रक्तदान के लिए प्रेरित कैसे करें
रक्तदान के लिए प्रेरित कैसे करें – “Exploring motivational factors for altruistic blood donation” – निस्वार्थ भावना से रक्तदान के लिए प्रेरित करने वाले कारण – *रक्तदान है तो गंभीर विषय पर मनोरंजक ढंग से या कुछ इस ढंग से अपनी बात रखी जाए कि लोगो के दिल को छू जाए तब भी जनता में रक्तदान के प्रति जनता में जागरुकता आ सकती है.महिलाओ को रक्तदान की महत्ता समझा कर उन्हें प्रेरित करना…
रक्तदान के लिए प्रेरित कैसे करें
जब मुझे यह विषय डाक्टर कंचन की ओर से मिला तो मैने तुरंत नॆट चला लिया और सोशल नेट वर्किंग साईट, फेसबुक और ब्लाग में खोजने लगी कि क्या क्या लिया जा सकता है
तभी मेरी नजर एक बात पर जाकर अटक गई. मै आपको जरुर बताना चाहूगीं. वैसे ये बात रक्तदान से सम्बंधित नही है. मैनें पढा कि घर पर कूडा कचरा वाला आया तो बच्चे ने मम्मी को आवाज देकर कहा कि मम्मी कूडे वाला आया है तब पता है मम्मी ने क्या कहा ? मम्मी ने कहा … नही बेटा ये तो सफाई वाला है कूडे वाले तो हम हैं जो हर रोज इसे कूडा देते हैं .बात मे बहुत दम था. मैं प्रभावित हो गई. उस महिला ने बहुत सही और समझदारी वाली बात कही. सच मानिए मुझे पहला पोईंट भी मिल गया.
जी हां, मेरा पहला पोईंट है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओ को रक्तदान की महत्ता समझा कर उन्हें प्रेरित करना.
रक्तदान के लिए प्रेरित कैसे करें
हम सब जानते हैं कि खून की कमी में हम महिलाए अव्वल नम्बर है अपने शरीर का ख्याल न रखने में महिलाए अव्वल है वही दूसरी ओर अपने परिवार में सभी का ख्याल रखने मे भी अव्वल नम्बर पर हैं और तो और अक्सर जब रक्तदान की बारी आती है तो अपने पति और बच्चों को लेकर बहुत संजीदा हो जाती है.
इसी बात पर मुझे एक उदाहरण याद आ रहा है जोकि एक साक्षात्कार के दौरान रक्त दानी हजारी लाल बंसल जी के बेटे ने बताया. उन्होनें बताया कि एक महिला के पति जोकि प्रोफेसर थे उनके पास रक्तदान के लिए फोन आया. प्रो साहब ने पत्नी को बताया तो पत्नी का चेहरा उतर गया खैर पत्नी को नाराज करके वो घर से निकल गए.रक्तदान केंद्र गए तो एक व्यक्ति पहले ही वहां लेटा रक्तदान कर रहा था तो पति महाशय कुछ देर वहां बैठ कर बतिया कर चाय बिस्कुट खाकर आधे घंटे में घर लौट आए.
पत्नी जी बाहर ही खडी थी पति को देखते ही बोली ओह आप कितने कमजोर लग रहे हो चेहरा भी उतर गया है. आराम से आईए भीतर. पति ने जब समझाया कि ऐसी कोई बात नही उन्होने रक्त दिया ही नही सारी बात बताने पर पत्नी को बहुत झेप आई. यह किस्सा बताने का मतलब यही है कि महिलाओ के मन से वहम निकाल कर रक्तदान के लिए उन्हे प्रेरित करना होगा और अगर वो प्रेरित हो गई तो एक बात की गारंटी है कि किसी को भी जागरुक करने में अव्वल होंगीं अगर वो जागरुक हो गईं तो यकीनन देश से रक्त की कमी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.
*इसके साथ साथ हमेशा नए विचारो को महत्ता देनी चाहिए. युवा वर्ग को सुनना चाहिए. खासकर बच्चे भी स्मार्ट फोन की तरह बहुत स्मार्ट हो गए है. वैसे इसी स्मार्टनेस पर फिर एक छोटी सी कहानी याद आ रही है कि एक आदमी नाई से अपने बाल कटवा रहा होता है एक बच्चे को आता देख नाई आदमी से कहता है कि आपको कुछ दिखलाता हूं फिर नाई ने बच्चे को अपने पास बुलाया और अपने एक हाथ में 10 रूपए का नोट रखा और दूसरे में 2रूपए का सिक्का, तब उस लड़के को बोला “बेटा तुम्हें कौन सा चाहिए?” बच्चे ने 2 रूपए का सिक्का उठाया और बाहर चला गया।
नाई ने कहा, “मैंने तुमसे क्या कहा था ये लड़का कुछ भी नही जानता, बुद्दू है अगर समझदार होता तो दस रुपए ही उठाता. बाल कटवाने के बाद जब वो बाहर निकला तो उसे वही बच्चा दिखा जो आइसक्रीम की दुकान के पास खड़ा आइसक्रीम खा रहा था।“ उस आदमी ने बच्चे से पूछा कि उसे दस और दो रुपए मे फर्क नही मालूम बच्चे ने अपनी आइसक्रीम चाटते हुए जवाब दिया, “अंकल जिस दिन मैंने 10 रूपए का नोट ले लिया उस दिन खेल खत्म। अगर मै 10 रुपए ले लूंगा तो आगे से वो मुझे आगे से कभी नही देंगें. बहुत समझदारी थी उसकी बात में. तो पोईंट यही है कि युवाओ के नए नए विचारो को अपनाना चाहिए. इसी कडी स्कूलों मे काम्पीटिशन और क्विज शो करवाए जाए या आन अलईन प्रतियोगिताए करवाई जाएं ताकि बच्चे रक्तदान की महत्ता को जाने.
