Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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August 25, 2015 By Monica Gupta

Audio–satire-Monica Gupta

Audio–satire-Monica Gupta

http://radioplaybackindia.blogspot.in/2015/08/musibat-mol-li-maine.html

रेडियों रुम में आपका स्वागत है.अभी तक आप मेरी लिखी दो  कहानियां  मेरी ही आवाज में सुन चुके हैं इस बार सुनिए मेरा लिखा व्यंग्य मेरी ही आवाज में …. मुसीबत मोल ली मैनें …

satire by monica gupta

व्यंग्य का शीर्षक है

मुसीबत मोल ली मैनें..

असल में, पिछ्ले महीने जब मैने अपनी एक सहेली को फर्राटे से कार चलाते देखा तो निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो जाए मैं भी ड्राईविंग सीखूंगी. घर पर निर्णय सुनाया तो पहले तो सबने मना किया कि क्या करोगी पर मेरी जिद्द के आगे सभी झुक गए और थम्स अप करके सहमति दे दी. अब सबसे पहले मैंने ब्यूटी पार्लर जाकर स्टाईलिश बाल कटवाए. गोगल्स खरीदे. बस अब ड्राईविंग सीखनी बाकि थी. 15 दिन में मैने इधर उधर कार ठोक ठाक कर कार सीख ही ली. फेसबुक पर जब ये खुश खबरी  दी. तो 100 कमेंटस और 200 लाईक भी आ गए. मैं सांतवे सामान पर थी. पर अब शुरु होती है मेरी दास्ताने मुसीबत.पहले राशन वाला घर पर सामान भिजवा देता था अब कहता है कि छोटू नही है आप खुद ही ले जाओ कार में. बाजार से आधा किलो आलू लाना हो या मोची से चप्पल ही ठुकवानी है तो सब मुझे ही कहते कि कार है ना. ले जाओ. रिश्तेदार जो सालों से घर नही आए थे उन्होने इसलिए आना शुरु कर दिया कि बहू ने कार सीख ली है अब उन्हें स्टेशन से लेकर आना , शापिंग कराना, धुमाना और फिर घर पर लजीज खाना भी बना कर खिलाना. नही तो वो नाराज हो जाएगें कि बहू ने सेवा भी नही की. हाउस वाईफ होने के नाते पहले मेरी भूमिका बस घर सम्भालने तक की थी अब दोहरी तिहरी या चौगुनी हो गई है.घर पर सब खुश है पर मैं सिर पकड कर बैठी हूं .सहमति से किया गया थम्स अप किया था मुझे अब ठेगा लग रहा है मानो चिडा रहा हो कि जाओ और सीखो कार चलाना.. मना किया था ना… हाय राम पर अब क्या करु … मुसीबत मोल ली है मैने अपने पावं पर खुद ही कुल्हाडी मारी है…ओह, आपसे बातों के चककर में तो मैं अलार्म लगाना ही भूल गई सुबह चार बजे की ट्रेन से रिश्तेदारों को लेने जाना है फिर पकवानों की तैयारी करनी है काम वाली बाई भी दो दिन छुट्टी पर है. आज स्कूल बस भी नही आएगी बच्चो को भी ड्राप करना है ….हे भगवान !!

मुसीबत मोल ली मैने Audio–satire-Monica Gupta

कैसा लगा जरुर बताईएगा !!!

August 6, 2015 By Monica Gupta

हमारा पशु प्रेम

 

animals photo

Photo by magnus.johansson10

                                  हमारा पशु प्रेम (व्यंग्य)

तू इस तरह से मेरे जिंदगी मे शामिल है जहां भी जाऊं ये लगता है तेरी महफिल है …. रुकिए रुकिए ज्यादा सोचिए मत!!! असल मे, यह गाना मैं पशुओ के लिए गुनगुना रही हूं जो हमारे चारो तरफ है. जिधर देखू तेरी तस्वीर नजर आती है…क्या???

