Monica Gupta

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October 6, 2015 By Monica Gupta

नेता जी

नेता जी

बेचारा मरीज…. डेंगू के लिए खून चढवाना है … नेता जी आए हैं रक्तदान करने पर मरीज बिफर गया कि कुछ भी हो जाए भले ही मैं मर जाऊ पर नेता जी का खून नही चढवाऊंगा … बात से पलटना, अंट शंट बोलना ,यू टर्न लेना और अपने कार्य के प्रति ईमानदार नही है ऐसे मे नेता जी का खून अगर उसे चढ गया तो !!! इसलिए ये मरीज मरने को तैयार है पर नेता का खून चढवाने को तैयार नही ….

 

कार्टून नेता जी

कार्टून नेता जी

October 4, 2015 By Monica Gupta

अंधविश्वास और हम

अंधविश्वास और हम

अंधविश्वास और हम – अंधविश्वास के प्रकार अलग अलग हैंं छोटे मोटे अंधविश्वास हो तो कोई ऐसी बात नही पर जहां अंधविश्वास के चलते महिला को डायन करार दे दिया जाता है या बच्चे की हत्या कर दी जाती है ये सरासर गलत है.

अंधविश्वास और हम

एक आंटी फेसबुक पर सारा दिन लगी रहती हैं. कल बहुत उदास सी मिली. पता लगा कि उनकी बेटी को डेंगू हो गया  है वो उदास इसलिए थी कि कल फेसबुक पर उनकी जानकार ने एक देवता की तस्वीर शेयर करने को कहा था कि शेयर करो कृपा बरसेगी पर उन्होने नही की शायद इसलिए बेटी को … !! अरे!! ऐसा नही होता मैने कहा इसी बीच उनके बेटे ने दूसरी लैब से टेस्ट करवाया तो टेस्ट नैगेटिव आया. तब जाकर उनकी जान मे जान आई.

वैसे हम भी कमाल के अंधविश्वासी होते हैं. दादरी के अखलाक की खबर( टाईम्स आफ इंडिया) के मुताबिक कि अखिलेश यादव उनके गांव न जाकर उस परिवार को लखनऊ इसलिए बुलाया कि अंधविश्वास है कि जो सीएम नोएडा का दौरा करता है उसे चुनाव में जीत नही मिलती. अरे !! हार या जीत अपने किए कर्मों से मिलती है ना कि दौरा न करके !!

superstition photo

अंधविश्वास और हम

दीपावली की रात्रि में टोने-टोटके – दीपावली की सफाई

 

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/uttar-pradesh/noida/akhilesh-not-visited-the-bisahada-due-to-noida-jinx/articleshow/49212812.cms

वैसे आपके क्या विचार हैं अंधविश्वास के बारे में …

जरुर बताईएगा…

 

 

October 2, 2015 By Monica Gupta

रक्तदाता और सफलता की कहानी

 

r saini kuk

r saini kuk

 

रक्तदाता और सफलता की कहानी

अगर बात हो निस्वार्थ स्वैच्छिक रक्तदान की तो हरियाणा के राजेन्द्र सैनी का नाम आगे आता है.

हरियाणा के जिला  कुरुक्षेत्र में रक्तदान से सम्बंधित एक कार्यक्रम चल रहा था. स्टेज पर जो भी वक्ता आ रहे थे सभी राजेंद्र सैनी का धन्यवाद और आभार प्रकट कर रहे थे कि आज रक्तदान के क्षेत्र मे रक्तदाता या कैम्प आयोजक या प्रेरक वो जो भी कुछ  है  सब राजेंद सैनी जी  की वजह से हैं.सभी के मुंह से यह बात सुनकर एक उत्सुकता सी बनी हुई थी कि आखिर सैनी जी है कौन  क़िस तरह का काम कर रहे हैं. खैर मीटिंग खत्म हुई और मुझे मौका मिला. सैनी साहब से बात करने का.

न्यू पिंच ने बदल दी दुनिया

1 जून 1962 को पुंडरी मे जन्मे राजेंद्र सैनी आज पूरी तरह से रक्तदान केप्रति समर्पित है. इतना ही नही इनके  परिवार  परिवार म्रे बेटा और बेटी भी रक्तदाता है. मेरे पूछ्ने पर कि रक्तदान के प्रति ऐसी प्रेरणा कब आई तो उन्होने बताया सन 1998 मे रक्तदान मे मीटिंग के दौरान  एक बार उन्होने श्री युद्दबीर सिह ख्यालिया को सुना और रक्तदान के बारे मे उनकी बाते सुनकर उनकी सोच बदली और उन्होने मन ही मन प्रण किया कि वो भी रक्तदान करेंगें. बाकि तो सब ठीक था बस एक ही जरा सी अडचन थी कि उन्हे सूई से डर लगता था. हालाकिं वो बच्चो या बडो को रक्तदान के प्रति जागरुक करते रहते थे कि सूई से जरा भी डर नही लगता पर खुद सूई फोबिया से बाहर नही निकल पा रहे थे.

