Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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July 15, 2015 By Monica Gupta

आपका बहुत बहुत धन्यवाद

thanks photo

Photo by opensourceway

 

आपका बहुत बहुत धन्यवाद

कुछ समय पहले की बात है कि एक महिला को अपनी नन्ही बच्ची के लिए खून की जरुरत थी.वो खून का ग्रुप जल्दी से उपलब्ध नही होता था यानि रेयर ग्रुप था. मेरी सहेली मणि ने उन्हे ना जानते या पहचानते इंसानियत के नाते बहुत दौड धूप की और उस रक्त का इंतजाम करवा दिया. आप्रेशन सफल रहा. कुछ समय बाद वह् लडकी आईसीयू से बाहर भी आ गई और कुछ समय बाद वो ठीक होकर अपने घर भी चली गई.

इसी बीच मणि ने  एक दो बार बच्ची का हाल चाल पूछ्ने के लिए इस महिला को फोन भी किया. पर हैरानी ही बात यह रही कि महिला ने एक बार भी उसका धन्यवाद नही किया. वैसे तो उसे उम्मीद ही नही रखनी चाहिए थी क्योकि मेजर आप्रेशन था और उस महिला को मानसिक परेशानी भी बहुत रही होगी उस समय. पर जब बच्ची भी ठीक होकर घर आ गई तो भी उसने एक बार भी फोन करके मणि का धन्यवाद नही किया. इस बात से मणि का मनोबल बहुत गिरा पर क्योकि उसका ये किसी की मदद करने का यह उसका पहला मौका था.

पर फिर मेरे समझाने पर वो फिर अपने नेकी के काम मे दुबारा से जुट गई पर उसके जाने के बाद मैं जरुर सोचने लगी कि हम अक्सर कहते रहते है कि हमे दूसरो की मदद करनी चाहिए या जब किसी को जरुरत पडे उसकी सेवा निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए पर इसके साथ साथ जिन लोगो को मदद मिलती है या जिन लोगो का ऐसे प्रोत्साहन से मनोबल दुगुना होता हो उन्हे भी इस बात का ध्यान रखना चहिए कि जो लोग उनके लिए आगे आए है समय निकाला है या उन्हे कुछ समय दिया है.

उनका दिल से “धन्यवाद” या “आभार” जताना बहुत जरुरी है उसे बिल्कुल नही भूलना चाहिए … तो अगर आप किसी का धन्यवाद करना भूल गए है तो प्लीज और देर मत कीजिए!!! यकीनन जितनी आपको खुशी मिली है उससे भी दुगुनी उन्हे मिलेगी आप एक बार धन्यवाद कर के तो देखिए !!!

July 14, 2015 By Monica Gupta

कहानी फिल्मी नहीं

watching movie photo

Photo by NASA Goddard Photo and Video

 

कहानी फिल्मी नहीं

कुछ देर पहले मेरी एक सहेली का फोन आया. बहुत शोर भी आ रहा था. मैने पूछा कि शोर कैसा ?? इस पर वो बोली कि असल में, हम बाहुबली फिल्म देखने आए हुए है. और फिल्म शुरु हो चुकी है. बस बताने के लिए किया था फोन. मेरे ओह बोलने पर वो अचानक बोली अच्छा एक और फोन भी आ रहा है. जब मैने उसे किया तब बिजी था और बाय बोल कर फोन रख दिया.