*इसी संदर्भ में अलग अलग जगह जाकर रक्तदान प्रदर्शिनी का आयोजन किया जाए ताकि अन्य राज्यो क्या हो रहा है हमॆं जानकारी मिलती रहे और हम उससे बेहतर क्या अलग और नया कर सकें.
*जनता और ब्लड बैंक के बीच सीधा संवाद हो तो ना सिर्फ जनता जागरुक बनेगी बल्कि उसके ब्लड बैंक या रक्तदान से सम्बंधित जो भ्रंतियां हैं वो भी दूर होंगी जोकि बेहद जरुरी है और रक्तदान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है.
*रक्तदान है तो गंभीर विषय पर मनोरंजक ढंग से या कुछ इस ढंग से अपनी बात रखी जाए कि लोगो के दिल को छू जाए तब भी जनता में रक्तदान के प्रति जनता में जागरुकता आ सकती है.
*इस क्षेत्र मे सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि हमें स्वैच्छिक रुप से रक्तदान और जनता को भी प्रेरित करते रहना चाहिए भले की कोई सराहे या न सराहे. बस अपने कार्य मे निस्वार्थ सेवा से जुटे रहना चाहिए. सेवा से याद आया कि क्या आप जानते हैं कि “मैन आफ द मिलेनियम” कौन हैं. नही जानते !!! अच्छा रजनीकांत के बारे मे कितने लोग जानते हैं ह हा वो शायद सभी जानते हैं
मै आपको बताना चाहूगी कि रजनीकांत भी उन्हे अपना पिता मानते हैं. अब सोचिए कितने दमदार होंगें वो व्यक्ति. उनका नाम है पी. कल्याण सुंदरम. लाईबरेरी सांईस में गोल्ड मेडलिस्ट सुंदरम दक्षिण भारत के तमिलनाडू मे रहते हैं और पिछ्ले 30 सालो से अपनी सारी कमाई सामाजिक कार्यो मे लगा रहे हैं और रिटायर्मेंट के बाद जब पेंशन के दस लाख मिले तो वो भी समाज सेवा मे लगा दिए. अमेरिका सरकार ने उन्हे मैन आफ द मिलेनियम से नवाजा और 30 करोड रुपए भी दिए. वो भी इन्होने सेवा मे लगा दिए. आपके मन मे यह प्रशन भी आ रहा होगा कि खुद कैसे जीवन यापन करते तो एकाकी जीवन जीने वाले सुंदरम पार्ट टाईम वेटर का काम करके अपना खर्चा चलाते हैं. ऐसे व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत्र बनते हैं इसलिए हमे ऐसे लोगो से कुछ सीखना चाहिए और बस निस्वार्थ भाव से सेवा करते रहनी चाहिए.
*कुछ ऐसे मरीज जिन्हें रक्त की जरुरत समय समय पर पडती रहती है ऐसे मरीजो के संदेश जनता तक पहुंचाने से भी लोगो में रक्तदान की भावना बढती है. जम्मू निवासी हीमोफीलिया के मरीज जगदीश जी हैं वो शिक्षक है और अपनी आधी तन्खाह हीमोफीलिया के मरीजो पर खर्च करते हैं वहीं मुम्बई से संगीता हैं जो थैलीसीमिया का सामना बेहद बहादुरी से कर रही हैं उन्होने थैलीसेमिया की वजह से अपनी बहन को खोने के बाद फेस, फाईट और फिनीश के नाम से इस बीमारी को जड से ही खत्म करने पर सराहनीय कार्य कर रही है यकीनन ऐसे लोगो के उदाहरण उनकी अपील भी नई दिशा दिखा सकती है.
