Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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May 14, 2017 By Monica Gupta Leave a Comment

छोटी बाल कहानी – मुझे नहीं बनना मम्मी वम्मी

छोटी बाल कहानी – मुझे नहीं बनना मम्मी वम्मी – बच्चों की सोच होती है मम्मी बनना बहुत आसान है … मम्मी को काम ही क्या होता है सारा दिन टीवी देखना, तैयार होना और  बच्चों को डांटना … बस … मम्मी बनना बहुत आसान है … पर क्या वाकई … !! बहुत समय पहले मैने एक कहानी लिखी थी एक लडकी की सोच होती है कि मम्मी बनना बहुत आसान है पर कहानी के अंत में कह उठती है कि मुझे नही बनना मम्मी वम्मी…

छोटी बाल कहानी – मुझे नहीं बनना मम्मी वम्मी

मैं हूं मणि। मैं अभी-अभी रूपा और कुणाल के घर से अपने भाई के साथ लौटी हूं। वहां हम खूब खेले। इतना खेले कि समय का पता ही नहीं चला और जब समय देखा तो सिट्टी पिट्टी गुम… मम्मी तो डाटेंगी ही और पापा भी दफ्तर से घर लौट आए होंगे। घर का गेट खोलते ही शुक्र मनाया कि पापा अभी नहीं लौटे। मम्मी टेलीविजन देख रही थी। सच, कितने मजे है ना मम्मी के। सुबह से रात तक ना कोई पढ़ाई ना कोई स्कूल की टेंशन। मेरा तो दिमाग ही घूम जाता है पढ़ाई से।

ऊपर से जबसे गणित की नई अध्यापिका आई हैं रोज पहाड़े सुनाती है वो भी बीस तक। लिखने में तो मैंने रट्टा लगा रखा है पर सुनाने में…मेरी जान निकलती है। पापा को भी अपने पांव दबवाने का अच्छा बहाना मिल गया है।

मुझे पांव पर खड़ा कर लेते हैं और बोलते हैं कि पांव पर चलते भी रहो और पहाड़े भी याद करते रहो। सच, पढ़ाई ऐसी मुसीबत लगती है कि मेरा मन करता है कि मैं भी मम्मी बन जाऊं और सारा दिन शीशे के सामने बैठी बिंदी, लिपस्टिक लगाती रहा करूं। लेकिन ऐसा अभी होने से तो रहा क्योंकि मैं अभी पांचवी कक्षा में हूं।

हे भगवान…मैं कब बड़ी होऊंगी। सोचते-सोचते मैंने गणित की पुस्तक निकाली और तीन तीया नौ याद करने लगी। पर फिर मैं ख्यालों में खो गई। सच, मम्मी बनने पर मैं आराम से आठ बजे उठूंगी। उठते ही अखबार और चाय का गिलास लेकर बैठूंगी। अखबार पढ़कर नहाने जाऊंगी और फिर टीवी के आगे बैठ जाऊंगी। जब बच्चों के आने का समय होगा…

बच्चों का, मैंने सोचा बच्चे स्कूल से तब आएंगे ना जब मैं उन्हें सोते हुए उठाऊंगी-उसके लिए तो मुझे पांच बजे उठना पड़ेगा। क्योंकि पहले मम्मी मेरे छोटे भाई के लिए दूध की बोतल उबालकर, दूध गर्म करके उसे ठण्डा करती है फिर उसमें हल्की सी चीनी डाल कर छान कर उसे अपने हाथ से पिलाती है जिसमें लगभग बीस मिनट लगते हैं।

फिर बारी आती है मुझे उठाने की। भई, इसमें शर्म की कोई बात नहीं है कि मुझे उठाने में मम्मी को पूरे दस पंद्रह मिनट तो लग ही जाते हैं। मुझे पता है कि पहले पहल तो मम्मी कितना दुलार दिखाती है उठाने में लेकिन हद होती है ना जब मैं उठूं ही नहीं तो…और उठने के बाद तो जो अशांति होती है उसका तो क्या कहना।

