हिंदी दिवस
हिंदी दिवस की बधाई तो बनती है … बेशक , अगर तुलना करें तो हम भारतीय अंग्रेजी बोलने में अपनी शान समझते हैं और पलडा भी अंग्रेजी का ही भारी है बस आज हिंदी दिवस रुपी गुब्बारे मे हवा भरी जा रही है ताकि आज तो ये उंचाईयों पर रहे और कल से तो फिर वही !!!
वैसे आप चाहे कुछ भी समझे आज अगर हम नेट पर हिंदी लिख पा रहे हैं तो वो सिर्फ और सिर्फ गूगल की वजह से गूगल ने हमें हिंदी में अपनी बात कहने लिखने का मौका दिया इसलिए सबसे बडा धन्यवाद गूगल को है…
मुझे हिंदी पर गर्व है और हमेशा रहेगा … !!!
हिंदी दिवस
हिंदी दिवस …
हिंदी दिवस पर मेरा धन्यवाद गूगल को है जिसमे हिंदी की पहचान को बढाया और हमे अपनी बात हिंदी में लिख पाए … बेशक हिंदी का क्रेज विदेशियों में भी बहुत बढा है और पढ कर अच्छा लगता है जब वो हमारी हिंदी में लिखी पोस्ट को पसंद करते हैं
हिंदी दिवस
बेशक पलडा आज भी अंग्रेजी का ही भारी है फिर भी तुम हमें हमेशा से प्रिय थी , हो और हमेशा रहोगी … मेरी प्यारी हिंदी 🙂
अच्छे दिन
अच्छे दिन
अच्छे दिन लाने के लिए बहुत मेहनत करनी पडती है .. ऐसा नही की आपने गाना गाया और अच्छे दिन आ गए. समय लगता है बहुत कुछ त्यागना पडता है बहुत कुछ निगलना या गटकना पडता है बहुतों से ना चाह्ते हुए भी मिलना पडता है और बहुत चाह्ते हुए भी किसी से मुहं फेरना पडता है..!!! कई बार उपहास का पात्र बनना पडता है तो कई बार शर्मिंदा होना पडता है. अरे आप क्या सोचने लगे !!! हे भगवान !! इसमे कही आप राजनीति तो नही ले आए !! कमाल हैं आप भी !! अरे भई !! वो क्या है ना वजन बढ रहा है उसे धटाने के लिए मेहनत ज्यादा करनी पड रही है तभी तो आएगें अच्छे दिन !!! आलू ,पूरी .टिक्की जैसी मुंह मे पानी लाने वाली चीजे त्यागनी पडती हैं उबला खाना या सब्जी निगलनी या गटकनी पडती है ना चाहते हुए भी खाना पडता है और बहुत चाह्ते हुए भी उस खाने से देखने से इंकार करना पडता है. कई लोग उपहास करते हैं कि वजन कम हो ही नही सकता तो कई बार लोगो के सामने जब वजन टस से मस नही होता तो शर्मिंदा भी होना पडता है!!
यहां हालत खस्ता हो रही है और आप है कि राजनीति ले कर आ रहे हैं अरे भई कम खाएगें … हल्का खाएगे, कसरत करेगें तो आएगें ना जल्दी से अच्छे दिन … बस वो ही तो कह रही हूं !!! अच्छे दिन आने वाले है:)
कितने दूर कितने पास
कितने दूर कितने पास
किससे दूर किसके पास …
मैं नेट पर काम कर रही थी कि अचानक गेट पर धंटी बजी. ओफ !! कौन होगा !! असल में, वो क्या है ना कि कई बार कुछ शरारती बच्चे ऐसे ही घंटी बजा कर भाग जाते हैं तो सोचा शायद वही हों पर एक ही मिनट में दुबारा घंटी बजने पर मैं समझ गई कि बाहर जरुर कोई है.बाहर गई तो एक महिला खडी थी. मेरे पूछ्ने पर उस महिला ने इशारा करके बताया कि वो हमारे घर के पीछे ही रहते हैं उनका नया घर बन रहा है इसलिए वो POP देखने आई है क्योकि आपका घर नया बना है ना … मैने उसे कभी नही देखा था इसलिए मैं उसे भीतर लाने में इच्छुक नही थी इसलिए गेट पर ही खडे खडे बोला कि हमने बिल्कुल साधारण सा पीओपी करवाया है पर जब उसने हमारे अडोस पडोस में रहने वालो के बारे में बताया कि वो उन्हें जानती है तो ना चाह्ते हुए भी मैं एक घर के साथ भीतर ले आई. उसने दो चार मिनट लगाए एक दो कमरे देखे और कुछ ही पल में हम बाहर आ गए.
मुझे महसूस तो हुआ पर मैने उससे चाय पानी का भी नही पूछा. असल में, आज के माहौल को देखते हुए एक डर सा रहता है कि पता नही कौन है कितनी सही है वगैरहा वगैरहा… !! जाते जाते मैनें उसे जता भी दिया कि क्षमा करें मैने आपको पहले कभी देखा भी नही और आज का समय ठीक नही है इसलिए.. इस पर वो बोली कि वो समझती है और थैक्स कह कर चली गई.
कुछ देर नेट पर काम करने का मन ही नही किया. सोच रही थी कि हम कितना बदल गए हैं कभी हम भारतीयों की पहचान यही होती थी कि घर आए मेहमान का स्वागत करते थे बेशक गांव में ये परम्परा आज भी है पर छोटे शहरों में किसी अनजाने भय से गुमनाम सी होती जा रही है और मैंट्रो में तो यह खत्म ही हो गई है. तभी देखा कि फेसबुक पर दो तीन मैसेज आए हुए हैं जिन्हें मैं जानती तक नही. मैं सोच रही थी कि फेसबुक या अन्य सोशल नेट वर्किंग साईटस पर हम कितना जानते हैं लोगो को पर उन अनजाने लोगो को जवाब देने में जरा भी देर नही लगाते … चाहे मित्रता स्वीकार करनी हो या मैसज करना हो पर जो हमारे घर के नजदीक रहते हैं उन्हें हम जानते तक नही….
कितने दूर कितने पास
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