मेरे चेहरे पर स्माईल थी क्योकि मैं उसकी इस दिखावे की आदत से बहुत परिचित हूं पर गुस्सा इस बात का भी आ रहा था कि फिल्म में उसके आगे पीछे बैठे लोग भी कितना डिस्टर्ब हो रहे होंगें.. अरे भई फिल्म देखने आए हो चुपचाप देखो और अगर बताना ही है तो इंंटरवल में बता दो ताकि दूसरों को असुविधा तो न हो … वैसे आप तो ऐसे हरगिज नही होंगें अगर हैं तो जरा नही बहुत सोचने की दरकार है…

कहानी फिल्मी नहीं

July 14, 2015 By Monica Gupta

हमारे मित्र

हमारे मित्र

rain photo

हमारे मित्र

गर्मी के साथ बरसात  आई नही कि हमारे परम मित्रो का आगमन और चहल पहल शुरु हो जाती है.कही मेढक फुदकता मिल जाएगा तो कही कोकरोच अपना ही घर समझ कर इठलाता अकड के चलता मिल जाएगा.छिपकली और चूहो का तो पूछो ही मत.सब अपना ही घर समझ कर डेरा जमाए बैठ जाते हैं वो इसलिए की वाकई मे ये हमारे ना सिर्फ दोस्त है बल्कि हमारी सेहत का भी बहुत ख्याल रखते हैं. हमे चुस्त दुरुस्त बनाए रखते हैं.

कल्पना करे कि अचानक पलंग के नीचे से चूहा भागता हुआ आया और मेज के नीचे जाकर छुप गया. अब उसे देख कर ना सिर्फ हम भी भागते है बल्कि कूदी मार कर कुर्सी पर भी चढ जाते है तो देखा बनाया ना उसने हमे चुस्त दुरुस्त. अब कोकरोच की बात करे. वो हमे देख कर भागे या ना भागे पर हम उसे देख कर चिल्लाते बहुत तेज हैं और हमारी सांस तेज तेज चलने लगती है यानि हमारी आवाज तार सप्तक तक चली जाती है और दबी दबी सी हमारी आवाज अचानक खुल जाती है साथ ही साथ हमारे फेफडे भी मजबूत हो जाते हैं.तो हुआ ना वो भी हमारा परम हितैषी!!

अब लाल काली प्याली प्याली चींटियो की बात करें तो मैडम जी अक्सर रसोई मे चीनी और मिठाई पर कब्जा किए मिल जाती हैं तो वो भी फायदेमंद हैं. अब देखिए ना ऐसे मे क्या होता है कि अक्सर चीनी हम फेक देते हैं यानि शूगर हम नही खाएगे तो भी शरीर सही रहेगा और अगर हम उसे ना फेंके और बजाय फेंकने के साफ करने लगे तो भी हमारी आखो का अच्छा व्यायाम हो जाता है हम जान जाते है कि हमारी आखे कितना बारीक देख सकती हैं और साथ मे अगुलियो की भी कसरत हो जाती है.तो रखती है ना ये हमारा खयाल.

अब बात आती है सर्वप्रिय मक्खी रानी की.जब भी उडाओ तभी आ जाती है. जब भी उडाओ तभी आ जाती है. वो इसलिए आती है कि हमारे हाथो की कसरत हो सके नही तो उसे कोई शौक नही होता हमे तंग करने का. कोई दुश्मनी थोडे ही ना है उसे हमसे. वो तो बस हमारी ही सेहत का ख्याल रख कर ऐसा करती है.वो ज्यादा ना आए इस चक्कर मे हम सफाई भी रखते है तो देखा कितना ख्याल है उसे हमारा और हम भी ना !!!

वही गुनगुन करते मच्छर भी हमारे अच्छे दोस्त साबित होते हैं. अब अंधेरा होते ही बल्ब आदि के आसपास मच्छरो का जमावडा लग जाता है तो क्या हुआ. अच्छा ही है ना अजी इनके डर से मेहमान ही नही आते. रात को मेहमान भी घर आने से पहले दस बार सोचते है कि इनके घर तो बहुत मच्छर हैं क्या करेगे जाकर. तो वो तो फायदेमंद है ही बाकि अक्सर मच्छर जाने अंजाने हमे ताली बजाने पर मजबूर कर देते हैं भले ही ताली बजाने से वो मरे या ना मरे पर ताली बजाने के फायदे तो हम सभी जानते है कि रक्त संचार बढता है.तो देखा !! हुए ना वो अच्छे दोस्त !!