पहले तो उठने के साथ चप्पलें नहीं मिलती फिर घमासान युद्ध होता है कि पहले बाथरूम कौन जाएगा या फिर बाशबेसिन के आगे खड़ा होकर पहले ब्रश कौन करेगा क्योंकि पापा को भी समय से आफिस पहुंचना होता है। खैर, हमारे तैयार होने केे बाद मेरे कमरे की तुलना किसी भूकंप ग्रस्त क्षेत्र के घर से की जा सकती है। अब वो काम मम्मी का होता है। मनु भईया को गोद में लिए वो सारा काम निपटाती है। मेरे वापिस आने पर वो कमरा जो दमक रहा होता है उसमें फिर से भूूकंप के झटके लगने शुरू हो जाते हैं।

स्कूल की दिनचर्या व स्कूल बस में दिप्पी के साथ हुई सारी बातें ए टू जेड मम्मी को बतानी होती है जिन्हें वे बहुत ध्यान और धैर्य से सुनती हैं और खाना लगाते-लगाते उस सुंदर से कमरे को बिखरता देखती हैं। मम्मी को पता है कि बच्चों से बार-बार-बार  करने का कि कमरा साफ रखो या चीजों को ठीक से रखो…कोई फायदा नहीं है।

करीब आधे घंटे में वो कमरा फिर से हमें साफ मिलता है। फिर स्कूल का होमवर्क, फिर मनु का किसी भी समय रोना या कुछ तोड़-फोड़ करना जारी रहता है। शाम होते ही मम्मी फिर से दूध लेकर मेरे पीछे पड़ जाती है। पिछले महीने तक तो मैं मम्मी की निगाहों से बचकर दूध बाशबेसिन में गिरा रही थी किंतु एक दिन मेरी चोरी पकड़ी गई।

अब तो मम्मी दूध खत्म होने तक मुझ पर नजरें गड़ाए रहती है। दूध पीते समय बस एक श्रृंगार रस को छोड़ कर मेरे चेहरे से सभी रस टपकते रहते हैं। खैर हर रोज मेरी पसंद और पापा की पसंद का खाना बनाया जाता है। सभी की पसंद अलग होने के बावजूद भी मम्मी सभी का ख्याल रखती है। किसी को निराश नहीं होने देती।

मनु को गोद में लिए-लिए अपने बालों का जूड़ा बनाकर सारा दिन काम में जुटी रहती है। जिस दिन काम वाली बाई नहीं आती उस दिन भी मम्मी किसी से कुछ नहीं कहती। पर फिर भी अपने लिए श्रृंगार और टीवी देखने का समय पता नहीं कैसे निकाल लेती हैं।

मुझे याद है एक दिन मम्मी को मनु को लेकर डाक्टर के पास जाना पड़ा था। मैंने घर साफ करने की कोशिश भी की थी लेकिन वो कहते है ना…जिसका काम उसी को साजे…बस, मैं कुछ नहीं कर पाई थी, हां, उस समय मैं पहाड़े लेकर जरूर बैठ गई थी याद करने और मुझे चार का पहाड़ा याद भी हो गया था।…बड़ी भूल कर रही हूं, मैं तो बच्ची ही ठीक हूं।

इतना पहाड़ जैसा काम करने से बेहतर तो यही है कि मैं पहाड़े ही याद कर लूं। सच में…मुझे नहीं बनना मम्मी वम्मी। पापा शायद मुझे आवाज लगा रहे हैं। मणि जल्दी आओ, जरा मेरे पांव पर खड़ी होकर मुझे जोर से पहाड़े तो सुनाओ कि कितने याद हुए। मैं किताब लेकर खुशी से पापा के पास भागी कि चलो मैं अभी मणि ही हूं…मम्मी नहीं।

 

एक कहानी सुनो ,  बच्चों की मनोरंजक कहानियाँ ,  छोटी बाल कहानी , रोचक बाल कहानी , हिन्दी बाल कहानियाँ , बाल कथाएँ , बाल कथा ,

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‘‘मुझे नहीं बनना मम्मी वम्मी’’