*जो लोग इस क्षेत्र मे अभूतपूर्व काम कर रहे हैं उनसे जुडे रहना चाहिए और दूसरो को भी उनके बारे मे बताते रहना चाहिए. चाहे कोई व्यक्ति विशेष हो या पूरी टीम. व्यक्ति विशॆष की अगर मैं बात करु तो मैं कुछ ऐसे नाम जरुर लेना चाहूगी जोकि रक्तदान के क्षेत्र मे एक मिसाल है. दिल्ली डाक्टर संगीता पाठक, चंडीगढ से डाक्टर रवनीत कौर, श्री राकेश सांगर (पंचकुला) , ब्लड कनेक्ट टीम (नई दिल्ली) , श्री राजेंद्र महेश्वरी (भीलवाडा), श्री दीपक शुक्ला(जलगांव) , डाक्टर सोनू सिह (दिल्ली), जगदीश कुमार (जम्मू) संगीता वधवा(मुम्बई) और बेहद सराहनीय कार्य कर रहें हैं. ये वो नाम हैं जब भी विभिन्न राज्यों से मेरे पास जब भी रक्त की जरुरत के लिए फोन आए और मैने इन लोगों को सम्पर्क किया तो इन्होने तुरंत अरेंज करवा दिया और मरीज को नया जीवन मिल गया . ना जाने कितने परिवारो के लिए ये हीरो और हीरोईन हैं और इन सबसे उपर मेरे जीवन साथी संजय जी जिन्होनें मुझे हमेशा प्रेरित किया कि अगर रक्तदान नही कर सकती तो कोई बात नही लोगो को जागरुक और मदद तो कर ही सकती हो.ऐसे व्यक्तित्व का हमेशा हमे धन्यवादी होना चाहिए.
*और जैसाकि मैने शुरु में बताया था कि डाक्टर कंचन का फोन आते ही मैने नेट देखना शुरु किया. असल में, नेट के माध्यम से भी हमे रक्तदान के क्षेत्र मे ना सिर्फ देश की बल्कि विदेशो की भी नई नई जानकारी मिलती रहती है इसलिए सोशल नेट वर्किंग साईटस भी देखना बहुत जरुरी है.
*अपना या अपनी संस्था का अच्छा सा प्रोफाईल बना कर भी लोगो का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है. ताकि जनता को लगे कि सही मायनो मे कौन किस तरह से और कितना काम कर रहा है और अगर वो भी इस कार्य का हिस्सा बनना चाहे तो बन सकें. उसमे अपनी उपलब्धियां और विस्तार से जानकारी होनी चाहिए.
*होली, जन्मदिन, सालगिरह इत्यादि कुछ खास दिनो पर रक्तदान करके लोगो का ध्यान आकर्षित किया जा सकता है.
*अखबार या अन्य पत्र पत्रिकाओं में रक्तदान से सम्बंधित अच्छे रंगीन लेखों के माध्यम से जागरुक किया जा सकता है.
* रक्तदान से सम्बंधित कार्टून बना कर भी समाज मे जागरुकता लाई जा सकती है.
*जागरुक करने के लिए कोई ईवेंट किया जा सकता हैं , कुछ हट कर कर दिखा सकते हैं ताकि जनता के मन मे जिज्ञासा बनी रहे. जैसाकि सूरत के अखिल भारतीय तेरापंथी युवक परिषद ने रक्तदान कैम्प लगाया था. जो कि अपने आप में ही एक रिकार्ड है. आईएसबीटीआई ने भी पिछ्ले साल 12 अगस्त को एक विशाल ब्लड ड्राप बना कर एक कीर्तिमान कायम किया. और इस तरह जैसे हर साल आईएसबीटीआई कांफ्रेस आयोजित करती है ऐसे की करती रहे ताकि नई नई बाते पढने सुनने और जानने का अवसर मिलें
और सबसे जरुरी बात यह कि हमें खुद को टटोलना है लोगों की बातों मे आए बिना खुद को जागरुक बनाना हैं क्योकि
मसला ये भी है इस बेमिसाल दुनिया का
कोई अगर अच्छा भी है
तो वो अच्छा क्यूँ है !!!
Transcon 2014 पटियाला के दौरान मेरे लेक्कचर के कुछ अंश ….
रक्तदान के लिए प्रेरित कैसे करें
रक्तदान की महत्ता
रक्तदान की महत्ता
इस बात मे कोई दो राय नही कि स्वैच्छिक रक्तदान को लेकर आम जन में जागरुकता पहले की अपेक्षा बढी है और वो बढ चढ कर रक्तदान के लिए आगे आ रहे हैं पर इस बात से भी नकारा नही जा सकता कि इस क्षेत्र में बहुत सी ऐसी भ्रांतियाँ या जानकारी का अभाव है जिनकी वजह से लोगो के बढते कदम पीछे हट जाते हैं. तो ऐसे मे क्या तरीके अपनाए जिनसे ना सिर्फ लोग ही आगे आए बल्कि पूरे परिवार के साथ आकर अन्य परिवारों को भी जागरुक करें.