 आपको विश्वास नही हो रहा चलिए मै बताती हूं. सुबह सुबह घर से आफिस  जाने के लिए  निकलती हूं तो हमारी पडोसन गजगामिनी उर्फ मुन्नी अक्सर हमारे गेट के आगे फल और सब्जियो के छिलके फैकती मिल जाती है. असल मे, वो क्या है ना सडक पर धूमने वाले सांड और बैल भूखे रहे यह उसे सहन नही होता और उसके घर के आगे उनका नाच हो यह भी उसे अच्छा नही लगता इसलिए वो अच्छी पडोसन होने के नाते अपना प्यार दिखाती हुई ,छिलके फेंक कर मीठी मुस्कुराहट लिए भीतर चली जाती है और मै भी जल्दी से कार मे बैठ कर दफ्तर लपकती हूं कि कही लडाई करते सांड और बैल मेरा रास्ता ही ना रोक ले.

अब रास्ते की बात करे तो सडक पर एक मैन होल का ढक्कन किसी ने चुरा लिया तो गऊ माता उसमे गिर गई थी. ना सिर्फ लोग बल्कि चैनल वाले भी लाईव कवरेज के लिए माईक लेकर खडे सनसनी पेश कर रहे थे और यह अब तो हर रोज की ही बात हो गई हैं.

हमेशा की तरह भारी ट्रैफिक से बच बचाकर किसी तरह  दफ्तर पहुची तो  मेरा स्वागत बुलडोजर से  हुआ. क्या !! आप उसे भी  नही जानते !! बुलडोजर हमारे बास के कुत्ते का नाम है पर श्श्श्श्श्श … उसे  कुछ भी कहना …पर…. कुत्ता मत कहना. बास बुरा मान जाएगे.खैर, जैसे ही मै बास के रुम मे पहुंची तभी उनकी श्रीमति जी का फोन आ गया और शेर से वो अचानक भीगी बिल्ली बन कर म्याऊ म्याऊ करके बात करने लगे. उफ ये पशु प्रेम !!

अपनी सीट पर आई तो एक फाईल गायब थी तभी पता चला कि आज बंदरो की टोली आई थी खिडकी के रास्ते. हो सकता है कि कागज,वागज उठा कर ले गए हो. मैने सिर पकड लिया कि अब बलि का बकरा मै ही बनने वाली हूं और हुआ भी यही चाहे आप इसे बंदर धुडकी कहे या गीदद भभकी … मुझे घर भेज दिया गया कि आप जाकर आराम करें. कल बात करेगे.

देखे कल ऊटं किस करवट बैठता है सोचते सोचते  मै घर लौट आई. पर बात अभी भी खत्म नही हुई. घर पर चूहे बिल्ली की कोई कार्टून चल रही थी.सच, उफ!!! जानवरो ने तो मुझे कही का नही छोडा.आज अगर मेरी नौकरी जाएगी भी तो वो भी सिर्फ बंदर की वजह से.सच मे, ये जानवर जिंदगी मे इस कदर हावी हो गए है कि मुझे  काला अक्षर भैंस बराबर लगने लगा है और मैं खडी बास यानि भैस के आगे बीन बजा रही हूं और शायद  मगरमच्छ के आसूं बहा रही हू पर .. पर … पर …!!!

तभी भैंस का  मेरा मतलब  बास का फोन आ गया. उन्हे शाम को अपनी पत्नी के साथ शांपिग जाना था और मेरी डय़ूटी लगा दी कि बुलडोजर को पार्क मे घुमाने ले जाना है क्योकि मैनें उन्हे बताया हुआ था कि मुझे जानवरो से विशेष प्रेम है इसलिए मरती क्या न करती. मुस्कुरा  कर हामी भर् दी.सोचा शेर के मुहं मे हाथ डालने से क्या फायदा.अब तो जल्दी ही बुलडोजर के बहाने गधे को बाप बना कर अपनी प्रोमोशन  का राग जरुर छेड दूगी और मै बछिया का ताऊ बनी जी हजूरी मे जुट गई.