अब बात आती है मधुमक्खियो और ततैयो की जोकि घर मे लगे फूलो पर आकर्षित होकर आ ही जाते हैं और कई बार काट भी जाते हैं तो भी कोई बात नही. ऐसे मे पडोसी हमारी चिल्लाने की आवाज सुन कर आ जाते है और जरा वो सूजन कम करने के लिए अचार भी लगा देतें हैं बस उसकी महक इतनी अच्छी होती है कि हम उस अचार की तारीफ करते हैं और पडोसन भी खुश होकर एक कटोरी अचार उपहार स्वरुप दे जाती है कि कुछ दिन पहले ही डाला था.और बस ऐसे ही दोस्ती पक्की होती जाती है और उनसे लगातार मिलकर अपने परिवार और रिश्तेदारो की भडास और गुस्सा उससे शेयर करने लगते है और आपका ब्लड प्रेशर भी सही रहता है.

अरे वाह !! आप तो मेरी बात सुन कर ताली क्यो बजा रहे हैं. धन्यवाद!! धन्यवाद !! आपको मेरा लेख अच्छा लगा! क्या? आप मच्छर मार रहे है और आपको गुस्सा भी बहुत आ रहा है !!! जी मै समझ गई. मै चलती हू. पर आप माने या ना माने पर ये कीट पंतग़े है हमारे मित्र ही!!!

तो कैसे हैं आपके मित्र 🙂 जरुर बताईएगा !!!

July 13, 2015 By Monica Gupta

एलपीजी पर सब्सिडी

LPG by monic a gupta

 

एलपीजी पर सब्सिडी

लगभग हर रोज करीब चार हजार लोग छूट आधारित शाकाहारी तथा मांसाहारी भोजन का लुत्फ उठाते हैं। संसद की कैंटीन में तडक़ा मछली 25 रुपये में, सब्जियां 5 रुपये में, मटन करी 20 रुपये और मसाला डोसा 6 रुपये में मिलता है। सांसदों को ये इतनी सस्ती इसलिए मिलती हैं, क्योंकि इनके वास्तविक लागत मूल्य पर सब्सिडी सरकारी खजाने से दी जाती है

 

 

  | 4 PM | LATEST HINDI NEWS

प्रमोद भार्गव बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के आमंत्रण पर 1916 में महात्मा गांधी ने उसके समारोह में भागीदारी की थी। समारोह के मुख्य अतिथि वायसराय थे। वायसराय के उद्बोधन के बाद महात्मा गांधी को बोलना था। वे बोले, जिस देश की ज्यादातर आबादी की तीन पैसा भी रोजाना आमदनी नहीं है, किंतु वहीं देश के वायसराय पर रोजाना तीन हजार रुपये खर्च होते हैं। समाज में ऐसे लोगों का जीवित रहना बोझ है। अगर आज गांधी जी होते और जनता के धन से भोजन का स्वाद चख रहे सांसदों की उन्हें आरटीआई से सामने आई जानकारी मिलती तो क्या सांसदों को गांधी यही र्शाप नहीं देते? एक तरफ देश के जन प्रतिनिधियों पर रोजाना करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, उन्हें अनेक प्रकार की अन्य सुविधाएं नि:शुल्क दी जा रही हैं, बावजूद जनप्रतिनिधि हैं कि खुद तो ब्सिडीस का भोजन उड़ा रहे हैं, परंतु जो वास्तव में गरीब हैं, भूख की गिरफ्त में हैं, उनकी न तो गरीबी रेखा तय की जा रही है और न ही खाद्य सुरक्षा? सरकार संसद की रसोई से परोसी जाने वाली थाली में दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करती दिखाई नहीं देती? सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी सामने आने पर पता चला है कि हमारे माननीय सांसद गरीब के हिस्से का भोजन करके डकार लेने को भी तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि उन्हें न तो आहारजन्य विसंगतियों का आभास होता है और न ही अनाज के उत्पादक किसान की आत्महात्या से पीड़ा होती है? क्योंकि उन्हें तो सब्सिडी के भोजन से पेट भरने की छूट मिली हुई है। वह भी गुणवत्तायुक्त स्वादिष्ठ भोजन की। बावजूद खाद्य मामलों की समिति के अध्यक्ष व टीआरएस सांसद जितेंद्र रेड्डी का कहना है कि यह सब्सिडी बंद की गई तो किसी के पेट पर लात मारने जैसी घटना होगी। सांसदों और संसद में काम करने वाले अधिकारी व कर्मचारियों को बेहद सस्ती दरों पर भोजन दिया जा रहा है। रोजाना करीब चार हजार लोग छूट आधारित शाकाहारी व मांसाहारी भोजन का लुत्फ उठाते हैं। संसद की कैंटीन में तडक़ा मछली 25 रुपये में, मटन कटलेट 18 रुपये में, सब्जियां 5 रुपये में, मटन करी 20 रुपये और मसाला डोसा 6 रुपये में मिलता है।