सबसे पहले तो हमें खुद को ही जागरुक करना होगा. जैसा कि अगर हम चाह्ते हैं कि रक्तदान के क्षॆत्र में शत प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदाता हो तो, ऐसे में, कुछ लोगो का कहना यह भी होता है कि ये कोई होने वाली बात है मतलब ही नही. सबसे पहले तो हमें ये नकारात्मक मानसिकता खत्म करनी होगी.विभिन्न उदाहरणों से लोगो को संतुष्ट करना होगा जैसाकि हाल ही मे देश से पोलियों खत्म हुआ है. जिसके बारे में सोचा भी नही जा सकता था तो ये सोचना कि यह असम्भव है सबसे पहले तो मन से यह विचार निकालवाना होगा और फिर ये कैसे सम्भव है इस पर विचार करना आरम्भ करना होगा. इसके लिए सबसे जरुरी है कि हमारे पास रक्तदान से सम्बंधित बातों की जानकारी हो. अक्सर आधी अधूरी जानकारी के चक्कर में ना तो हम खुद और न ही दूसरो को मोटिवेट कर पाते हैं. यह जानकारी हमें अपने अपने क्षेत्र के डाक्टर, रक्तदाता या ब्लड बैंक से विस्तार से मिल सकती है.
जानकारी मिलने के बाद हमें शुरुआत अपने ही घर से करनी होगी. हम सभी जानते हैं कि घर परिवार की मुख्य धुरी महिला होती हैं. आमतौर पर यह देखा गया है कि महिलाएं अपने पति या बच्चों के रक्तदान करने की बात तो दूर इस विषय पर चर्चा तक करना पसंद नही करती. इसका सीधा सीधा कारण है उनमें जानकारी का अभाव होना. बहुत से ऐसे उदाहरण मैने देखें हैं जिसमें पति पचास बार से भी ज्यादा बार रक्तदान कर चुका है पर पत्नी को नही बताया या घर मे मां को नही बताया कि अगर बताया तो बहुत डांट पडेगी. जबकि ऐसा नही है. महिलाए सारे परिवार को बेहद समझादारी से सहेज कर रखती हैं ऐसे में बस जरुरत है कि रक्तदान के बारे मे विस्तार से समझाने की और उनकी सारी भ्रांतियाँ को दूर करने की. अगर वो समझ गईं तो तो ना सिर्फ वो अपने घर परिवार के लोगो को जागरुक करेगी बल्कि खुद भी रक्तदान के लिए आगे आएगीं. वैसे अपवाद भी बहुत हैं इस क्षेत्र मॆ. समाज मे ऐसी भी महिलाए हैं जो रक्तदान की महत्ता समझती हैं पर इनकी गिनती बस ऊंगलियों पर ही है जबकि हमें इस संख्या को असंख्य करना है.
इसके साथ साथ देश के जाने माने रक्तदाताओं के साथ जनता की समय समय पर राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर पर रुबरु मुलाकात करवाई जाए ताकि वार्तालाप के माध्यम से जनता के मन में जो भी विचार हैं वो सांझा किए जा सकें. कुछ समय पहले रक्तदान के क्षेत्र में जबरदस्त कार्य कर रहे देवव्रत राय साहब को तीन दिन की ट्रेनिंग के सिलसिले में पंचकुला आमंत्रित किया गया था. उनके अनुभवों ने जनता को प्रेरित करने के साथ साथ बहुत प्रभाव भी छोडा. उनका आना एक मील का पत्थर साबित हुआ इसलिए समय समय पर ऐसे व्यक्तित्व को आमंत्रित करते रहेंगें तो निसंदेह जनता की रक्तदान से सम्बंधित जानकारी भी मिलेगी और ज्ञिज्ञासाओं का समाधान भी होता रहेगा.
इस बात में कोई शक नही कि विभिन्न राज्यों के कुछ लोग निस्वार्थ भाव से रक्तदान के क्षेत्र में बहुत सराहनीय कार्य कर रहे हैं. टीम बना कर या ब्लाग के माध्यम से या फिर वेब साईट बनाकर अपने अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं. उनके काम करने के तरीके को, चित्रों या पोस्टर्स के माध्यम से प्रदर्शिनी रुप में लगाया जाएगा तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.
कुछ खास मौकों पर रक्तदाताओं और उनके परिवारो को सम्मानित करते रहने से भी रक्तदान के प्रति उत्साह बढता है. मैने स्वयं अनेक कार्यक्रम ऐसे देखें हैं जहां मंच पर रक्तदाता परिवारों को बुला कर उनके अनुभव सांझा किए जाते हैं और उन्हें सम्मानित भी किया जाता है. इतना ही नही जिसने एक बार भी (खासतौर पर महिला) रक्तदान किया है उसके अनुभव भी पूछे जाते हैं और सम्मान देकर प्रेरित किया जाता है. यकीन मानिए इस तरह से उनका बोलना उन लोगो पर बहुत प्रभाव डालता है जिन्होने एक बार भी रक्तदान नही किया.