सडक पर बुलडोजर इतरा कर चल रहा था जैसे अपनी गली मे कुत्ता भी शेर हो. सैर सपाटा करवा कर घर पहुची तो पडोसन मुन्नी रात के खाने की तैयारी कर चुकी थी. गेट के आगे  छिलको मे मटर और गाजर भी थी लग रहा था कि शायद मेहमानो को बुलाया है नही तो सुबह शाम मैथी,गोभी और आलू के छिलको से ही दो चार होना पडता है मै खडी खडी सोच ही रही थी तभी  ना जाने कहां से बैलो के जोडे को छिलको की महक आई और वो अचानक  सरपट भागते भागते आए और छिलके खाने मे जुट गए और मै डर के मारे घर के भीतर भागी. तभी फोन की घंटी घनघना उठी बास का फोन था  कि कल सुबह जल्दी आ जाना क्योकि शाम को घर लौटते वक्त कोई बैल अचानक उनकी  गाडी के सामने आ गया टक्कर हो गई और उन्हे  पैर मे फ्रैक्चर हो गया है….

तो  मै सही हू  ना … जानवर हमारी  जिंदगी मे शामिल हुए कि नाहि  …  इसलिए जहां भी जाए ये लगता है …!!!!

जरुर बताईएगा कि आपको हमारा पशु प्रेम कैसा लगा ??

August 3, 2015 By Monica Gupta

जब कार चलाना सीखा

car drive photo

 

जब कार चलाना सीखा

मुसीबत मोल ली मैने ..

जी हां … आजकल समय ही ऐसा चल रहा है.चारो तरफ टेंशन,परेशानी ही दिखाई देती रहती है. आमतौर पर हम इन तनाव या मुसीबत से छुटकारा पाना चाह्ते है पर दूसरी तरफ एक उदाहरण मै हू जोकि मुसीबत को खुद ही न्यौता दे आई और वो भी पूरे जोश के साथ पर अब कहने को कुछ नही बचा. बस चारो तरफ गहन अंधकार ही अंधकार है. खैर, इससे पहले आप माथे पर बल डाल कर ज्यादा सोचने पर मजबूर हो जाए मै आपको दुख भरी दास्तान सुनाती हूं.

बात ज्यादा पुरानी नही है बस पिछ्ले महीने ही ही है.एक दिन बाजार जाते समय मुझे एक सहेली मिली वैसे स्कूल टाईम मे वो नालायक नम्बर वन थी.पर पता नही आजकल उसे क्या हो गया है इतनी स्मार्ट इतनी स्मार्ट हो गई है कि बस पूछो ही मत.बाल कटवा लिए है धूप का चश्मा पहनने लगी है और सबसे बडी बात की कार चलाती है. बस यही मेरी दुखती रग है.

असल मे, मुझे कार चलानी नही आती. आज के समय मे कार ना चलाना आना हैरानी का विषय ना बने इसलिए मैने उसी समय घर आकर घोषणा कर दी कि कल से मै गाडी चलाना सीख रही  हूं. जो चाहे सो हो. छोटे बेटे ने तुरंत अग़ूंठा दिखा कर मेरा समर्थन किया जबकि 90% परिवार जनो की राय थी कि रहने दो क्या फायदा.

पर मै एक बार जिद कर जाती हू तो फिर अपने आप की भी नही सुनती बडे स्टाईल से डायलाग बोल कर इतराने लगी और कहा कि ठान लिया तो बस ठान लिया और अगले ही दिन ब्यूटी पार्लर मे जाकर छोटे छोटे बाल कटवा लिए और गोगल भी खरीद लिए. अब  भई स्टाईल भी तो मारना जरुरी होता है .जल्दी ही खोज शुरु हुई कार सीखाने वाले की और 15 दिन मे मै फराटे से  कार चलाना सीख गई हालाकि दो चार बार बहुत बुरी तरह बची भी हूं.अब सारी बाते क्या बतानी. आप खुद भी समझदार है….  है ना.