May 13, 2017 By Monica Gupta Leave a Comment

अनूप उपाध्याय – कॉमेडी की दुनिया का अनूठा अध्याय

अनूप उपाध्याय - कॉमेडी की दुनिया का अनूठा अध्याय

अनूप उपाध्याय – कॉमेडी की दुनिया का अनूठा अध्याय. आज अनूप उपाध्याय किसी परिचय के मोहताज नही …  एक ऐसी शख्सियत जिसे देखते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और जब अलग अलग किरदार में देखते हैं तो हंसी के मारे लोटपोट हो जाने को मन करता है … अपनी गम्भीर मुद्रा बना कर भी दर्शकों को गुदगुदाने में शत प्रतिशत सफल कलाकार हैं अनूप उपाध्याय. चाहे FIR हो, लापता गंज हो, भाभी जी घर पर हैं हो , May I Come In Madam  हो कोई भी किरदार हो  ऐसा लगता ही नही कि अनूप जी अभिनय कर रहे हैं ऐसा लगता है मानो वो हमेशा से ही इसी किरदार में हैं … और यकीनन  यही एक अच्छे कलाकार की पहचान है.

अनूप उपाध्याय – कॉमेडी की दुनिया का अनूठा अध्याय

टीवी इंडस्ट्री में अपने सीरियस और कॉमेडी किरदार से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाने वाले अभिनेता अनूप उपाध्याय हैं 

 

अनूप उपाध्याय – कॉमेडी की दुनिया का अनूठा अध्याय-

इन्हीं बातो से प्रभावित होकर मन किया कि कैसे भी करके इस कलाकार से बात की जाए और जाना जाए उनके इस सफर के बारें में  और आखिरकार टीवी की दुनिया से जुडे कुछ जाने माने कलाकारों की मदद से कुछ ऐसा मौका मिला कि अनूप जी से बात हो ही गई हुई …

तो आईए आज जानते हैं ऐसे ही एक बेहद शालीन, सुलझे हुए, और अपने काम में तल्लीनता से जुटे समर्पित अनूप उपाध्याय जी के बारे में …

अनूप जी से जब बात करने का समय लिया तो उन्होनें अपनी व्यस्त शूटिंग से कुछ पल निकाले और शुरु हुआ बातों का सिलसिला…

आजकल  May I Come In Madam सीरियल अपने चरम पर है तो मैने सबसे पहले यही पूछा कि क्या मैं छेदी जी से बात कर रही हूं या फिर चश्मा पहने हुए कम्पनी के बॉस से … इस पर वो हंसते हुए कहने लगे कि फिलहाल आप बात कर रहीं है अनूप उपाध्याय से …

हंसी मजाक के साथ शुरु हुआ हमारी बातों का सिलसिला …  21 मई को यूपी के जिला एटा के गांव गंजडुण्वारा में अनूप जी का जन्म हुआ. गंजडुण्वारा  नाम सुनकर यकीन आपको भी कुछ याद आया होगा … ये नाम रेडियो पर गीत माला में फरमाईशी प्रोग्राम में बहुत सुनने में आया करता था …

अनूप जी ने भी हामी भरी कि हमारा गांव गंजडुण्वारा इस मामले में बहुत अव्वल रहा … आमतौर पर बहुत गांव ऐसे होते हैं जिनके नाम ही नही सुने होते … पर गंजडुण्वारा  अपवाद है.

बात आगे बढाते हुए अनूप जी ने बताया कि उनके पिता रेलवे में गार्ड थे. मां गृहणी थी.  वो अपने 3 भाई और 2 बहनों  में  सबसे छोटे और लाडले रहे. बचपन में ज्यादा शरारती नही थे पर सोचते बहुत थे और जब फिल्में देखी तो एक्टिंग अपनी ओर आकर्षित करती चली गई और अपना शौक पूरा किया स्कूल में छोटे मोटे नाटकों में हिस्सा लेकर…

बचपन की यादें

बचपन की याद में झांकते हुए अनूप जी ने बताया कि बचपन में एक बार और शायद आखिरी बार घर के मंदिर से एक रुपये का सिक्का चुराया .. उसकी खूब सारी टॉफी भी खरीदी और सोच इस बात की थी कि इतना सामान खरीदा है इसे रखूं कहां ..और घर आकर इस समस्या का समाधान भी मिल गया …

असल में, चोरी करते हुए भाई ने देख लिया था और घर आकर जो मम्मी ने पिटाई की,  जो मम्मी ने पिटाई की … वो एक ऐसा सबक मिला जो जिंदगी भर नही भूलेगा … उनका कहना है कि मां जितना प्यार करती हैं उतनी सख्ती भी जरुरी होती है क्योकि अगर उस दिन पिटाई नही हुई होती तो शायद वो उस दिन के बाद भी पैसे चुराते रहते …फिर कुछ पल वो चुप हो गए..

