Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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June 15, 2015 By Monica Gupta

काम वाली बाई

काम वाली बाई है मेरे पास हयं !!!!

पढने से पहले प्लीज ध्यान दें ….इस व्यंग्य की सारी बाते सच्ची धटना पर आधारित है और इसका किसी भी व्यक्ति,स्थान उम्र से अगर मेल हो तो इसे कोई हैरानी बात ना होगी ….

जी हां, अब मुस्कुराने की तो बात है ही..!! मेरे पास काम वाली बाई जो है. हयं.(अमिताभ स्टाईल मे)

cartoon maid servent by monica gupta

 

 

जी बिल्कुल, वो मुझे भूल जाए ऐसा हो नही सकता और मै उसे भूल जाऊ ऐसा मै होने नही दूगीं.(सुनील शेट्टी स्टाईल मे) सुबह शाम दिन मे दो बार आती है.क्या पूछा आपने !!छुट्टी इत्यादि!! अरे वो कोई भी दिक्कत ही नही, यह सब तो चलता ही रहता है.समय पर आती है!!! अरे समय की कोई बात नही. बस आना ही बहुत है उसका. हां वो अलग बात है कि इसके इंतजार मे मै जरा आस पास की पडोसनो के घर चक्कर लगा आती हूं और इसी बहाने मिलना जुलना भी हो जाता है सहेलियो से.

हां तो मै कह रही थी कि ….!! ओहो ! आपके पास तो प्रश्न बहुत है.मेरी भी तो सुनिए जरा. अब वो क्या है ना उसके घर आने के बाद आगे पीछे धूमना पडता है. असल मे, पिछ्ले दिनो एक सोने की चैन गुम …!!! अब उस पर तो शक कर नही सकती !!! अरे भई, शक किया तो छोड कर जो चली जाएगी ना !!!

हां, तो मै कह रही थी कि जब वो आती है तो सबसे पहले मै उसका स्वागत मुस्कुरा कर करती हूं. बैठाती हू और चाय भी पिलाती हूं.फिर जरा किसी सीरियल के बारे मे बातचीत करती हूं और फिर शुरु होता है हमारा काम… ओह आई मीन उसका काम!! इसके पीछे पीछे इसलिए धूमना पडता है कि उसकी नजर जरा कमजोर है. अक्सर या यू कहिए कि कई बार कूडा नही दिखता तो वो उसे दिखाना पडता है. फिर आजकल उसकी कमर मे दर्द चल रहा है उससे झुका नही जाता इसलिए जरा मै वहाँ झाडु करके उसकी मदद कर देती हूं.

झाड पोछ वो करती नही है इसलिए वो भी साथ की साथ मै ही करती हू ताकि एक ही बारी मे मेरा घर साफ साफ हो जाए.फिर अक्सर जाले वगैरहा भी साफ करने होते है ना मुझे वो उसका एक्स्ट्रा समय लेना पडता है और फिर उसके घर के लिए रोटियां या खाना इत्यादि पैक करके देना पडता है मुझे.!!!

बर्तन धोने के लिए गरम पानी करके देती हूं ताकि सारे बर्तन साफ धुले.अक्सर वो प्याज वाले बर्तन नही धोती. उसकी महक उसके सिर मे चढती है इसलिए प्याज वाले बर्तन मै ही साफ करती हूं और बर्तन धोने के बाद दूसरे घरो मे काम करने के चक्कर मे और जल्दी जाने के चक्कर मे वो बस टोकरी मे ही डाल जाती है जिसे मैं ही लगाती हूं.अरे( आपको क्या पता आठ घर है उसके पास!! अब थोडा सा लिहाज तो करना बनता है कि नही!!

अक्सर समय बेसमय उसे इनाम या उपहार स्वरुप कुछ ना कुछ देती रहती हूं. क्या !!! किसलिए ??? अरे भई ताकि वो महारानी जी टिकी रहे. क्या करे… आजकल काम वाली बाईया मिलती ही कहां हैं!!! कम से कम स्टेटेस मे तो है बताने को कि मेरे पास काम वाली बाई है.हयं!!

अच्छा, मै अभी चलती हूं!! क्या पूछा !!! कहां !! अरे! क्या बताऊ!! आज बो बोल कर गई है कि 200 रुपए बढाने है उसका खर्चा नही चल रहा है.. बस यही सुनने के बाद सिर जरा सा दर्द कर रहा है. वैसे आपसे क्या छिपाना !!