अब आप सोच रहे होंगे कि भई इसमे दुख भरी बात कहा है तो वही बताने तो जा रही हू.कि मुसीबत मोल ली मैने. छोटे छोटे कामो के लिए अब सब मेरा ही मुंह देखते है कि ग़ाडी भी है और ड्राईवर भी.चाहे बाजार से आधा  किलो आलू लाने हो कपडे प्रैस करवाने हो या राशन का सामान हो लाना हो .सब मेरे सिर पर ही आ गया कि कार है ना . पहले दुकान वाले  सामान  आदमी के हाथो भिजवा देते थे पर अब उनका एक ही जवाब होता है कि कार है ना आप ही आ जाओ. आदमी नही ना है. दुकान बंद करके आना पडेगा.वगैरहा वगैरहा.

घर पर किसी के जूते मे मोची से जरा सी कील ही ठुकवानी हो तो भी कार है ना. और तो और जो मेहमान सालों से हमारे यहां नही आए थे जबसे उन्हे पता चला कि मैने कार सीख ली है वो आने को तैयार है.हफ्ते दस दिन का कार्यक्रम बना कर आ रहे है. पहले उन्हे रेलवे स्टेशन लेने जाओ फिर आवभगत,जायकेदार व्यंजन बनाओ,सेवा करो और  फिर अलग अलग जगह सुबह से शाम तक  दिल्ली दर्शन  करवाओ शापिंग करवाओ और फिर रात को लजीज व्यंजन से स्वागत करो ताकि वो नाराज ना हो जाए.

पहले तो मात्र घर ही सम्भालती थी पर अब जबसे कार चलाना सीखा है बस मानो मुसीबत ही मोल ले ली है मैने.अब तो दोहरी भूमिका हो गई है.घर पर सब निश्चिंत होकर बैठे है और सभी खुश है कि अब तो दिक्कत की कोई बात ही नही है.पर मै सिर पकड कर बैठी हूं कि क्यो मैने कार चलाना सीखा और अपने पैरो पर खुद कुल्हाडी मार ली.बेटे ने जो उस दिन अगूंठा दिखा कर मेरी बात का समर्थन किया था  मुझे वो थम्स अप की बजाय  ठेंगा लग रहा है. कुछ भी कहो  इसमे अब कोई मेरी मदद नही कर सकता क्योकि यह मुसीबत खुशी खुशी मैने ही मोल ली थी… अब तो इसे भुगतना तो पडेगा ही पडेगा….

कैसा लगा आपको ये व्यंग्य … जरुर बताईएगा 🙂

जब कार चलाना सीखा

August 2, 2015 By Monica Gupta

उफ ये मुस्कुराहट

satire-monicagupta-bhasker

(व्यंग्य)

                                           उफ ये मुस्कुराहट        

इस तनाव भरे माहौल मे अगर कोई कहे कि मुस्कुराओ तो बहुत ही अजीब सा लगता है वैसे ऐसा मेरा मानना है पर पिछ्ले दो चार दिन से कुछ ऐसा हुआ कि मुझे अपने विचार बदलने पडे और मै भी हंसने मुस्कुराने के मैदान मे कूद पडी. वैसे आपको एक सच बात बताऊ कि हँसने खिलखिलाने का शौक तो मुझे बचपन से ही था पर बडे होते होते कुछ ऐसा होता चला गया कि हँसी भी कही दब कर रह गई. दो दिन पहले मेरी सहेली मणि आई उसने बताया कि मुस्कुराहट तो अनमोल गहना है इसे हमेशा धारण करना  चाहिए. वही बाजार मे खरीददारी करते एक अन्य दोस्त ने बताया कि जब 2 सैंकिंड की मुस्कान से फोटो अच्छी आ सकती है तो मुस्कुराने से जिंदगी भी तो अच्छी हो सकती है कि नही. पता नही क्यो पर मुझे बात जम गई. और बस सोच लिया कि अब जो हो सो हो. हमेशा हसंना और मुस्कुराना ही है और अपनी अलग पहचान बनानी है.