कैसे शुरु हुआ सफर एक्टिंग का

फिर बात चली एक्टिंग की.. उन्होनें बताया कि  क्लास 5 से एक्टिंग करनी शुरु कर दी थी.. घर पर छोटा होने का ये फायदा मिला कि कोई रोक टोक नही थी सब कहते कर लो जो करना चाह्ते हो … पर एक ही शर्त थी कि पढाई पूरी करनी है … पढाई बीच में नही छोडनी और उन्होनें भी बहुत अदब से उनकी बात मानी और  B.Sc. पूरी की …

 

घर पर सब सोचते कि डाक्टर  बन जाएगा पर जिस दिन आखिरी पेपर था उसी दिन पेपर देकर घर वालो को टाटा बाय बाय बोला और एक्टिंग के लिए दिल्ली रवाना हो गए …

बेशक,  दिल्ली से पहले लखनऊ का नाम सुझाया पर वहां जाकर दिल्ली श्री राम सैंटर का पता चला … फिर सफर शुरु हुआ दिल्ली का…  सफर,  वाकई आसान नही था … पर खुद पर पूरा विश्वास था कि कुछ बनने आया हूं और बनना ही है …

मंडी  हाउस में हबीब तनवीर साहब से मुलाकात हुई.   हबीब साहब लोकप्रिय हिन्दी नाटककार, एक थिएटर निर्देशक, कवि थे और उन दिनों “ देख रहें हैं नैन “ नाटक की तैयारी चल रही थी और यही से हुई सफर की शुरुआत … उन्हें राजा के बेटे का रोल मिला.

उस नाटक में नंदिता ठाकुर, आशीष विद्यार्थी भी थे और इस नाटक का मंचन  लंदन, इंगलैंड , स्काटलैंड,  में भी हुआ..

उसके बाद “आगरा बाजार” में भी उन्होनें काम किया जिसमें अय्याश लडका बनें जो कोठे पर जाता है और पुलिस उसके पीछे लगी है …

अनूप जी अपनी सारी बातें कुछ इस तरह से बता रहे थे मानों ये सब मेरे सामने ही चलचित्र के समान हो रहीं  हो … शायद एक कलाकार की ये खासयित या विशेषता भी होती है …

दिल्ली टू मुम्बई का सफर

समय बीता और फिर शुरु हुआ दिल्ली टू मुम्बई का सफर. बात सन 1997 की है उन दिनों “शांति” सीरियल आया करता था मंदिरा बेदी का.  उसमें उन्हें उनके पिता कामेश महादेवन ( जब वो जवान थे ) का रोल मिला था  बेशक, शुरु में थियेटर से धारावाहिक  में आना अलग ही अनुभव था पर धीरे धीरे वो इसमें भी रमते गए पर थियेटर नही छोडा … जब भी मौका मिला थियेटर किया.

जहां तक शूटिंग की बात है हर दिन, हर शूटिंग अपने में एक नया अनुभव है… सभी कलाकार मिलकर खूब मौज मस्ती करते हैं या ये कहिए कि हमारी पिकनिक हो जाती है. कहते हुए उन्होनें अपनी चिर परिचित हंसी बिखेर दी.

मेरा एक प्रश्न ये भी था कि कई बार हम मेहनत तो करते हैं पर उतनी पहचान नही मिल पाती ऐसे में क्या करना चाहिए ..

उन्होनें अपनी गम्भीर मुद्रा में बताया कि बस अपना काम करते रहिए … उम्मीद नही रखिए … जो भी करना है दिल से करिए बस … उन्होनें बताया कि मजाक उनका भी बनता था जब वो छोटे शहर में थे और कहते थे कि मुम्बई जाऊंगा… पर उन्होनें सभी बातों को अनसुना कर दिया और आज एक मुकाम पर हैं … !!