एक दिन एक कैम्प के दौरान मन बना पर फिर डर गए और सोचा कि किसी लैब मे ही जाकर चुपचाप रक्तदान करके आंऊगा क्योकि अगर यहां  रक्तदान कैम्प मे वो रक्तदान करते समय डर के मारे चिल्ला पडे तो दूसरे लोग उनके बारे मे क्या सोचेगें पर शायद उस दिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था. डाक्टर ने उनकी भावनाओ को समझा और उन्हे बातो मे लगा कर उन्हे लिटाया और  सूई लगा दी. जब रक्तदान करके वो उठे  तो नई स्फूर्ति का उनके अंदर संचार हो रहा था, उस समय का अनुभव बताया कि दर्द तो महज इतना ही हुआ जितना  कोई नई कमीज पहनता है और उसके दोस्त उसे न्यू पिंच बोलते. 

दूसरे शब्दो मे यह न्यू पिंच ही था जिसने एक नई दिशा दी और वो और भी ज्यादा विश्वास से भर कर लोगो को रक्तदान के प्रति जागरुक करने मे जुट गए. तब का दिन है और आज का दिन है. आज सैनी जी 49 बार रक्तदान कर चुके हैं और न्यू पिंच से प्यार हो गया है. उन्होने बताया कि रक्तदान मे अर्धशतक तो लग चुका है पर  बस अब वो  शतक लगना चाहते हैं. उन्होने बताया कि लोगो को प्रेरित करना और वो प्रेरित हुए  लोग  आगे लोगो को प्रेरित करके मुहिम जारी रखे तो एक सकून सा मिलता है. बहुत अच्छा लगता है. जब  एक दीए से दूसरा दीया जगमग करता है तो दिल को खुशी मिलती है जिसका बयान शब्दो मे नही किया जा सकता.

अपनी बिटिया श्वेता के बारे मे उन्होने बताया कि जब उनकी बिटिया पहली बार रक्तदान के लिए गई तो डाक्टर ने बोला कि वजन कम है  वो रक्तदान कर  नही पाएगी. इस पर वो काफी मायूस हो गए पर आधे धटे बाद जब देखा तो वो रक्तदान करके बाहर आ रही थी इस पर जब उन्होने हैरानी जाहिर की तो श्वेता ने बताया कि उसने 5-6 केले खा लिए थे और रक्तदान कर के आई है. उसके चेहरे से जो खुशी झलक  रही थी वो आज भी भुलाए नही भूलती.

मैने जब उनसे पूछा कि कार्यक्रम के दौरान जब सभी उनका नाम ले कर सम्बोधितकर रहे थे तो वो कैसा महसूस कर रहे थे इस पर वो बोले कि खुशी तो हो रही थी एक नया संचार सा शरीर मे भर  रहा था पर दूसरी तरफ अच्छा भी नही लग रहा था. कारण पूछ्ने पर उन्होने बताया कि कही दर्शक यह ना सोचे कि मैंने  ही उन्हे कहा है कि  मेरे बारे मे भी जरुर कहना. उनकी बात सुनकर मै मंद मंदमुस्कुरा उठी क्योकि मैने खुद सुना कि लोग पीठ पीछे भी उनकी तारीफ कर रहेथे. आखिर नेक काम की अच्छाई तो छुपाए नही छिप सकती.

आज रक्तदान के क्षेत्र मे हरियाणा के  राजेंद् सैनी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. पीजीआई रोहतक से उन्हे कैम्प आयोजक रुप मे दो बार सम्मान मिल चुका है और फस्ट एड ट्रैनर यानि प्राथमिक चिकित्सक ट्रैनर  व रक्तदाता के रुप मे वो महा महिम बाबू परमानंद, डाक्टर किदवई और श्री धनिक लाल मंडल से सम्मानित हो चुके है. राजेंद्र सैनी  दिन रात इसी उधेड बुन मे रहते है  कि किस तरहलोगो को जागरुक करे और उन्हे मोटिवेटर बनाए ताकि वो इसका संदेश आगे औरआगे फैलाते रहें. भले ही राजेंद्र सैनी आज 52 साल के हो चुके हैं पर खुद को वो नौजवान ही मानते है उनका कहना है कि रक्तदाता कभी बूढा नही होता वो हमेशा जवान ही बना रहता है.उनकी भाषा मे ‘ तो आप न्यू पिंच कब करवा रहे हैं”  !!!!