अगली सुबह मे बहुत अच्छे मूड मे सो कर उठी और सैर को निकल पडी. एक दम शांत माहौल मे मैने एक पेड चुना और वहाँ हाथ ऊपर करके ठहाका लगा कर जोर जोर से हंसने लगी. इतना ही नही बीच बीच मे ताली भी बजा रही थी इस बात से बिलकुल बेखबर कि सामने ही एक मोटी लडकी व्यायाम करने के लिए रस्सी कूद रही थी और वो गिर गई थी. पता तब चला जब शायद उसकी मम्मी आग्नेय नेत्रो से मुझे धूरने लगी और उसके पास खडा आज्ञाकारी कुत्ता भी मुझ पर बेहिसाब भौकने लगा. इससे पहले मै अपनी सफाई मे कुछ कहती उनकी लडकी और जोर जोर से रोने लगी और मैने चुपचाप खिसकने मे ही भलाई समझी. उफ!! मैने ठंडी सासं ली और धडकते दिल के साथ  घर लौट आई.

घ्रर लौटी तो हमारी पडोसन मिक्सी मांगने आई हुई थी. पर पता नही क्यो आज उसे देखकर मुझे हसीं आ गई. असल मे, वो क्या है ना कि वो डकारे बहुत लेती है. पहले तो मै कुछ नही कहती थी पर जब से हंसना अनमोल गहना है और जिंदगी हंसने से बेहतर बनती है तो सोचा कि आज हंस ही लूं इतने  दिनो बाद खिलखिलाकर हँसी तो शायद उसे बुरा लगा. उसने हसंने का कारण पूछा  तो मैने भी हंसते हुए बता दिया कि उसकी डकार सुनकर मुझे बहुत हंसी आती है. इस पर वो बहुत नाराज हुई और बाहर चली गई. मै एकदम चुप हो गई. इतने मे वो फिर आई और गुस्से मे वहाँ रखी मिक्सी ले गई.मै चुपचाप उसे देखती रह गई.उफ ये मुस्कुराहट!!!

अगले दिन किसी कवि सम्मेलन मे जाना था. वहां एक महोदय बहुत देर से कविता पे कविता सुनाए चले जा रहे थे. मेरे साथ बैठी महिला मुहं पर रुमाल रख कर धीरे धीरे  हसें जा रही थी. मैनें इधर उधर नजरे घुमा कर देखा तो कोई उबासी ले रहा था तो कोई सिर खुजला रहा था तो कोई मोबाईल पर मैसेज भेजने मे जुटा था यानि कुल मिलाकर माहौल मे सन्नाटा था. मैने कनखियो से एक दो बार उस महिला को  देखा तो  भीतर ही भीतर वो इतनी हंस रही थी इतनी हंस रही थी कि उसके आंसू निकल रहे थे.बस फिर क्या था. बोर तो मै भी हो रही थी पर उसे देख कर हंसने वाली बात याद आ गई और उसे देख कर मै जोर से खिलखिला कर हंस पडी. उसके बाद आपको ज्यादा बताने की जरुरत नही क्योकि आप सभी बहुत समझदार है. मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और मै चुपचाप बाहर आ गई.उफ!! बहुत महंगी पडी ये मुस्कुराहट.

समझ नही आ रहा था कि आखिर गलती हो कहाँ रही है.खैर रुआसी होकर घर लौट आई. शाम को बेटा हंसता मुस्कुराता घर आया और उसने मुझे उसका नया पासपोर्ट दिखाया. मै खुशी खुशी देखने लगी पर पासपोर्ट की फोटू मे उसकी मुस्कान ही गायब थी. मेरे पूछ्ने पर उसने बताया कि आजकल पासपोर्ट पर फोटो खिचवाते समय  चेहरे पर कोई भाव नही आना चाहिए…!! यही नियम है.