जब हम परिवार की बात करते हैं तो मन में बुजुर्गों की छवि के साथ साथ बच्चों की छवि भी उभर कर आती है. बच्चें हमारे देश का भविष्य हैं. अगर हम नींव भी मजबूत बना देंगें तो आने वाले समय में जागरुकता खुद ब खुद बढ जाएगी. स्कूल के पाठय क्रम में या फिर एक स्पेशल क्लास इसी से सम्बंधित होनी चाहिए. छात्रो का समय समय पर हीमोग्लोबिन चैक होना चाहिए ताकि बचपन से ही वो अपने स्वास्थय का ख्याल रखें. नियमित चैकअप से खानपान के बारे मे जागरुकता भी बढेगी. खासकर लडकियां पौष्टिक भोजन लेती रहेंगी और 18 साल के होते होते तक वो बेझिझक रक्तदान कर पाएगीं.
रक्तदान से सम्बंधित एक पत्रिका या अखबार निकले और उसमे पूरे देश के रक्तदान की मुहिम से जुडे लोगों के परिचय और उनका अनुभव हो तो इससे भी जागरुकता लाई जा सकती है. इसी के साथ साथ सोशल नेट वर्किग साईट जैसे कि फेसबुक पर भी पेज बना कर पूरे देश से जुडा जा सकता है और नई नई जानकरी भी मिल सकती है.
कहने का आशय यह है कि जनता को, उनके परिवार को स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति प्रोत्साहित करने के सैकडो तरीके हैं बस जरुरी है कि हमारे भीतर की लग्न, एक जोश,एक जज्बा, एक कर्मठता को जगाने की. अगर वो जाग गया तो हमें अपने मकसद से कामयाब होने से कोई ताकत नही रोक सकती.
रक्तदान की महत्ता लेख आपको कैसा लगा ?? जरुर बताईएगा !!!
पति, पत्नी, एवरेस्ट और चांटा
पति, पत्नी, एवरेस्ट और चांटा
दिन पहले खबर पढी थी कि पाकिस्तान में काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी सीआईआई ने अपने महिला संरक्षण विधेयक में एक अजीबो-गरीब प्रस्ताव दिया है। यदि पत्नियां अपने पति की अवज्ञा करती हैं तो पाकिस्तानी पति उनकी थोड़ी सी पिटाई कर सकते हैं।
आईआई ने सुझाव दिया है कि अगर महिला हिजाब नहीं पहनती है, तब भी उसकी पिटाई की इजाजत दी जानी चाहिए। इसके अलावा अपरिचितों से लगाव रखने और इतनी ऊंची आवाज में बात करने कि कोई अपरिचित उसे सुन ले तो भी उसकी हल्की पिटाई होनी चाहिए। पत्नी अगर पति से बिना पूछे दूसरों को पैसे देती है तो भी पति को पिटाई की इजाजत मिलनी चाहिए..
पाकिस्तान की संस्था ने महिलाओं की सुरक्षा पर पेश विधेयक में कहा- पत्नी बात नहीं माने तो पीट सकते हैं | Jansatta
मैं सोच ही रही थी कि इस पर अपनी क्या प्रतिक्रिया लिखू तभी एक इस पुरानी खबर पर नजर चली गई और मैं चुप हूं … आप भी पढिए किसलिए !!
कई बार बहुत बाते मिसाल बन जाती हैं एक ऐसी ही मिसाल बने ये हरियाणा के दम्पति …इन्होंने एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने में सफलता हासिल की है। ऐसा कारनामा करने वाला यह पहला भारतीय जोड़ा है बात 30मई 2011 की है.
ऐवरेस्ट पर एक हरियाणा के दम्पंति ने परचम लहराया. बहुत खुशी हुई और जान कर हैरानी भी हुई कि पत्नी जोकि कांटेबल है जब चढाई के दौरान वो घबरा गई तो उसने वापिस जाने की जिद ठान ली ऐसे मे उसके पति ने उसे जागरुक करने के लिए एक थप्पड रसीद कर दिया और उसी की बदौलत वो चढी और चोटी पर झंडा फहराया.
बेशक ये थप्पड सफलता का थप्पड साबित हुआ पर जिस तरह से हम पिटाई की निंदा करते हैं क्या इस पिटाई की भी निंदा की जानी चाहिए या तारीफ …
स्कूली दिनो मे भी हमे डंडा या थप्पड मारते टीचर अभी तक याद है.कई बार मार जरुरी हो जाती है पर आजकल समय बदल गया है.अब तो हाथ उठाते ही नौकरी से ही निकाल देते है तो कही कोई एवरेस्ट पर ही जीत हासिल कर लेता है !!!
एवरेस्ट
फेसबुक लाईक
फेसबुक लाईक
फेसबुक के साथ साथ फेसबुक लाईक और डिसलाईक का भी क्रेज है. अब इन भिखारी जी को ही देखिए … जिसने भी भीख दी लाईक कर दिया
How To Gain More Facebook Like – Lifestyle
फोटो का इस्तेमाल करें फेसबुक पर अपनी बात को इमेज के साथ पोस्ट करें. ऐसा पाया गया है कि साधारण टेक्स्ट की तुलना में तस्वीर के इस्तेमाल से पोस्ट हुई चीजों पर 53 फीसदी ज्यादा लाईक करते हैं. ऐसे पोस्ट पर लोग 104 फीसदी ज्यादा कमेंट करते हैं और इस तरह की पोस्ट के थ्रू 84 फीसदी ज्यादा क्लिक की संभावनाएं भी होती हैं.80 कैरेक्टर तक मैटरफेसबुक पर पोस्ट करते टाइम टेक्स्ट मैटर का ख्याल रखें. कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करें.