सांसदों को ये खाद्य सामग्रियां इतनी सस्ती इसलिए मिलती हैं, क्योंकि इनके वास्तविक लागत मूल्य पर क्रमश: 63 फीसदी, 65 फीसदी, 83 फीसदी, 67 फीसदी और 75 फीसदी सब्सिडी सरकारी खजाने से दी जाती है। पूड़ी-सब्जी पर तो यह सब्सिडी 88 फीसदी है। हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि अधिकतम गुणवत्ता के मानकों का पालन करके तैयार होने वाला यह आहार इतनी सस्ती दरों पर मामूली से मामूली ढाबे पर भी मिलना मुश्किल है? स्वयं सरकार द्वारा ही दी गई जानकारी से पता चला है कि मांसाहारी व्यंजनों के लिए कच्ची खाद्य वस्तुएं 99.05 रुपये में खरीदते हैं और माननीय सांसदों को 33 रुपये में परोसते हैं।

पापड़ की दर पर भी छूट दी जाती है। बाजार से पापड़ 1.98 रुपये प्रति नग की दर से खरीदा जाता है और एक रुपये में संसद में बेचा जाता है। यानी 98 प्रतिशत सब्सिडी पापड़ के प्रति नग पर दी जा रही है। कैंटीन में रोटी एकमात्र ऐसा व्यंजन है, जो लाभ जोडक़र बेची जाती है। प्रति रोटी लगत खर्च 77 पैसे आता है, जबकि इसे एक रुपये प्रति नग की दर से बेचा जाता है। हालांकि सस्ते से सस्ते ढाबे पर भी रोटी की कीमत 2 रुपये से लेकर 5 रुपये तक है। संसद की रसोई की ये दरें खाद्य समिति ने 20 दिसंबर, 2010 को लागू की थी, तब से लेकर अब तक इन दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। जबकि सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ती महंगाई के अनुपात में निरंतर बढ़ते रहे हैं।

वर्तमान में सांसद को प्रतिमाह लगभग एक लाख, 40 हजार रुपये मिलते हैं। इसलिए सांसद और संसद के अधिकारी व कर्मचारियों को सब्सिडी आधारित भोजन की व्यवस्था बंद करने की जरूरत है, लेकिन माननीयों के मुंह से निवाला छीनने की हिम्मत कौन जुटाए? बीते पांच सालों में सांसद 60 करोड़ 60 लाख सब्सिडी आधारित भोजन का आनंद ले चुके हैं। 2009-10 में यह छूट 10.04 करोड़ रुपये थी, तो 2010-11 में 11.07 करोड़ रुपये थी और 2013-14 में बढक़र 14 करोड़ रुपये हो गई। यह छूट 76 प्रकार के व्यंजनों पर दी जाती है। इस छूट का प्रतिशत 63 से लेकर 150 प्रतिशत तक है।

बीते पांच सालों में सांसद 60 करोड़ 60 लाख सब्सिडी आधारित भोजन का आनंद ले चुके हैं। 2009-10 में यह छूट 10.04 करोड़ रुपये थी, तो 2010-11 में 11.07 करोड़ रुपये थी और 2013-14 में बढक़र 14 करोड़ रुपये हो गई। यह छूट 76 प्रकार के व्यंजनों पर दी जाती है। इस छूट का प्रतिशत 63 से लेकर 150 प्रतिशत तक है। Via 4pm.co.in

एलपीजी पर सब्सिडी किसलिए ??? आम आदमी ही क्यों ??