मुझे लगा कि मेरे लिए भी यही ठीक होगा और फिर मैनें अपने को पहले की तरह बनाने मे ही भलाई समझी और चुपचाप बिना मुस्कुराए काम मे जुट गई….

कैसा लगा ??? जरुर बताईगा??

ये व्यंग्य दैनिक भास्कर की मधुरिमा पत्रिका में प्रकाशित हुआ था.

 

August 1, 2015 By Monica Gupta

दौरा बनाम दौरा

दौरा बनाम दौरा  ….

cartoon- result monica gupta

 

दौरा बनाम दौरा

आज अचानक सुबह सुबह  नेता जी ने घोषणा कर दी कि अभी विदेश दौरे पर जाने की बजाय वो सीधा  तिहाड के दौरे पर जाएगे क्योकि भारी अव्यवस्थाओ के चलते वहां देखना भी बहुत जरुरी है. आनन फानन में सायरन बजाती हुई गाडियो का काफिला अगले ही पल तिहाड के भीतर था.

काजू और बादाम खाते हुए नेता जी ने बहुत ध्यान से सभी बातो का मुआयना करना शुरु किया.सबसे पहले गेट पर खडे  संतरी को बहुत प्यार से देखा और उसकी पीठ पर थपकी दी. फिर पूरा  मुआयना किया कि कैसे कैदी सुबह उठ कर दिनचर्या अपनाते है और उन्हे किन किन बातो की कमी लगती होगी. सबसे पहले तो सैर करने के लिए जगह तैयार करवाने के आदेश दिए.ताकि ताजी  हवा का आनंद ले सकें. कुछ कमरो को वीआईपी सैल बनाने की धोषणा की कि जब कोई बडा नामी गिरामी बीमार नेता आए तो उसे किसी प्रकार की दिक्कत का सामना ना करना पडे.

खाने मे भी अच्छे कुक रखने के आदेश दिए ताकि कोई कैदी खाकर बीमार ना पडे क्योकि मीडिया मे एक बार खबर आ जाए तो बहुत किरकिरी हो जाती है. फिर बात आई शौचालयो की. अच्छे स्वास्थ्य के लिए साफ सुथरे बाथरुम निंतांत आवश्यक हैं इसलिए ज्यादा शौचालय बनाने के भी आदेश दे दिए गए औरयह हिदायत भी दी गई कि सभी सफाई  कर्मचारी  24 घंटे डयूटी पर ही तैनात रहें.

हर रोज कुछ ना कुछ क्रियात्मक होता रहे इसलिए मनोरंजन के लिए भी आदेश दिए गए ताकि दुखी कैदियो  का ध्यान सुसाईड करने पर ना जाए और उसमे जीने की नई आशा का संचार होता रहे.छोटा फ्रिज,गद्दा और छोटा रेडियो या छोटा टीवी भी सभी कमरो मे लगे इसका भी ध्यान रखना बहुत जरुरी है और और नेता जी बोलते जा रहे थे और उनका सैक्रेटरी लिखे जा रहा था. तभी किसी ने पीछे आकर कहां कि आपके जाने का समय हो गया है. उन्होने तुरंत गाडी निकालने के आदेश दिए ताकि कही विदेश जाने वाली  फ्लाईट मिस ना हो जाए. और अगले दौरे का भी दिन तथा समय  निश्चित कर लिया ताकि जिन कामो के आदेश दे दिए है वो लागू हुए है या नही.

तभी उन्हे ऐसा लगा कि कोई उन्हे झंकोर रहा है. अचानक वो उचक कर उठ बैठे. हवलदार उन्हे उठा रहा था कि इतनी देर से  क्या बडबडाए जा रहे हो… वो नींद से जागे… अरे!!! वो तो खुद कैदी हैं.छोटा सा कोठरीनुमा कमरा, पुराना सा मटका,थाली कटोरी,चम्मच, और मटमैली सी चादर मानो उन्हे चिढाती हुई हंस  रही थी.उफ!!! कहां तो  नेता जी दौरा करने आए थे और ये क्या …!!!  अचानक नेता जी को एक बार फिर  दौरा पडा और एक लंबी सांस लेते हुए वो एक तरफ लुढक गए…..पीछे संगीत चल रहा था …ए मालिक तेरे बंदे हम …ऐसे हैं हमारे कर्म …!!!!!

