ध्यान से सभी बातो का मुआयना करना शुरु किया.सबसे पहले गेट पर खडे संतरी को बहुत प्यार से देखा और उसकी पीठ पर थपकी दी. फिर पूरा मुआयना किया कि कैसे कैदी सुबह उठ कर दिनचर्या अपनाते है और उन्हे किन किन बातो की कमी लगती होगी. सबसे पहले तो सैर करने के लिए जगह तैयार करवाने के आदेश दिए.ताकि ताजी हवा का आनंद ले सकें. कुछ कमरो को वीआईपी सैल बनाने की धोषणा की कि जब कोई बडा नामी गिरामी बीमार नेता आए तो उसे किसी प्रकार की दिक्कत का सामना ना करना पडे.
खाने मे भी अच्छे कुक रखने के आदेश दिए ताकि कोई कैदी खाकर बीमार ना पडे क्योकि मीडिया मे एक बार खबर आ जाए तो बहुत किरकिरी हो जाती है. फिर बात आई शौचालयो की. अच्छे स्वास्थ्य के लिए साफ सुथरे बाथरुम निंतांत आवश्यक हैं इसलिए ज्यादा शौचालय बनाने के भी आदेश दे दिए गए औरयह हिदायत भी दी गई कि सभी सफाई कर्मचारी 24 घंटे डयूटी पर ही तैनात रहें.
हर रोज कुछ ना कुछ क्रियात्मक होता रहे इसलिए मनोरंजन के लिए भी आदेश दिए गए ताकि दुखी कैदियो का ध्यान सुसाईड करने पर ना जाए और उसमे जीने की नई आशा का संचार होता रहे.छोटा फ्रिज,गद्दा और छोटा रेडियो या छोटा टीवी भी सभी कमरो मे लगे इसका भी ध्यान रखना बहुत जरुरी है और और नेता जी बोलते जा रहे थे और उनका सैक्रेटरी लिखे जा रहा था. तभी किसी ने पीछे आकर कहां कि आपके जाने का समय हो गया है. उन्होने तुरंत गाडी निकालने के आदेश दिए ताकि कही विदेश जाने वाली फ्लाईट मिस ना हो जाए. और अगले दौरे का भी दिन तथा समय निश्चित कर लिया ताकि जिन कामो के आदेश दे दिए है वो लागू हुए है या नही.
तभी उन्हे ऐसा लगा कि कोई उन्हे झंकोर रहा है. अचानक वो उचक कर उठ बैठे. हवलदार उन्हे उठा रहा था कि इतनी देर से क्या बडबडाए जा रहे हो… वो नींद से जागे… अरे!!! वो तो खुद कैदी हैं.छोटा सा कोठरीनुमा कमरा, पुराना सा मटका,थाली कटोरी,चम्मच, और मटमैली सी चादर मानो उन्हे चिढाती हुई हंस रही थी.उफ!!! कहां तो नेता जी दौरा करने आए थे और ये क्या …!!! अचानक नेता जी को एक बार फिर दौरा पडा और एक लंबी सांस लेते हुए वो एक तरफ लुढक गए…..पीछे संगीत चल रहा था …ए मालिक तेरे बंदे हम …ऐसे हैं हमारे कर्म …!!!!!
कैसा लगा आपको ये व्यंग्य… जरुर बताईएगा 🙂
By Monica Gupta


Satire – व्यंग्य
असल मे, वो क्या है ना हम चाहे कुछ भी हो पर स्टेट्स सिंबल बन चुका है कुत्ता पालना.. जिसे हम सभ्य भाषा मे पप्पी,डागी या मेरा बच्चा के नाम से पुकारते हैं.
अभी परसो ही जब मुझे प्रमोशन मिली और मैने सखी को यह खुशखबरी दी कि अब तो मुझे गाडी भी मिल जाएगी तो लम्बू जी यानि अमिताभ जी के स्टाईल मे कमर पर हाथ रख कर वो बोली वो सब तो ठीक है हंय…. पर क्या कुत्ता है तुम्हारे पास. बस इतना अपमान मै सहन नही कर सकी और ठान ली कि चाहे कुछ भी हो जाए कुत्ते ( ओ क्षमा करे) डागी को तो खरीद कर ही रहूगी.चाहे जो हो सो हो ..भई आखिर स्टेट्स सिंबल का सवाल जो ठहरा. आखिर वो अपने को समझती क्या है . हम भी कुत्ते वाले क्यो नही बन सकते.