 

July 13, 2015 By Monica Gupta

मैं तीस हजारी से बोल रही हूं

मैं तीस हजारी से बोल रही हूं

आज मणि बहुत घबराई हुई घर आई और बोली कि वो जेल जाएगी. वो जेल जाएगी … !!! मैने उसे आराम से बैठाया और सारी बात पूछी क्योकि जितना मै मणि को जानती हूं वो और जेल !!! असम्भव !! पर हुआ क्या!!! मैंने उसे पानी का गिलास पकडाया. गिलास हाथ मे लिए लिए  उसने घबराई हुई आवाज मे बताया कि उसके पास एक महिला का फोन आया. वो दिल्ली तीस हजारी कोर्ट से बोल रही थी. उसने नाम पूछ कर कहा कि आपके नाम से केस रजिस्टर हुआ है. क्या आपको नोटिस मिला ? मणि की तो वही सासं फूल गई. उसे कुछ समझ नही आ रहा था. उसने फोन काट दिया और मेरे पास दौडी चली आई. मैने उसे संयत करके बैठाया और विश्वास दिलाया कि ऐसा कुछ नही होगा क्योकि जब उसने कुछ किया ही नही तो !!! जब उसी नम्बर पर दुबारा फोन किया तो नही मिला. मैने यही कहा कि किसी ने मजाक किया है.

तभी उसी नम्बर से फोन आ गया. मैने बात करके पूछा तो उस महिला ने बताया कि हाई कोर्ट के सरकारी वकील है वो आपको सारी हिस्ट्री बताएगे और उसने उनका नम्बर तो दिया ही साथ मे मणि की केस फाईल नम्बर भी दे दिया. मै हैरान !! उस नम्बर पर फोन किया तो कोई आदमी बोल रहा था. इसने बताया कि पिछ्ले साल आपका आईडिया का नम्बर था उसका भुगतान नही किया इसलिए उन्होने केस दर्ज करवाया है. या तो पैसे जमा करवा दो या केस तो डल ही चुका है. मैने यह कह कर फोन रख दिया कि बाद मे बात करती हूं. फिर मणि से पूछ कि कभी किसी मोबाईल का बकाया था. इस पर वो याद करती हुई बोली कि एक बार एक नम्बर का प्लान बदलवाया था पर आईडिया वालो ने बदला की नही लगभग दो महीने तक वो लगातार फोन करके कहती रही पर बिल पहले वाले प्लान का लग कर आता रहा.इस चक्कर मे तंग आकर उसने दूसरा नम्बर ले लिया.

उसके बाद आईडिया से तो तीन बार भुगतान के लिए फोन आए पर उसने कहा कि गलती उनकी है कि प्लान बदला क्यो नही और हमे भी इतनी दिक्कत दी है इसलिए आपकी ही गलती है हम पैसे नही देंगे और उसके बाद कोई फोन नही आया. और आज आया तो !!! वो बता ही रही थी कि इतने मे उसी महिला का दुबारा फोन आया कि आपकी बात हो गई क्या उनसे. और मेरी हैरानी की सीमा नही जब वो महिला अपशब्द बोलने लगी. मै हक्की बक्की रह गई. ये क्या तरीका हुआ. बहुत बुरा लगा. दुख इस बात का हुआ कि मणि के पास कोई इमेल या कार्यवाही नही थी जिसका सबूत वो दिखा सकती कि आईडिया वालो ने कितना तंग किया था. खैर, दो तीन वकीलो और न्यायाधीश मित्र से बात की तो उन्होने बताया कि ऐसा बहुत हो रहा है और ये लोग बहुत गंदी भाषा का इस्तेमाल करते हैं. इस बारे मे जब दो चार लोगो ने आईडिया मे बात की तो वो तुरंत माफी मांग ली कि क्या करे जी.!!!