संदेश 

बात करते करते समय बहुत हो गया था … इसलिए बस आखिरी बात पूछी कि जो युवा इस क्षेत्र में आना चाहते हैं उन्हें का मैसेज देना चाहते हैं. उन्होनें बताया कि अगर अपने पर, अपनी कला पर, योग्यता पर पूरा विश्वास है तो जरुर आईए.  ये एक रण भूमि है और इसमें अस्त्र शस्त्र से लेस होकर ही आना जरुरी है और धैर्य भी बहुत जरुरी है क्योंकि परिश्रम भी बहुत है और  संघर्ष भी .  इसे भी एक तरह का व्यवसाय ही समझना चाहिए  इसलिए इसे गम्भीरता से लेना चाहिए …

अपने Fans के लिए 

अपने प्रशंसकों  के लिए उन्होनें कहा कि “अपने फैंस से हाथ जोडकर कहना चाहता हूं कि बहुत शुक्रगुजार हूं कि आप इतना प्यार देते आएं हैं आगे भी ऐसे ही प्यार करते रहिए, सराहते रहिए और कोशिश रहेगी कि आप की उम्मीदों पर खरा उतरता रहूं…  और भरपूर मंनोरंजन करता रहूं”   … इस बीच उनका शूटिंग से बुलावा  भी आ गया …

और हमें हंसानें, गुदगुदाने के लिए वो एक बार फिर अपने रण क्षेत्र में अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित हो गए… और तमाम दर्शकों की तरफ से शुभकामनाएं देते हुए मैंने उनसे विदा ली और मन में एक ही बात आ रही थी

देखो तो ख्वाब है जिंदगी

पढो तो किताब है जिंदगी

सुनो तो ज्ञान  है जिंदगी

पर हंसते रहो तो आसान है जिंदगी …

May I Come In Madam? – Monica Gupta

May I Come In Madam?  आज मिर्चा सोमा राठौड   हास्य धारावाहिकों की दुनिया में अपने  अलग अंदाज और वजनदार भूमिका लिए  अपनी  अलग पहचान बना चुकी है . लापता गंज, भाभी घर पर है या May I Come In Madam ? मे अपने अभिनय से सभी को गुदगुदा रही है. आमतौर पर महिलाएं अपना … Read more…

(तस्वीर गूगल से साभार)

May 13, 2017 By Monica Gupta 1 Comment

यम से बचना है तो नियम अपनाए – सड़क सुरक्षा नियम

यम से बचना है तो नियम अपनाए

यम से बचना है तो नियम अपनाए –  सड़क सुरक्षा नियम – traffic rules यातायात के नियमों का पालन कितना जरुरी –  सेवलाइफ फाउंडेशन और वोडाफोन इंडिया लिमिटेड ने नई दिल्ली में थीम ‘सेफ्टी इन मोबिलिटी’ के तहत भारत की पहली रिपोर्ट जारी की. स्टडी के अनुसार 94 फीसदी लोग मानते हैं कि गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल खतरनाक है, किंतु हैरतअंगज 47 फीसदी लोग गाड़ी चलाते समय फोन पर करते हैं बात

 

भारत में यातायात के नियम, सड़क सुरक्षा नियम .

यम से बचना है तो नियम अपनाए

कल मैं किसी काम से मार्किट जा रही थी मेरे पास से एक साईकिल वाला निकला उसका मोबाईल बज रहा था उसने साईकिल रोकी और बोला जरा में ड्राईव कर रहा हूं बाद में बात करना फोन काटा उसे जेब में रखा और चला गया …

अब बताईए कितनी अच्छी बात है पर क्या वाकई में ऐसे हैं ??? एक बहुत बडा प्रश्नवाचक चिन्ह…

आप चाहे घर से बाहर मार्किट तक जाईए या हाई वे पर … 90 % लोग नियमों का उल्लंधन करते मिल जाएगें.. कितने बोर्ड लगे होते है कि कार चलाते समय मोबाईल का इस्तेमाल नही कीजिए … हर रोज कितने
एक्सीडेंट देखने पढने को मिलते हैं पर हम … हम सुधरते क्यू नही है …