यही सब विचारते भुनभुनाते घर पहुंच कर सोचा था कि किसी ना किसी पर गुस्सा जरुर निकालूगी और अगर कोई नही मिला तो कांच वगैरहा का गिलास ही पटक कर तोड दूगी पर पर पर तभी काम वाली बाई का मोबाईल पर मैसेज आया कि आज वो नही आएगी इसलिए ये प्रोग्राम भी कैंसिल करना पडा क्योकि झाडू जो खुद लगानी पडती. खैर खाली मुहं फूलाने से ही काम चलाना पडा.
उसी शाम को किट्टी पार्टी मे जाना था वहां सभी शायद किसी अंग्रेजी फिल्म या किसी हीरो की बात कर रहे थे. जैसे बाक्सर, हासा, एप्सो, ग्रेट्डेन, सेट्बर्नार्ड,
खैर उसी समय मैने निश्चय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए कल तक एक कुत्ता मेरे भी घर की शोभा बढाएगा ही बढाएगा. दिखावे का शौक ऐसा चढा कि अगले दिन स्पेशल दिल्ली गए और अलग अलग नस्लो से दो चार हुए. ग्रेटडेन की खूंखार बाडी देखकर, उनका खाना पीना और उसका रेट सुनकर पसीना ही छूट गया यानि चक्कर खाकर गिरते गिरते बची. बहुतों को देखने के बाद यही फैसला किया गया कि हल्का सा पामेरियन ही ले चलते हैं पर बात पक्की होते होते यही फाईनल हुआ कि अल्सेशियन ही ले कर जाएगे.
हालांकि इसके खाने पीने, रहन सहन के बारे मे जानकर बार बार श्वास अटकने लगी पर शौक था इसलिए चेहरे पर मुस्कान लिए सब समझती रही. अगले कुछ ही पलों में चैक से भुगतान करने के बाद उसे गाडी मे लेकर हम घर लौट आए.
शाम को आते ही अपने फ्रैड सर्किल को न्यौता दे आई. वो अलग बात है कि भारी भरकम आवाज मे उसके भौकने की आवाज सुन सुन कर सिर दर्द हो चला था. फिर इसका वो सब साफ करना जिसकी आदत ही नही थी और उसे वो सब खिलाना जो मैने कभी सपने मे भी नही सोचा था… लग रहा था बहुत जल्दी मेरा शौक शोक मे बदल रहा है.शाम को सभी सहेलियां अपने अपने पप्पी के साथ उससे मुलाकात करने आई थी.
दोपहर बाद इसका ट्रैनर भी आ गया कि ताकि हमे इसकी आदतो केर बारे मे सीखा सके.पर सच पूछो तो इस कुत्ते के ऐशो आराम देख कर मेरा पूरा शरीर शेक करने लगा है. नाश्ता, दोपहर का भोजन फिर कभी उसे सैर करवाना तो कभी उसके नखरे देखना. मेरा पूरे घर का बजट चार दिन मे ही बिगड चुका है. ट्रैनर का खर्चा देखकर हमने उसे बहुत जल्दी विदा कर दिया पर … पर … पर … कोई शक नही कि शौक के चक्कर मे सारा शरीर शोक मे है और घबराहट और डर के मारे शेक कर रहा है. अब मै उसे निकालना चाह रही हूँ पर इतने रुपए खर्च करके खरीदा था इतने मे कोई खरीदने को तैयार ही नही है.
उसे घर मे लाए आज 10 दिन हो चुके हैं मुझे शक है कि मै उसकी वजह से बहुत जल्दी पागल होने वाली हूं. रात के 12 बजे है और वो फिर भौंक रहा है पता नही उसे भूख लगी है या धूमने जाना है. बस अब तो जैसे भी हो… इसे बाहर का रास्ता दिखाना ही पडेगा चाहे जो हो सो हो.!!!
Satire … व्यंग्य
शौक, शोक, शेक और शक ….कैसा लगा आपको ये व्यंग्य जरुर बताईएगा …

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