खैर, मणि अपने दो हजार रुपए तो अगले दिन ही जमा करवा दिए पर उस महिला के खिलाफ केस करने का मन भी बना रही है जिसने इतने अपशब्द बोले!
वाह रे आईडिया वालो …. वट एन आईडिया !!! वैसे ये अक्टूबर 2012 की बात है पर याद इतनी ताजा है मानो कल की ही बात हो …

मैं तीस हजारी से बोल रही हूं

jail photoमैं तीस हजारी से बोल रही हूं

July 10, 2015 By Monica Gupta

Benefits of Eating with Hands

Benefits of Eating with Hands

Benefits of Eating with Hands

अक्सर शादी या अन्य समारोह में भीड बहुत होती है और उसका फायदा मिल जाता है.Benefits of Eating with Hands फायदा इस बात का मिलता है कि स्टाल वाली कुछ चीजों को हाथ से खाया जा सकता है मसलन, टिक्की … गरमागरम टिक्की, करारी सीधा तवे से उतरी हुई खाने का अपना ही मजा है इसकी दो वजह है एक तो टिक्की के साथ जो चमच्च मिलता है वो प्लास्टिक का होता है न जाने कब टूट जाए और दूसरा हाथ से खाएगें तो कितना गरम है अंदाजा लग जाएगा और मुंह नही जलेगा… अब इसके लिए जरुरी है भीड … ताकि सब अपने में मस्त हो और हम भी हाथ से खाने में पूरा एंजाय करें..

वैसे दक्षिण में तो ज्यादातर हाथ से ही खाया जाता है पर हमें अपने आस पास का माहौल देख कर हाथ से खाने का मन बनाना चाहिए अन्यथा हंसी के पात्र बनने में भी देर नही लगती.

 

Benefits of Eating with Hands

वैसे हाथों में है प्राण ऊर्जा- आयुर्वेद के अनुसार हमारे हाथों प्राणाधार एनर्जी होती है। इसका कारण है कि हम सब पांच तत्वों से बने हैं, जिन्हे जीवन ऊर्जा भी कहते हैं। ये पांचों तत्व हमारे हाथ में मौजूद हैं। हमारे हाथों का अंगूठा अग्नि का प्रतीक है। तर्जनी उंगली हवा की प्रतीक है। मध्यमा उंगली आकाश की प्रतीक है। अनामिका उंगली पृथ्वी की प्रतीक है और सबसे छोटी उंगली जल की प्रतीक है। इनमे से किसी भी एक तत्व का असंतुलन बीमारी का कारण बन सकता है।

जब हम हाथ से खाना खाते हैं तो हम उंगलियों और अंगूठे को मिलाकर खाना खाते हैं और इससे जो हस्त मुद्रा बनती है। उसमें शरीर को निरोग रखने की क्षमता होती है। इसलिए जब हम खाना खाते हैं तो इन सारे तत्वों को एक जुट करते हैं जिससे भोजन ज्यादा ऊर्जादायक बन जाता है और यह स्वास्थ्यप्रद बनकर हमारे प्राणाधार की एनर्जी को संतुलित रखता है

हाथ से खाने से ना सिर्फ एकाग्रता बढती है बल्कि पाचन भी सुपाच्य होता है.