असल मे, आजकल सिर दर्द बहुत रहने लगा है और बीपी भी ज्यादा हो गया है.. वो क्या है ना काम वाली बाई को कुछ कह नही सकते कुछ कहो तो तैयार रहो सुनने के लिए कि जा रही हूं  छोड कर और अगर घर पर बताओ कि काम वाली बाई कितना तंग करती है तो वो तुरंत कह देते है कि हटा दो उसे. इतना परेशान किसलिए होना है. बस इसलिए ही ….!! पर मुझे खुशी है कि काम वाली बाई है मेरे पास !!पर अब बस फर्क इतना ही है कि हयं नही हाय ( मोनिका गुप्ता स्टाईल मे)

June 15, 2015 By Monica Gupta

काश मैं अध्यापक होता

काश मैं अध्यापक होता

 

cartoon arvind kejriwal by monica gupta

काश मैं अध्यापक होता

वैसे बचपन से सपने सभी देखते हैं कि मै बडा होकर ये बनूगां या वो बनूगां. तो जनाब, मेरा भी बचपन से सपना था कि काश मैं अध्यापक बनूं इसलिए नही कि मै पढने मे बहुत होशियार था. असल मे, आप से क्या छुपाना. मैंं पढाई मे बहुत कमजोर था पर दिक्कत की कोई बात नही थी क्योकि हमारे सर जी टयूशन मे पूरी मदद करते थे और हम भी समय समय पर उनके घर का छोटा मोटा काम करके जैसे कि जन्मदिन पर उपहार ले जाना, कपडे प्रैस करवा करवाना, जूता ठीक करवाना ,दर्जी से कपडे लाना या गैस बुक करवाना और अक्सर अपना गैस सिलेंडर ही दे आना वगैरहा वगैरहा करके उन्हे खुश रखते और हमे जाने अनजाने पेपर की जानकारी हो जाती और बिना पढे ही पास हो जाते और तो और कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जब पेपर चैक होने आते तो वो हमे पास बुला कर चुपचाप सारा पेपर लिखवा देते यानि पूरा सहयोग दोतरफा रहता.

शिक्षक की भूमिका

अब सर जी के इतने ऐशो आराम देख कर मन मे बचपन से ही इच्छा हिलोरे मारने लगी थी कि अगर कुछ बने तो टीचर ही बने और पूरी जिन्दगी आराम से बिताए क्योकि उन्हे ना तो स्कूल जाने की टेंशन और ना पैसो की क्योकि ट्यूशन से भरपूर कमाई थी.

क्या कुछ नही था उनके घर मे.सुख सुविधाओ का सारा सामान था.बच्चे अच्छे स्कूल के होस्टल मे पढ रहे थे . बस यही सब बाते दिल को छू गई और जब मैने अपनी दिल की बात सभी घर वालो को बताई तो घर के सभी लोग मेरा निणर्य सुन कर फूले नही समाए और जुट गए उसे पूरा करने मे.

अजी नही नही … पढाई और अच्छे अंक नही.बल्कि अच्छे सिफारिशी और खाऊ पीऊ नेता की तलाश में. बहुत जल्दी तलाश खत्म भी हो गई और कुछ सालो बाद मेहनत रंग लाई और मेरा सपना पूरा हुआ. पांच लाख रुपए देकर बात पक्की हो गई और मेरी पहली पोस्टिंग शहर से बहुत दूर के गांव मे सरकारी स्कूल के अध्यापक के तौर कर दी गई.

मै खुशी मे फूला ना समाया और अपना बोरिया बिस्तर लेकर नए सपने लिए गांव पहुंचा. सोचा था गांव के लोग स्वागत मे खडे होग़ें पर ऐसा कुछ नही हुआ बल्कि कुछ लोग इस इंतजार मे खडे थे कि कब मास्टर आए और पढाना शुरु करे. खैर पहला दिन था ना सोचा धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा.

अगले दिन कक्षा लेते हुए मैने ट्यूशन का जिक्र क्लास मे कर दिया कि कोई भी आ सकता है. अगले दिन पूरा गांव स्कूल मे इक्क़ठा हो गया और धमकी भी दे डाली कि खबरदार आगे से ट्यूशन का नाम भी लिया.जो पढाना है जितना पढाना है स्कूल के समय मे पढाओ और फिर भी नतीजा अच्छा ना आया तो आपकी खैर नही….!