हमारी ढेर सारी शुभकामनाएं !!! 

रक्तदाता और सफलता की कहानी

 

October 2, 2015 By Monica Gupta

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस

आईएसबीटीआई ( मोनिका गुप्ता)

 

 

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस की हार्दिक शुभकामनाऎं…

 खुशी का विषय यह है कि आईएसबीटीआई यानि इंडियन सोसाईटी आफ ब्लड ट्रांसफ्यूजनएंड इमयोनोहीमेटोलोजी  ने ही इस दिवस की शुरुआत सन 1976 में की थी.  आईएसबीटीआई पिछ्ले चालीस सालों से रक्तदान से जुडी गैर सरकारी संस्था है और स्वैच्छिक रक्तदान के क्षेत्र  मे अभूतपूर्व कार्य कर रही है. स्वैच्छिक रक्तदान के प्रति पूरी तरह समर्पित आईएसबीटीआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. युद्द्बीर सिह खयालिया एक ही दृष्टि कोण  लेकर चल रहें  हैं  कि जनता में स्वैच्छिक  रक्तदान के प्रति इतनी जागरुकता आ जाए कि सुरक्षित रक्त मरीज की इंतजार करे  ना मरीज रक्त की. डाक्टर ख्यालिया का  मानना है कि इसके लिए शत प्रतिशत स्वैच्छिक रक्तदान की भावना का होना बेहद जरुरी है और ऐसी जागरुकता जन जन मे कैसे लाई जाए. अपने इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए आईएसबीटीआई दिन रात कार्यरत है. इन्ही सब बातों को ध्यान मे रखते हुए  जगह जगह ट्रैंनिग करवाई जाती है. स्कूल कालिजो मे क्विज, पोस्टर बनाना तथा अन्य माध्यमों से जागरुकता लाई जाती  है. भिन्न भिन्न रक्तदान के  खास अवसरो पर जैसाकि विश्व रक्तदान दिवस, स्वैच्छिक रक्तदान दिवस आदि कुछ  खास दिनों में प्रतियोगिताए भी आयोजित करवाई जाती  है.

 रक्तदान से जुडे होने के कारण अक्सर मेरे पास भी रक्त की जरुरत के लिए फोन आते रहते हैं.यथा सम्भव मदद करने की कोशिश तो करती हूं पर जहां तक हमारी पहुंच ही नही है वहां मदद करना या किसी को कहना बहुत मुश्किल हो जाता है. दिल्ली में डाक्टर संगीता पाठक Sangeeta Pathak, सोनू सिह  Sonu Singh Bais , राजेंद्र माहेश्वरी (भीलवाडा, राजस्थान) मंजुल पालीवाल, रोहतक हरियाणा से , मुम्बई से दीपक शुक्ला जी,  ब्लड कनेक्ट की पूरी टीम नई दिल्ली से और चंडीगढ में डाक्टर रवनीत कौर को जब भी मैंने वक्त बेवक्त फोन किया  और रक्त  की जरुरत के बारे मे बताया तो उन्होनें तुरंत एक्शन लिया और एक ही बात कही कि चिंता नही करो आप उन्हे मेरा नम्बर दे दो. कोई फिक्र नही. परेशानी मे पडे एक अंजान के लिए ऐसी बात कहना बहुत बडी बात है. मैं उनका अक्सर खुले लफ्जों में और कई बार दिल ही दिल मॆ बहुत धन्यवाद करती हूं और फिर विचार आता है कि क्यों ना ऐसे शानदार और समर्पित व्यक्तित्व पूरे देश भर में हो. हमारे पास देश भर में कही से भी फोन आए. हम किसी को रक्त की कमी से न मरने दे.

अगर डाक्टर या ब्लड बैंक से जुडे लोग हों तो बहुत बेहतर है या फिर कोई ऐसे जो स्वैच्छिक रक्तदान से जुडे हों और समाज के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ करना चाहते हों. उनका स्वागत है. यह बात पक्की है कि आपके सहयोग के बिना यह कार्य सम्भव नही है और यह बात भी पक्की है कि इस लक्ष्य को हम जीत सकते हैं. अगर आप ऐसे किसी भी व्यक्ति को जानते हैं या आप खुद ही हैं तो नेक काम मे आगें आए. अपना नाम और पता monica.isbti [at]gmail.com पर भेज दीजिए….. !!!!