ऐसा देखा गया है कि 80 कैरेक्टर तक लिखे पोस्ट पर 66 फीसदी ज्यादा लोग समय बिताते हैं. ज्यादा शब्दों के इस्तेमाल होने पर उस पोस्ट को देखते ही लोग आगे बढ़ जाते हैं. भले ही वह कितना भी इंट्रेस्टिंग क्यों न हो.सवाल पोस्ट करेंऐसा पाया गया है कि किसी सवाल के पोस्ट करने पर 100 फीसदी ज्यादा रिस्पांस देखने को मिलता है. अपने फेसबुक पेज पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को इंगेज करने के लिए आप कोई सवाल पोस्ट कर सकते हैं.
सवाल लोगों के मन में कौतूहल पैदा कर देता है और हर यूजर इसका जवाब देना चाहता है.पोस्ट के टाइम का ध्यान रखेंऐसा देखा गया है कि सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक फेसबुक पर लोग एक्टिव रहते हैं. इसमें भी दोपहर के टाइम ज्यादा चहल-पहल रहती है.
दोपहर के बाद शाम 3 बजे फेसुबक का पीक टाइम होता है. इस टाइम पर सबसे ज्यादा यूजर एक्टिव रहते हैं. यानी शाम 3 बजे के आसपास पोस्ट करने पर लोग ज्यादा रियेक्ट करते हैं.रोजाना दो बार अपडेटरोजाना एक या दो बार स्टेटस अपडेट करने पर आपको 40 फीसदी ज्यादा रिस्पांस मिल सकता है. वहीं यदि आप वीक में एक से चार बार स्टेटस अपडेट करते हैं तो आपको 71 फीसदी ज्यादा रिस्पांस देखने को मिल सकता है. यहां 40 फीसदी रिस्पांस प्रतिदिन और 71 फीसदी पर वीक है, इस डाटा से कंफ्यूज न हों. How To Gain More Facebook Like – Lifestyle
बरसात
बरसात
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड दिया… कभी वो दिन भी थे जब बरसात आने पर खुशियां मनाई जाती थी. पकवान बनाए जाते थे पर आज वो बात नही आज के सन्दर्भ में बात करें तो गंदगी इतनी है कि डेंगू भरपूर पनप रहा है और बीमारी फैला रहा है वही सीवर की हालत इतना खस्ता हो चली है कि बाहर का पानी घरों में घुस जाता है और सारा घर गंदा हो जाता है चलिए ज्यादा कुछ नही कहूंगी आप पढिए … बरसात पर लेख
प्यारा परिवर्तन
बिजली का महत्व
बिजली का महत्व
हमारी जिंदगी मे बिजली का बहुत मह्त्व है. ये रहे तो भी और न रहे यानि कट लगते रहे तो भी … ज्यादा हैरान होने की जरुर नही है … अगर आप ये लेख पढेगें तो सब समझ आ जाएगा . लेख का शीर्षक है बिजली रानी तुम कब जाओगी !!!
बिजली का महत्व
हे भगवान
एक प्रार्थना ईश्वर के नाम
हे भगवान! A Prayerत्योहार आते नही कि मंदिरों में भीड बढ जाती है. सुबह शाम जब भी जिसे समय मिलता है पहुंच जाता है. कई बार लम्बी लाईन होती है. अक्सर जब कई घंटो की तपस्या यानि लाईन में लगने के बाद हम अपने लक्ष्य पर पहुंच कर ह्म ईश्वर की प्रतिमा को निहार ही रहते होते हैं कि पंडित जी चलो चलो, आगे चलो, रुको नही , बोल कर हमे आखे खिसका देते हैं .
कुछ मंदिरों में चढावे के हिसाब से दर्शन करवाए जाते हैं. पंडित जी न जाने कैसे हमारे हाथ मे राशि देख लेते हैं अगर दस रुपए है तो चलो चलो आगे. 50 रुपए है तो हमें थोडा आदर मान मिल जाता है और अगर 100 रुपए या उससे ज्यादा हो तो वी आईपी ट्रीटमैंट. आपके लिए पंडित जी श्लोक भी बोलेगें और दो मिनट लगा कर पूजा भी होगी ये मेरा पर्सनल अनुभव है.
हे भगवान उठाले मुझे
एक बार तो मंदिर में गलती से आरती के समय पंहुच गए. क्षमा करें, मैने “गलती” शब्द इस्तेमाल किया . असल में, अनुभव ही कुछ ऐसा रहा इसलिए यही शब्द उचित लगा. भयंकर भीड थी. आरती के बाद फेरी शुरु हो गई. बस मुझे नही पता कि फेरी कैसे ली . मैं चल नही रही थी भीड द्वारा चलाई जा रही थी. इतनी धक्का मुक्की की बस … हालत खस्ता हो गई लगा कि अब प्राण गए मेरे .. अब मरी …
हे भगवान उठाले मुझे वाली फीलिंग आ रही थी पर पर पर बच गई और जान में जान आई. तब से तौबा कर ली कि ऐसे समय में मंदिर नही जाना.