कैसा लगा आपको ये व्यंग्य… जरुर बताईएगा 🙂

 

 

July 15, 2015 By Monica Gupta

स्पीकर

लघु कथा – स्पीकर

land line phone  photo

Photo by Infrogmation

अचानक फोन की घंटी बजी और हमेशा की तरह फोन मम्मी ने उठाया. उनकी बातों से झलक गया था कि फोन मुम्बई से  बडे भैया का है. चलिए  पहले मैं आपको अपना परिचय करवा दू. मै मोना हू. घर की सबसे छोटी बेटी. मेरे दो  भाई है बडे भईया पापा से झगड कर मुम्बई शिफ्ट हो गए और हम दोनो अभी पढाई कर रहे है. पापा का बहुत बडा शोरुम है और पापा चाह्ते थे कि भईया उसे ही सम्भाले पर भईया को नौकरी ही करनी थी और वो सभी से झगड कर पिछ्ले साल वही बस गए 2-3 महीने मे एक आधी बार फोन आ जाता है .मम्मी से तो सारी बात होती है पर हमसे या पापा से नही हो पाती.

आज फिर फोन आया और मम्मी बातो मे जुट गई. पापा का काम , हमारी पढाई और भी बहुत बाते खुशी खुशी बताने लगी तभी आवाज शायद कम आने लगी और फोन कट गया.वैसे अक्सर ऐसा ही होता था.ज्यादातर मम्मी हैलो ही करती रह जाती थी. या नेट वर्क की दिक्कत या फिर उम्र के चलते मम्मी के कानो मे कोई परेशानी.

खैर, अगली बार जब भईया का फोन आया तो मैने मम्मी को मोबाईल पकडाते  समय  उसका स्पीकर ओन करके दे दिया ताकि उन्हे सुनने मे दिक्कत ना हो और  वो इस बात से बेखबर थी. मम्मी के हैलो करते ही वहां से बडी रुखी सी आवाज उभरी.. हां … क्या है बोलो ?? … और मम्मी हमेशा की तरह फोन कान पर लगाए मुस्कुराती हुई  बातो मे जुटी रही.हां, हां, मोना भी ठीक है और तेरे पापा .. अरे वो भी तुझे दिन रात याद करते हैं क्या मै .. अरे मुझे क्या होना है एक दम भली चंगी हू. ह हा .. क्या शायद तेरा अगले महीने आने का बन जाए अरे वाह मजा आ जाएगा … मोना से .. हाँ हाँ .. अभी बात करवाती हूं अपना  नया नम्बर भी जल्दी ले कर हमे बता देना बेटा.हैलो .. हैलो .. अरे .. नेटवर्क फिर कट गया लगता है … मां मुस्कुराती हुई बोली कि मोना से बात करने की जिद कर रहा था और बाते करती करती रसोई मे चली गई.

मै,पापा और छोटा भाई सन्न थे क्योकि भईया का स्वर एकदम रुखा था और उन्होने कोई बात ही नही की और उन्होने  बहुत ही जल्दी फोन काट दिया था… शायद हमेशा  ही वो ऐसे …. और वही दूसरी ओर मम्मी इस बात से बेखबर की हमे सब पता चल गया है वो  प्रसन्न थी कि बेटे ने आज फिर  बहुत बाते की…. पता नही क्यो पर हम मम्मी की आखों की नमी को दिल की गहराईयो से महसूस कर पा रहे थे ….

कैसी लगी आपको ये कहानी … जरुर बताईएगा 🙂

 

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