ऐसा क्या होता है कॉल में ऐसी कैसी जरुरी  कॉल होती हैं जो हम लोग जान पर भी खेल जाते हैं … और नियमों को ताक पर रख देते हैं …
यातायात के नियमों का पालन कितना जरुरी – यम से बचना है तो नियम अपनाए

कल एक नेट पर खबर पढी पुणे की थी कि एक व्यक्ति ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री को सड़क नियमों के पालन में कमियों को दूर करने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं जानबूझ कर सीसीटीवी कैमरों के दायरे में आने वाले एक ट्रैफिक सिग्‍नल को तोड़ अपनी गाडी आगे बढ़ा ली थी। चिन्‍मय कवि ऐसा करके देखना चाहता था कि ये कैमरे ठीक से काम रहे हैं या नहीं।

ट्रैफिक रूल तोड़ने के बाद चिन्‍यम को क्षेत्रीय ट्रांसपोर्ट कार्यालय से एक पत्र आया, जिसमें ट्रैफिक नियम के उल्लंघन की तस्वीर के साथ जुर्माने की रकम लिखी हुई थी

पर चिन्मय ने जुर्माने की रकम का भुगतान नहीं किया और काफी समय गुजर जाने के बाद भी किसी ने उससे जुर्माने के भुगतान के लिए संपर्क नहीं किया

इस तरह उसे इस व्यवस्था में कमी का पता चला गया इस व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठेका देकर सीसीटीवी मॉनिटरिंग कराई जाए और जुर्माने की रकम का कुछ हिस्सा ठेकेदारों को दिया जाए। इससे नियमों में कमियों की समस्या दूर होने के साथ-साथ रोजगार भी बढ़ेगा

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May 12, 2017 By Monica Gupta Leave a Comment

क्या खबर का असर होता है – नेता की सेल्फी

क्या खबर का असर होता है

क्या खबर का असर होता है – नेता की सेल्फी – kya khabar ka asar hota hai  क्या वाकई खबर असर डालती हैं बेशक खबरों का विशाल संसार हैं पर कुछ खबरें खबरदार भी कर जाती हैं खबर असर डालती है…

क्या खबर का असर होता है – नेता की सेल्फी

कल राजस्थान की एक न्यूज देखी कुछ कच्चे घरों में आग लग गई। आग में सभी घर पूरी तरह जल गए और सामान भी खाक हो गया।

इस बीच एक नेता ने धधकते घरों के सामने खड़े हुए और सेल्फी ली। और उन्होने फोटो को फेसबुक पर पोस्ट कर अपनी संवेदनशीलता जताने की कोशिश की, लोगों को बुरा लगा कि ये समय सेल्फी का नही मदद करने का है … एक ने लिखा कि “सेल्फी के साथ एक-दो बाल्टी पानी डाल देते तो आग जल्दी बुझ जाती।”

बेशक बाद में वो सोशल मीडिया पर सफाई देते रहे कि

“सेल्फी नहीं है, मौके पर पहुंचकर अधिकारियों को जल्द से जल्द आने के लिए फोटो खींचकर भेजा था। फोटो में मेरा होना इसीलिए जरूरी था, जिससे उनको लगे कि मैं मौके पर मौजूद हूं।”

– “अगर मैं अधिकारियो को फोन करके बोलता कि आग लग गई है तो शायद वे कोताही भी बरत सकते थे। मैंने तुरंत एक्शन लेने के लिए ये फोटो भेजा। मैं मौके पर हूं, आप भी तुरंत मौके पर पहुंचें।”

एक कहानी –

मैने खबर पढी और चिडिया की कहानी याद आ गई इसी बारे में एक कहानी याद आई … एक चिडिया की मुझे याद आई चिड़िया से जंगल की आग देखी न गई। उसका घौंसला भी था … अचानक वो घोंसले से बाहर आई और कुछ दूर एक छोटे से तालाब पर पहुंची, वहां से उसने अपनी चोंच में दो बूंद पानी लिया, और लाकर उसे जंगल के ऊपर छिड़क दिया। इसके बाद वो फिर तालाब पर गई, दो बूंद पानी लाई और उसे जंगल पर छिड़क दिया ।