मैने बडी मुश्किल से थूक गटका और कक्षा मे चला गया. पढाते पढाते मै सोचने लगा कि शायद पिछले कुछ सालो मे समय बहुत बदल गया है. खैर मैने हिम्मत नही हारी. अगले सप्ताह मैने धोषणा कर दी कि आने वाली 16 को मेरा जन्मदिन है पर हाय रे यहां भी किस्मत ने साथ नही दिया.कक्षा मे खडे होकर सभी बच्चो ने ताली जरुर बजा दी पर किसी एक बच्चे की तरफ से उपहार ….अजी मतलब ही नही.

खैर, एक दिन मैने एक बच्चे से कहा कि अपने घर का 5 किलो शुद देसी घी लेकर आना क्योकि शहरो मे तो मिलावट होती है ना. लडका सुबह सुबह घी ले आया और पीछे पीछे उसके पिता डंडा ले कर पहुंच गए कि घी के पैसे अभी दे दो क्योकि अक्सर बाद मे उन्हे याद नही रहता. मेरा तो सिर ही घूम गया. मरता क्या न करता. उसी समय रुपए देने पडे वो भी शहरी रेट से ज्यादा. मेरे पूछ्ने पर वो बोले कि शुद्द घी है खालिस है तो पैसे तो यकीनन ज्यादा लगेंगे ही.

उधर स्कूल मे स्टाफ ना के बराबर था. लगभग 200 बच्चो के स्कूल मे एक मैं और एक दूसरे अध्यापक और एक चपडासी था. अक्सर सरकारी काम कभी गणना तो कभी किसी दूसरे काम से हमारी डयूटी लग जाती तो दूसरे टीचर की क्लास भी लेनी पडती और कई कई बार तो चपडासी भी बनना पडता.

कभी गलती से किसी बच्चे से पीने के लिए पानी मंगवा लिया तो अगले दिन पूरा गांव इक्ट्ठा हो जाता कि हमारे बच्चे यहां पढने आते है ना कि यहां के चपडासी हैं. मै स्कूल मे 5 मिनट कभी देरी से पहुंचता तो गांव वाले गेट पर ताला लिए खडे रह्ते कि ऊपर शिकायत करगें कि मास्टर देरी से आते है और धमकी देते कि अगर आगे देरी से आए तो स्कूल को ताला ही लगा देगें.

मेरे तारे पूरी तरह गर्दिश मे चल रहे हैं.कभी किसी बच्चे ने अच्छा काम किया और मैने प्यार से सिर पर हाथ फेर दिया तो गांव वाले भडक लाते है कि बच्चे को छेड दिया. मास्टर का करेक्टर सही नही है और अगर किसी बच्चे ने सही काम नही किया और मैने गुस्सा कर दिया तो भी मुसीबत खडी हो जाती कि मास्टर पिटाई करता है.

कुल मिला कर मै हैरान परेशान हूं कि मैने टीचर बनने का सपना क्यो देखा. बार बार खुद को चिकोटी काट रहा हूं कि काश यह सब सपना ही हो पर अफसोस यह सच है सपना नही.

अब मुझे कैसे भी झेलना ही पडेगा. काश मैं अध्यापक होता … की बजाय यह कहना ज्यादा सही है कि काश मै अध्यापक “ना” होता.

काश मैं अध्यापक होता

काश मैं अध्यापक होता  आपको कैसा लगा … जरुर बताईएगा !!

June 11, 2015 By Monica Gupta

Statue of Bapu

Statue of Bapu

cartoon bapu by monica gupta

Statue of Bapu   आजकल गर्मी सारे रिकार्ड तोड रही है पारा हाई चल रहा है. पशु पक्षी भी गर्मी से बेहाल हैं …  पार्क मे बापू की मूर्ति लगी हुई है …  ये छोटा गरीब मासूम बच्चा सोच रहा है कि बापू को भी तो गर्मी लग रही होगी… इसलिए उनके उपर उसने छतरी कर दी …

June 10, 2015 By Monica Gupta

Mouth organ

Mouth organ … बहुत दिनों के बाद मणि का बेटा दो दिन के लिए घर आया. नाश्ते के बाद बेटे ने अपना बैग खोला और बोला आखॆं बंद करो आपके लिए कुछ है. फिर मणि के हाथ कुछ पकडा दिया. हाथ मे लेते ही मणि चौंक गई और आखें खोलती हुई बोली अरे !!! Mouth organ !! इतने साल हो गए .. इसका क्या करुगी.. भूल भाल गई हूं सब !!

