डर
डर
Exit Poll Bihar
बिहार चुनाव पर वोटिंग खत्म होते ही जिस तरह से सभी न्यूज चैनल Exit Poll Bihar का दिखा रहे हैं तो स्वाभाविक है कुछ नेताओ का डर …. इसलिए पलंग के नीचे छिपने … अब उनका भय डर दूर किया जा रहा है कि बाहर आईए ये मात्र Exit Poll है सच मुच के नतीजे नही .. पर नेता जी का हाल बेहाल है…
डर
Exit Poll Bihar
देश का बिगडा माहौल
देश का बिगडा माहौल
देश का बिगडा माहौल बनाम जंगल राज … हद ही है .. सभी कह रहे हैं कि देश का माहौल बिगड गया है … दूसरो शब्दों में ये कहें कि जंगल राज आ गया है … अब यही बात सुबह सुबह की सैर पर फोन पर कर रही हैं श्रीमती जी पर उनके पालतू ने तो जंगल राज का नाम सुन कर अपने परिवार को ही फोन करके बुला लिया …
अब बताईए कि क्या किया जाए !!!
देश का बिगडा माहौल
सहिष्णुता बनाम सहनशीलता

सहिष्णुता बनाम सहनशीलता
गूगल सर्च में आप देखेगें तो पाएगें कि चाहे बडे से बडा नेता हो, लेखक हो, इतिकास कार हो , फिल्मी दुनिया से शाहरुख, सलमान खान हों या योग गुरु बाबा रामदेव हो या फिर सोशल नेट वर्किंग साईट हो, गूगल प्लस हो,टवीटर हो, फेसबुक हो, ब्लाग हो या अन्य साईटस या फिर मीडिया, अखबार और न्यूज चैनल…. सभी सहिष्णुता और असहिष्णुता के विषय पर जम कर बोल रहे हैं न सिर्फ वो जम कर बोल रहे हैं बल्कि बहस भी कर रहे हैं किंतु मैं आपको बोलना चाहूंगी कि वो तो बडे लोग हैं. कुछ भी, कभी भी, कैसे भी, कहीं भी बोल सकते हैं पर आपको बहुत सोच समझ और विचार के बोलना होगा
.देखिए अन्यथा न लीजिए बस मेरे कहने का यही भाव है कि सहिष्णुता या असहिष्णुता बोलने से पहले एक बार तसल्ली कर लें कि आपको ये शब्द बोलने में कोई कठिनाई तो नही. वो क्या है ना जरा मुश्किल है बोलने में. वैसे शब्द अच्छा है बोलने में रौब सा भी पडता है पर अगर आप इसे बोलने से दिक्कत महसूस कर रहे हैं, अटक कर बोलना पड रहा है तो प्लीज रुकिए आप इसे असहनशीलता या सहनशीलता बोल सकते हैं दोनो के मायने एक ही है यानि सहिष्णुता और असहिष्णुता या सहनशीलता या असहनशीलता ….
और जहां तक लिखने की बात है वो तो आप कापी पेस्ट कर ही सकते हैं इसमे कोई दिक्कत नही…. अब जब मायने एक ही है फिर बोलने में टेंशन किसलिए लेनी इसलिए ये मेरा सुझाव है… !!
हां …तो आप क्या कह रहे थे सहिष्णुता, असहिष्णुता के बारे में …!! बोलिए बोलिए बेबाक होकर पूरे विश्वास के साथ अपनी राय रखिए . किसी की स्वत्रंता हमें मिले या न मिले पर कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता तो है ही…
सहिष्णुता बनाम सहनशीलता
टवीटर के टवीट

टवीटर के टवीट
खबरों का बदलता रवैया
टवीट का बढता रुतबा …
ना महंगाई से डर लगता है ना भूकम्प से… डर लगता है तो बस टवीट से
टवीट से डर लगने के बहुत कारण है….
पहले ऐसा नही था. एक समय था जब टवीट शुरु हुआ था तो अच्छा लगा था और सोचा था कि कम शब्दों में हम अपनी बात कह सकेंगें पर ना जाने ये किस दिशा में बह गया. अब तो बहुत कुछ गलत सलत, गंदा, अश्लील, अंट शंट सब इसमे है..!! पर पर पर सभी दुखी नही हैं इससे … अब हमारे खबरिया चैनल को देखिए.. उन्हें तो बैठे बिठाए टीआरपी मसाला मिल गया है.