आईएसबीटीआई ( मोनिका गुप्ता)

ISBTI monica gupta 1

October 2, 2015 By Monica Gupta

हम और हमारा भोजन

हम और हमारा भोजन

 

तीन छुट्टियां क्या आई घर परिवार में रौनक सी आ गई. मेरी एक सहेली भी बहुत व्यस्त है कल से पकवान बनाने में. एक तो श्राद और दूसरा उसका बेटा आ रहा था दो दिन के लिए. आलू, गोभी, पूरी हलवा, पाव भाजी, छोले भठूरे, खीर, दही भल्ले क्या क्या नही बनाया उसने !!! पर उसकी खुशियों पर तब  पानी फिर गया जब बेटे के कहा कि वो ये कुछ भी नही खाएगा.

असल में, दो साल से बाहर रह रहा है और लाईफ स्टाईल बिल्कुल बदल गया है. अब तली भुनी चीजो की बजाय हैल्दी फूड और जिम पर पूरा ध्यान केंद्रित है उसका.

वैसे देखा जाए तो समय वाकई बदल गया है. एक समय था जब खीर पूरी हलवा रसोईघर की शान होती थी पर आज मेरी जानकारी में जितने घर हैं ज्यादातर घरों में आयुर्वेदिक सामान जैसे आवलां जूस, एलोवीरा जूस, त्रिफला पाउडर, इसबगोल, ओटस, ब्रेन, वाईट ओट, मूसली, ब्राउन राइस, ब्राउन ब्रेड, होल ग्रेन और ढेरों फल  ही देखने को मिलती हैं और ये अच्छा भी है आखिर बुराई क्या है इसमें … !!!

our food  photo

Photo by Tatters ❀

सेहत की सेहत और नो साईड इफेक्ट !! मैं लिख ही रही थी कि अचानक मणि आई और मेरे पीछे खडी हो गई वो मेरे लिए मूंग की दाल का हलवा लाई थी.. अरे!! अब लग रहा है वाकई अपवाद भी हैं इस क्षेत्र में … कुछ लोग ऐसे हैं जो कंट्रोल ही नही कर पाते और मैं खाने मे जुट गई.

हम और हमारा भोजन

 

September 30, 2015 By Monica Gupta

मन की उलझन

मन की उलझन

कुछ  देर पहले मार्किट में एक जानकार मिली. वो अपनी बिटिया के साथ शापिंग करने आई हुई थी. उसकी शादी को साल भर ही हुआ होगा. वो बिटिया मेरे पास आई और बोली कि आपसे बात करनी है. मेरे कहने पर कि बताओ इस पर वो बोली कि अकेले मे … शाम को घर आएगी पर मम्मी को बिना बताए. टेंशन तो मुझे भी हुई कि कोई न कोई गम्भीर बात है. जरुर दहेज आदि का ही मामला होगा पर मम्मी के सामने नही बोला यानि कुछ और ही बात है.

ठीक चार बजे वो घर आई. उसने कहा कि आप मम्मी को समझाईए वो बहुत फोन करती हैं मुझे. एक दिन मे कम से कम पाचं सात बार… क्या कर रही हो ? आज क्या खाया? कौन सी साडी पहनी? दहेज खूब दिया है ठाठ से रह.. किसी की मत सुनियो और घर का काम करने की जरुरत नही. रानी की तरह रह… वो बोलती ही जा रही थी कि वो अपने नए परिवार के साथ मिलजुल कर रहना चाह्ती है पर मम्मी की बात सुन कर उनकी बातों में आने का डर लगा रहता है. अब आप ही मम्मी को समझाईए कि दखल न दें उसे अपने हिसाब से घर चलाने दें…

मैं उसकी बात से सहमत हूं. कई बार माओं के ज्यादा प्यार के चक्कर में बसा बसाया घर बिखर भी जाता है पर मुझे खुशी इस बात की है कि बिटिया समझदार है. वो सही गलत जानती है. बिटिया तो चली गई और सोच रही हूं कि उसकी मम्मी को समझाना भी एक अभियान है या तो उसकी मम्मी से सीधी बात करुं या कि सीधी बात न करके किसी दूसरे का उदाहरण देकर उसे समझाऊं या फिर उसकी बिटिया ही मां को समझाए  हो सकता है उसने समझाया होगा पर बात नही बनी होगी… वैसे क्या आप आईडिया दे सकते है ???

मन की उलझन tension photo

 

 

 

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