मेरी एक सहेली की मम्मी रोज सुबह मंदिर जाती हैं और दो धंटे लगाती हैं. जाने से पहले घर पर तनाव रहता है और आते ही ये नही हुआ वो नही ये क्या है … !!!यानि कोई शांति नही … वही मेरी सहेली मणि मंदिर जाने की बजाय घर का काम करते करते हमारे ही ईश्वर का नमन या Prayer हे भगवान बोलती रहती है और यकीन मानिए मुझे वो ज्यादा सही लगता है. दिखावा किसलिए करना !!
दिल से याद करना चाहिए वैसे दिल से याद करने पर मुझे एक बात याद आई आप कहें तो सुनाऊ… चलिए सुना ही देती हूं…
वो क्या है ना कि देवी देवता भी जानते है कि अधिकांश लोग दिल से पूजा करने की बजाय दिखावे पर ज्यादा जोर देते है.
एक कहानी
एक बार देवी, देवता बहुत दुखी होकर बाते कर रहे थे कि हम अगर पहाडो पर बस जाते है तो लोग वहांं पहुच जाते हैं और अगर समुद्र मे अपना बसेरा कर ले तो भक्त वहाँ भी नही छोडते. तो हम जाए तो जाए कहाँ ???इस पर पता है नारद जी ने कहा, नारायण.. नारायण … ये तो बहुत ही आसान है. आप लोगो के दिलो मे बस जाओ.बस वही एक जगह है जहां आपको वो नही खोजते.
इसलिए सच्चे दिल से अराधना कीजिए. ईश्वर आपके दिल मे ही विराजमान हैं. आपकी मनोकामना जरुर पूरी होगी 🙂
हे भगवान … आपको कैसा लगा ??? जरुर बताईगा !!
Public Speaking
Public Speaking
कुछ समय पहले रक्तदान पर एक सेमिनार मे जाना हुआ. असल में, वहां मेरा भी lecture था. स्वाभाविक है कुछ पेट में butterflies, टेंशन और धबराहट थी. मुझे lunch के बाद का समय मिला था. इसलिए लंच का मन ही नही किया. लंच टाईम में मैं उसी कक्ष में आ गई जहां मुझे बोलना था.
दो बजे और लगभग कक्ष पूरा भर गया. मेरा नम्बर सात वक्ताओं के बाद का था और सभी को दस दस मिनट मिले. वक्ता एक एक करके बोले जा रहे थे और यकीन मानिए इक्का दुक्का को छोड कर बस बोले जा रहे थे. उन्हें दर्शकों से कोई लेना देना नही था. इतना ही नही मेरे साथ बैठी महिला के खर्राटे मैं आराम से सुन पा रही थी. कोई मोबाईल पर लगा था तो कोई टेक लगा कर आराम से AC hall मे उंघ रहा था शायद सभी को दिन में भोजन के बाद सोने की आदत होगी. मैं सोच रही थी कि मेरी मेहनत तो बेकार ही जाएगी जब कोई सुनने वाला ही न हो … हां सुनने वाले तीन लोग तो जरुर थे पहली जो स्टेज पर आने का निमंत्रण दे रहीं थीं. दूसरे जो स्टेज पर थे और तीसरे जो certificate या मोमेंटो आदि देने की तैयारी कर रहे थे. वक्ता के बोलने के बाद ताली भी ऐसे बजा रहे थे खुद की ताली की आवाज अपने ही कानों को न सुनाई दे. बस एक्शन ही था ताली का.
…. और मेरा नम्बर भी आ गया. मेरे साथ बैठी खर्राटे लेती महिला भी उठ चुकी थी और उनकी नजरे दरवाजे की तरफ थी कि कब चाय आए और वो फ्रेश हो जाए. खैर. मैने स्टेज पर जाकर अभिवादन किया और पूछा कि स्टेज पर यहां खडे होकर वक्ता को एक बात से बहुत डर लगता है. क्या आप बता सकते हैं? दर्शक थोडे उत्सुक हो गए . किसी ने कहा कि भूलने का डर तो किसी ने कहा अपना पेपर ही न लाए हो अलग अलग आवाजे आ रही थी पर मैं सभी की बाते बेहद विश्वास से मना करती जा रही थी फिर मैने कहा डर इस बात का लगता है कि सामने सीट पर बैठे लोग सो न रहे हो…लंच टाईम से पहले तो लोग लंच की इंतजार में जागते हैं पर लंच के बाद हालत गम्भीर हो जाती है और एक आध झपकी … !! ठहाके से कक्ष गूंज उठा. मैने विनती की कि प्लीज आप मत सोईएगा क्योकि आपको सोता देख मुझे भी नींद आ गई तो … !!! खैर, मैं अपना lecture शुरु कर चुकी थी और दस बारह मिनट बाद में समाप्त करके वापिस अपनी सीट पर जा रही थी. बेशक, बाद में बहुत लोग मिले. Visiting cards भी दिए. तारीफ भी की और अन्य सेमिनार के निमंत्रण भी मिले पर सोचने की बात ये है कि हम वक्ता के रुप में क्या बोले कि दर्शक बिना सोए और आराम से सुने. वैसे नेताओ को तो हम समय समय पर सुनते ही रहते है. कुछ पढ कर बोलते है कुछ बिना पढे बोलते है बिना पढ कर बोलने वालो को दर्शक ज्यादा पसंद करते हैं. विभिन्न सेमिनार में मेरा जो बोलने का अनुभव रहा है उसी के आधार पर मैं कुछ बातें शेयर करना चाह्ती हूं.