तभी सामने वाले पेड़ पर कौए  ने उसकी तरफ देखा और बोला तुझे क्या लगता था, कि तेरी चोंच में पानी लाने से जंगल की आग बुझ जाएगी। तू क्यूं इतनी मेहनत कर रही थी। चिड़िया ने जवाब दिया। मैं भी जानती हूं कि मेरे चोंच में पानी लाने से जंगल की आग नहीं बुझने वाली। लेकिन कल जब इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा, तो मेरा नाम आग बुझाने वाले में लिखा जाएगा

अब जैसे इस आग की खबर लिखी गई तो नेता का नाम आ गया ना कि इन्होनें कुछ नही किया … कितना अच्छा होता कि  लोग सेल्फी लेते कि ये हैं हमारे नेता और लोगो की मदद खुद करने आगे आएं हैं..सीख चिडिया से लेनी चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए …

आदमी की असली पहचान तभी होती है जब वो मुसीबत में मदद करे…

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क्या खबर का असर होता है – नेता की सेल्फी

 

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May 11, 2017 By Monica Gupta Leave a Comment

Importance of Mothers in Life – जीवन में माँ का महत्व

Importance of Mothers in Life

Importance of Mothers in Life – उसको नही देखा हमने मगर .. पर उसकी जरुरत क्या होगी … ए मां तेरी सूरत से अलग … कल एक जानकार के घर गई तो उसके बच्चे घर घर खेल रहे थे … एक बेटी मम्मी की चुन्नी की साडी बना रखी थी और मम्मी की हाई हील पहन रखी थी lipstick, हाथ में mobile और पर्स लटका हुआ था और उसका छोटा भाई उसका बेटा बना हुआ था और डांट रही थी कि सारा दिन खेलते रहते हो पढाई का नामोशिना नही पता नही क्या करोगे बडा होकर … मुझे हंसी आ गई क्योकि एक्टिंग बहुत ही अच्छी कर रही थी..

Importance of Mothers in Life

थोडी देर में लंच भी लग गया और लंच करने के बाद आईस्क्रीम सर्व की तो बच्चो को बहुत पसंद आई उन्होने दो बार फरमाईश कर दी और मेरी सहेली ने तुरंत अपने हिस्से की आईस्क्रीम भी उन्हें दे दी और जब मैने उसकी तरफ देख तो खो खो खांसी करती हुई बोली आज गला कुछ ठीक नही …

Importance of Mothers in Life

मुझे याद आई अपनी बचपन की एक बात जब मम्मी अपना खाना हमें दिया करती थी तो मैं हमेशा सोचती जब मैं बडी हो जाऊंगी मम्मी बन जाऊंगी तो मैं अपनी आईस्क्रीम या राजमा चावल जो मेरे फेवरेट थे किसी को नही दूंगी … फ्रिज में छिपा कर रख दूंगी या किचन में … पर मम्मी बनने के बाद … बताने की जरुरत नही …

सभी को पता है … ऐसी ही होती हैं मम्मियां… बच्चों ने खाया तो ऑटोमैटिक है मां का पेट खुद ब खुद भर गया …

एक गाना है उसको नही देखा हमने मगर .. पर उसकी जरुरत क्या होगी … ए मां तेरी सूरत से अलग …

 

Importance of Mothers in Life

 

मां का दिल ऐसा ही होता है - मदर्स डे पर एक अनुभवमां का दिल ऐसा ही होता है - मदर्स डे पर एक अनुभव

                                      मां का दिल ऐसा ही होता है –
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May 10, 2017 By Monica Gupta Leave a Comment

Competitive Exams और बच्चों की मेहनत

Competitive Exams और बच्चों की मेहनत- IIT HSEE 2017 – हर बच्चे का और माता पिता का सपना होता है कि बच्चा जिस Competitive Exams को दें उसमें अच्छे अंक मिलें . इसमें दोनों की मेहनत होती है बच्चों की भी और कोचिंग संस्थान की भी.