बेटे ने कहा जब बचपन में आप हमे Mouth organ बजा कर सुनाती थीं तो आप खुद ही कहती थीं कि एक बार बजाना आ जाए तो जिंदगी भर नही भूल सकते .. मणि ने भी जानॆ अनजाने Mouth organ होठों से लगा लिया . वही मणि मुझे दिखाने लाई थी और डबडबाई आखें, खुशी … उससे कुछ बोला ही नही जा रहा था.

 

Mouthorgan  photo

Photo by Nina J. G.

मैं हाथ में mouth organ लिए ….उसकी तरफ देख कर सोचे जा रही थी….  बहने दे ये आसूं … .. सच, छोटी छोटी खुशियों में कितना सारा प्यार अपनापन और अहसास छिपा होता है

June 10, 2015 By Monica Gupta

Once upon a time

Once upon a time

एक समय था जब हम Once upon a time कह कर अपनी कहानी की शुरुआत करते थे. चाहे वो परियों की हो या शैतान जादूगर की. आज मैं अपनी बात भी उसी बात से शुरु कर रही हूं पर दुख इस बात का है कि ये काल्पनिक नही हकीकत है…

वक्त नही है … समय बहुत कम है … मेरे पास चंद मिनट ही शेष हैं…आपके पास बस दस सैंकिंड हैं … .बाते बहुत हैं पर क्या करुं समय इजाजत नही दे रहा …!!! ऐसा, लगभग, सभी चैनल्स पर, बहस के दौरान न्यूज एकंर बोलते मिल जाते हैं !!! क्या वाकई और तेज, फटाफट  सुपर फास्ट खबरें …. !!!

सुनते तो हम अकसर है और इन दिनों ब्रेकिंग न्यूज पर देखने को भी मिल रही है. अक्सर तुरंत या जल्दी दिखाने के चक्कर मे चैनल रिपोर्टरों की situation हास्यास्पद हो जाती है. ( दो चार बार खुद भी अनुभव लिया है) ब्रेकिंग न्यूज देने के लिए सबसे आगे हम के चक्कर में बाईट लेने के लिए ऐसे उतावले हो जाते हैं कि धक्का मुक्की या गुस्सैल शब्दावली से भी परहेज नही करते.. !!!

चाहे कोर्ट से निकलते वकील की हो, नेता की हो या अन्य …!!!!और अगर वो पत्रकारों की मारामारी लाईव हो गई तो … !!(जोकि अकसर हो जाती है) ! बस यही मुहं से निकलता है !!! हे भगवान !!!

Once upon a time जब पत्रकार को बहुत सम्मान के साथ देखा जाता था. पत्रकार होना बहुत गर्व की बात होती थी पर आज के संदर्भ मे बात करे तो ….. !!! एक पत्रकार या रिपोर्टर चार चार पांच पांच चैनल की कवरेज कर रहा है. मुद्दा बस खबर देना है. बात की गहराई तक जाना या न जाना उसका सरोकार नही. किसी खबर की कवरेज के लिए जाने पर जनता को एक शकां रहती हैं वो कौन सी राजनीति पार्टी से हैं किसी कार्यक्रम मे मात्र उसे मुख्य अतिथि या सम्मानित इसलिए किया जाता है ताकि अगले दिन उस कार्यक्रम की खबर मुख्य रुप से छ्प सके. ऐसी बात नही है कि अच्छे पत्रकार नही रहे वो बिल्कुल हैं पर अच्छाई पर बुराई इतनी ज्यादा हावी हो चुकी है कि अच्छे भले पत्रकार भी खुद को पत्रकार कहलाने से कतराने लगे हैं. उफ !!!

 

 

press tv channels photo

Photo by NASA Goddard Photo and Video

 

Once upon a time   जब चैनल पर कोई बहस  में आने वाले लोग शालीनता रखते थे और बिना किसी की बात काटे  सभ्य ढंग से बात करते थे पर आज …. !!!

आधे धंटे के बहस ऐसे ही खत्म हो जाती है आमंत्रित मेहमान एक साथ बोलते हैं और कौन क्या क्या बोल रहा है किसी का सुर समझ नही आता इससे भी ज्यादा दुख और हैरानी की बात तब होती है जब एंकर भी किसी व्यक्ति विशेष के पक्षपात में बोलता है और हंसी भी आती है जब आमंत्रित मेहमान एंकर को ही चुप करवा देते हैं कि आप ने ही बोलना है तो हमे किसलिए बुलाया है !!! एक बार तो सुनने मे आया था कि हाथापाई भी हो गई थी( हालाकिं ये मैं नही देख पाई)

कुल मिला कर ये जो भी हो रहा है ठीक नही हो रहा. कम से कम न्यूज एंकर को अपनी भावनाओ पर, अपने हाथ की भंगिमाओं पर विशेष ख्याल रखना होगा अन्यथा वो खबर बनाते बनाते कही खुद ही खबर बन गए तो ???