और इसी के साथ साथ बचपन में जब हम बीमार पड जाते थे तो मम्मी अपने हाथ से खाना खिलाती थी और अगर और बचपन में जाए तो नानी दादी भी बच्चों के पीछे दौड दौड कर दाल चावल खिलाती थी … ये जो स्पर्श का अनुभव है ना … ये बहुत कामगर सिद्द होता है इससे आपसी प्रेम भी बढता है… कुछ दिन पहले मैं अपनी सहेली से बात कर रही थी  तो उसने बताया कि सबसे ज्यादा मजा करवा चौथ पर आता है जब हाथ मे मेहंदी लगा रखे होती है और पति अपने हाथों से खाना खिलाते है…

वैसे जैसे नियम कांटे छुरी से खाने के हैं इसके भी कुछ नियम होते हैं जैसे कि  सब्ज़ी खाते समय उसकी तरी को पूरी उंगलियों में नहीं लिपटने देना चाहिए और केवल उंगलितयों के पोरो का इस्तेमाल होना चाहिए ना कि पूरी की पूरी उउंगली तरी मे डूब जाए फिर यहां वहां लोगों को भी असुविधा हो…   खाते वक्त चपचप की आवाज भी न हो तो बेहतर है. इसके अलावा खाने के बाद भी हाथ धोने के लिए आमतौर पर प्रत्येक व्यक्ति को उंगलियां धोने  के लिए एक कटोरा  जिसमें गुनगुने पानी और कटा हुआ नींबू होता है दिया जाना चाहिए.

lady eating with hands photo

Photo by tanitta

बेशक हमें हाथ से खाते हुए शर्म आती हो पर बहुत विदेशी हमारे देश में आकर हाथ से खाना खाने मे गर्व महसूस करते हैं…

benefits of eating with hands hindi

हाथ (hands) से खाना खाना असल में भारत (India) में जितना कॉमन है उतना किसी और देश में नहीं है पश्चिम में लोग खाना खाने के लिए छुरी और कांटे का इस्तेमाल करते है कई जगह इसे भोजन सम्बन्धी शिष्टाचार से जोड़कर भी देखा जाता है और कुछ लोग मानते है कि हाथ से भोजन (eating with hands) करना सुरक्षित नहीं है लेकिन फिर भी कुछ भी कुछ जानकार ये मानते है कि हाथ से खाना खाने (eating with hands) का एक अलग ही मजा होता है और यह किसी भी छुरी या कांटे या किसी भी अन्य औजार से खाने में नहीं है साथ ही हाथ से खाना खाना स्वास्थ्यवर्धक (health beneficial) तो होता ही है और इसके कुछ और भावनात्मक पहलु भी है जिनपर हम थोडा गौर करते है | तो चलिए इस बारे में थोड़ी और बात करते है –

हाथ से खाने के स्वस्थ्य लाभ / benefits of eating with hands – पिछले कुछ दिनों में अमरीका के एक राज्य में कुछ लोगो के समूह ने छुरी और कांटे को छोड़कर हाथ से खाने की इच्छा जताई और इसके पीछे कई कारन है जिनमे से एक है कुछ जानकर मानते है कि हाथ से खाना खाते समय जो हाथ की अंगुलियाँ और अंगूठे की मुद्रा बनती है वो विशेष होती है और उसमे हमारे शरीर को स्वस्थ (healthy) रखने की क्षमता होती है वन्ही कुछ लोग यह भी मानते है कि जिस तरह हमारा शरीर पांच तत्वों (five elements) का बना होता है उसी तरह हमारे हाथ की पांच उंगलिया भी इसी तरह उन पांचो तत्वों की प्रतीक है इसलिए हाथ से खाना खाते (eating with hands) समय हम उन पांचो तत्वों को रोटी का कौर बनाते समय एकजुट करते है और इस से भोजन उर्जादायक बन जाता है और खाने में अतिरिक्त स्वाद भी आता है | Read more…

Benefits of Eating with Hands जो भी हो हाथ से खाने का अपना ही मजा है एक अलग  ही तरह की संतुष्टि मिलती है … तो शुरुआत हो जाए दाल चावल से … एक मेरी सहेली बता रही थी कि चाय को भी सुडप करने यानि आवाज करके पीने मे अलग ही मजा है … नही … ये नही … अभी इतना ही काफी है  😆

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