Competitive Exams और बच्चों की मेहनत

ये होते हैं बच्चें … पढने वाले बच्चे अलग ही होते हैं ये बात मैं इसलिए कह रही हूं कि आज कुछ ऐसा ही देखा … हरियाणा के हिसार में रहने वाले  भावेश ख्यालिया की IIT HSEE 2017 All India Ranking 8 आई है जब मुझे पता चला तो मैने बात करनी चाही तो पता चला कि वो दो साल से अपने पास फोन नही रखते…..

आर्टिकल में देरी भी इसलिए हो गई कि उन्हें उनकी फोटो नही मिल रही थी … जहां हम जैसे लोग दिन भर सैल्फी लेते रहते हैं और मोबाईल तस्वीरों से भरा रहता है भावेश इन सबसे कोसो दूर है …

 

 

नतीजा कल देर शाम ही आया और भावेश को पूरे देश में 8 रैंक मिली … निसदेंह खुशी की बात है और गर्व की बात है माता पिता के लिए और उस संस्था के लिए जहां से वो कोचिंग ले रहा हैं …

Cross & climb coaching  संस्था के डायरेक्टर श्री आर के नारवाल भी बच्चों की शानदार उपलब्धि से बहुत खुश हैं श्री नारवाल career counselling में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं और उनका कहना है कि हम हर उस काम को कर सकते हैं जिसे हम करना चाहते हैं हर बच्चा इतिहास लिख सकता है अगर उसे सही दिशा मिले …

वही भावेश ख्यालिया के मम्मी पापा दोनों ही शिक्षा के क्षेत्र से जुडे हैं पापा श्री राजकुमार ख्यालिया हिसार Government College, Hisar  में Sociology के Professor है और सरकारी स्कूल में मम्मी सुशीला ख्यालिया संस्कृत की टीचर हैं दोनों ही अपने बेटे की इस शानदार सफलता बेहद उत्साहित हैं  और इसका पूरा श्रेय भावेश की मेहनत और उसे मिला सही मार्ग दर्शन को देते हैं उनका कहना है कि अगर इसे सही कोचिंग नही मिली होती तो शायद वो इतना अच्छा नही कर पाता …

उन्होनें विशेष धन्यवाद Cross & Climb को दिया जहां भावेश लगभग एक साल से पूरी तरह से तल्लीन होकर पढ रहा था…

जब भावेश ख्यालिया से बात हुई तो वो बिल्कुल सहजता से बोले कि अच्छा लग रहा है मेहनत की थी और सबसे ज्यादा योगदान कोचिंग का रहा … ना दिल्ली जाने की जरुरत हुई न कोटा … इतने अच्छे टीचर मिले कि जब भी जो भी मन में प्रश्न  आया वो पूछा और तुरंत उसका जवाब मिल गया … भावेश ने बताया कि दिन में 4 से 5 घंटे पढाई करता और उसके इलावा कोचिंग क्लास में जाता था… अभी भी वो और भी competitive exams की तैयारी में जुटे थे …

 

जो मैं शुरु में बात कर रही थी कि पढने वाले बच्चे ये होते हैं मोबाईल से दूर … बस एक लक्ष्य निर्धारित किया और उसी में जुटे हैं कि जिंदगी में कुछ बन कर दिखाना है … हमारी ढेर सारी बधाई भावेश के परिवार को और कोचिंग संस्था को जो इतनी अच्छी सुविधाएं दे रहे हैं बच्चे अपने लक्ष्य को हासिल करने में समर्थ हो रहे हैं …

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डर के आगे ही जीत है - डर दूर करने के तरीका ये भी

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग लेखन

सोशल नेटवर्किंग साइट्स और ब्लॉग लेखन – Social Networking Sites aur Blog Writing –  Blog kya hai .कहां लिखें और अपना लिखा publish कैसे करे ? आप जानना चाहते हैं कि लिखने का शौक है लिखतें हैं पर पता नही उसे कहां पब्लिश करें … तो जहां तक पब्लिश करने की बात है तो सोशल मीडिया जिंदाबाद […]

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