तभी तो मैं कह रही हूं कि Once upon a time जब सही पत्रकारिता हुई करती थी !!

 

 

June 10, 2015 By Monica Gupta

Oh My God

Oh My God…कई बार हम कुछ ऐसा पढ या देख लेते हैं कि मन से खुद ब खुद Oh My God निकल जाता है. मैने भी दो प्रसंग ऐसे पढे की मन से बस यही आवाज आई Oh My God !!! ऐसा भी होता है … आपके साथ शेयर कर रही हूं !!!
एक आदमी को यह शंका थी कि उसकी पत्नी को अच्छी तरह सुनाई नहीं देता है शायद उसे एक श्रवण यन्त्र यानि Hearing aid की जरूरत हो सकती है इसलिए उसने अपने परिवार के डॉक्टर से सलाह ली. डॉक्टर ने उसे सबसे पहले एक साधारण अनौपचारिक परीक्षण की सलाह दी और बताया कि आप सबसे पहले 40 फीट दूर से फिर 30 फीट फिर 10 फीट दूर से बात करके देखना फिर ही मैं कोई इलाज कर पाऊंगा.

उसी शाम जब पत्नी रसोई मे खाना बना रही थी तो पति सोचा कि चलो आज ही कुछ परीक्षण करता हूं. दूसरे कमरे से उसने आवाज देकर पत्नी से पूछा कि आज क्या बनाया है. कोई जवाब नही मिला फिर थोडा और आगे आकर फिर वही पूछा पर फिर भी जवाब नही मिला. और आगे आया पूछा फिर भी कोई जवाब नही. इसी बीच वो रसोई मे अपनी पत्नी के पीछे खडा होकर पूछने लगा, अजी मैनें पूछा आज खाने मे क्या बना है.

उसकी हैरानी का कोई ठिकाना तब नही रहा जब पत्नी ने कहा “ मैं आपको पांचवीं बार बता रही हूं कि आज मटर पनीर बनाया है”

यानि …. दूसरो की कमी के बजाय अपनी कमी को खोजे.

 

Oh God photo

Photo by mikecogh

 

 

ये वाला प्रसंग पढ कर भी आप Oh My God  कह उठेंगें
कमरे का रहस्य
एक अस्पताल में ICU वार्ड के एक पलंग पर मरीज हमेशा ही मर जाता था, बहुत ही रहस्यपूर्ण बात थी की मरीज की कैसी भी हलात हो, कितनी भी सावधानी रखी जाये पर उसी पलंग पर हर रविवार सुबह 11 बजे ही मौत होती थी .पूरा अस्पताल प्रशासन परेशान कि कही भूत प्रेत का चक्कर तो नही . मेडिकल साइंस मानने को तैयार भी नहीं पर सच भी लगता था कि .आखिर रविवार को 11 बजे ही मौत क्यूँ होती है?
अगले रविवार 11 बजे से कुछ पहले ही अस्पताल का सारा स्टाफ उस वार्ड के बाहर बहुत ही बैचेनी, उत्सुकता, खौफ के साथ प्रतीक्षा करने लगे कि देखेँ आखिर आज क्या होता है,कोई क्रॉस ,कोई धार्मिक पुस्तक तो कोई पवित्र जल लिए आया हुआ था ताकि बुरी आत्मा के साए से बचा जा सके.
जैसे ही 11 बजे उस वार्ड मे साप्ताहिक सफाई कर्मी प्रवेश करता है अन्दर घुसते ही वो उस पलंग के पास जाकर जीवन रक्षक उपकरण बंद करता है और उस बिजली के प्लग मे वेक्यूम क्लीनर का प्लग लगा देता है ..
सभी आश्चर्य चकित हो कर देखते रह जाते हैं ..बहुत ही गहरा रहस्य बेपर्दा हो जाता है
Oh My God… तो बताईए कैसे लगी अगर इससे भी रोचक  और मजेदार आपके पास हैं जरुर शेयर कीजिएगा !!!

 

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