किसी का टवीट आता है.. फिर उसी टवीट पर आवाज उठती है. न्यूज चैनल वाले सर्तक हो जाते हैं और उस टवीट पर आई प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर चालू हो जाता है. काम की बात ये होती है कि टवीट बैसिर पैर का होता है और फिर शुरु हो जाती है उसी टवीट पर बहस … चैनल पर बैठ कर चीखतें हैं चिल्लाते हैं फिर शाम को खबर आती है कि जिस व्यक्ति ने टवीट किया था उसने अपना टवीट वापिस ले लिया.. अरे !! तो क्या हुआ !! कोई दिक्कत नही … उन्होनें अपना टवीट वापिस क्यो लिया, किसलिए लिया, इस पर भी बहस चालू होगी…
हे भगवान !! ऐसे मे आप हमारे सहिष्णु, सहनशील होने की उम्मीद कैसे रख सकते हैं.. बिल्कुल बढ रही है असहिष्णुता, असहनशीलता … !!!
वैसे टवीटर के टवीट के बारे में आपकी क्या राय है… जरुर टवीट करके बताईएगा !! ह हा हा !!!
सबक
सबक
जिंदगी का सबक !! सबक यानि lesson पाठ … जिंदगी हमें तरह तरह से सबक सिखाती रहती है. अच्छी बातो का सदा स्वागत करना चाहिए..
मेरी सहेली मणि के घर कोई सपरिवार आए हुए थे. देखने में बहुत साधारण पर बातचीत में बेहद सलीकेदार और हर बात हाथ जोडे कर रहे थे. मैं उन्हें नही जानती थी. उनके जाने के बाद मणि ने जो बताया. वो मैं आप सभी को बता रही हूं.
लगभग सात आठ साल पहले मणि सपरिवार मार्किट बच्चो के लिए पैन खरीदने गई थी. दुकान पर बहुत भीड थी. मणि ने पैन लिए और पचास रुपए दुकानदार को दे दिए. उसके पति कार मे ही बैठे रहे. कुछ देर में दुकानदार ने उसे तीन पैन दिए के साथ साथ पचास रुपए भी दे दिए और दूसरे ग्राहको को सामान देने लगा. मणि पहले तो कंफ्यूज हुई पर बाद में मन ही मन खुश हो गई कि मजा आ गया. पैन फ्री मे आ गए. मम्मी को खुश देख कर बच्चे भी खुश हो गए. कार मे बैठ कर जब उसने अपने पति को खुशी खुशी बात बताई तो उसे बहुत डांट पडी. उन्होने कहा कि यह बिल्कुल गलत है. दुकानदार को पैसे वापिस देकर आओ. वो मुंह बना कर बेटे के साथ वापिस दुकान पर गई.
जब रश काम हुआ तो उसने दुकानदार को सारी बात बताई. उस समय तो दुकानदार ने अपनी व्यस्तता बताते हुए पैसे काट कर उसे दस रुपए वापिस कर दिए पर कुछ समय बाद कही से पूछते पाछ्ते वो सपरिवार उपहार लिए उनके घर आया. उस दिन दीपावली थी. उसने अपने बच्चों से कहा कि इन से सीखों .ऐसे भी लोग दुनिया मे होते हैं.
उस दिन मणि को बहुत झेंप भी महसूस हुई पर खुशी भी हुई कि आज वो किसी के लिए तो प्रेरणा बनी. बात पचास रुपए की नही है बल्कि हमारी सोच की है अगर मणि उस दिन अपने पति के कहने पर रुपये न वापिस करती तो जिंदगी तो वैसे ही चलती रहती और उसके बच्चों को एक गलत सबक मिलता पर अब मणि के साथ साथ उसके बच्चे भी एक सीख ले चुके थे. उस बात के बाद से अब वो दुकानदार सपरिवार हर साल दीपावली पर आता है.
सबक कैसा लगा ? जरुर बताईएगा !!
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