Public Speaking
कुछ लोग तो बहुत बोलते हैं बस माईक मिला नही कि आधा आधा घंटा बस बोलते रहते बोलते रहते हैं … ये भी ठीक नही. कम बोलिए और काम का बोलिए.
बेशक speaker को बोलने से पहले थोडा डर रहता है और होना भी चाहिए. कई बार अति आत्मविश्वास भी ठीक नही होता. बस मन ही मन खुद को तैयार करना है और लम्बे गहरे सांस लेने हैं और अगर पानी की आवश्यकता हो तो जरुर पी लें ताकि गला न सूखे और हो सके तो पानी की छोटी वाली बोतल पर अपने पास रख लें.
इस बात को भी मन मे बैठा लें कि जो सामने बैठे हैं ये भी सभी वक्ता हैं और आपकी तरह ही है अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.
आरम्भ में आप दर्शकों को अपना कोई उदारण दे कर बताएगें कि मेरे सामने बहुत माननीय लोग बैठे हैं अगर बोलने में हकला जाउं घबरा जाऊ या कोई गलती हो जाए तो क्षमा कीजिएगा तो इससे आप भी रिलेक्स हो जाएगें और दर्शक भी आराम से आपकी बात सुनेंगें.
अगर बोलते वक्त आप कोई PPT यानि Power Point Presentation दे रहे हैं तो और और भी अच्छा है आपका ध्यान स्क्रीन और लोगो की तरफ बराबर रहेगा और भूलने वाला कोई सीन ही नही होगा क्योकि आप अगली स्लाईड करके आराम से देख सकते हैं और इसी बीच बोलने में एक ठहराव भी ला सकते हैं जोकि जरुरी भी है.
कई बार वक्ता हाथ बहुत हिलाते हैं हाथों के हाव भाव होने चाहिए पर बहुत ज्यादा हाथ हिलाना कई बार मजाक का कारण बन जाता है. कई बार वक्ता बस पेपर रीडिंग ही करते रह जाते हैं जोकि बिल्कुल भी सही नही है ऐसे में तो दर्शको का सोना या उंघना पक्का होता है या फिर समय अवधि बहुत ज्यादा हो तो भी दर्शकों को नींद आ जाती है.
एक बार मंच संचालन के दौरान मैने देखा कि बहुत लोग सुस्त हो रहे हैं जी हां सही पहचाना वो भी लंच के बाद का सैशन था. एक व्यक्ति बार बार घडी देख रहा था. जैसे बहुत बोर हो रहा हो और दूसरा अपनी घडी हिला हिला कर देख रहा था. मेरे पूछ्ने पर उसने बताया कि वो ये देख रहा कि घडी रुक तो नही गई. चल तो रही है ना … !!! इस पर लोग थोडा हंस भी दिए और प्रोग्राम मे थोडी जान भी आ गई. कई बार छोटी छोटी बाते पूछ कर मनोरंजन करते रहना चाहिए. चाहे चुटकुला हो या प्रेरक प्रसंग या अपना कोई उदाहरण. पर सार्थक होना चाहिए यानि बातों बातो से ही निकलना चाहिए. जैसाकि इस बात पर मुझे एक बात याद आई … !!!
एक मुख्य बात यह भी की मुस्कान जरुर रखनी चाहिए. ना बहुत ज्यादा न बहुत कम. इससे दर्शकों को अच्छा लगता है. रोता मुंह या उदास मुंह कोई पसंद नही करता.
बातें और और भी बहुत है पर अगर ये लेख लंबा हो गया और आपको नींद आ गई तो तो तो … इसलिए अभी के लिए इतना ही… बाय बाय !
वैसे जाते जाते एक जरुरी टिप्स … रात को अच्छी नींद लीजिएगा ताकि अगले दिन अच्छी तरह से बोल पाए…
वैसे अगर कुछ टिप्स आपके पास भी हो leadership Speaking की तो जरुर दीजिए आपका स्वागत है … Public Speaking skills ,Public Speaking tips , Public Speaking course हो या आपका अपना अनुभव आपका स्वागत है …
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