Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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June 17, 2015 By Monica Gupta

नाजुक हैं आदमी

नाजुक हैं आदमी …

सुन कर आप सोच रहे होगे कि भला आदमी और नाजुक … हो ही नही सकते … लेकिन यह बात काफी हद तक सही है हालांकि अपवाद तो हर जगह होते हैं.

 

man emotional  photo

 

असल में, आदमी खुद दिखाते नही हैं .. जैसाकि हम महिलाएं  करती हैं  कि तुरंत रोना शुरु कर देती हैं लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज्यादातर आदमियो का दिल एक दम मोम की तरह होता है पर वो मजबूत हैं बस यह दिखाने की कला उन्हें आती है.

अभी कुछ दिन पहले मेरी सहेली अपने बच्चे को स्टेशन छोडने आई तो उसने बताया कि इसके पापा इसे छोडने कभी नही आते वो तो इसे बाय भी नही बोल सकते. इसके एक दिन जाने से पहले ही वो उदास हो जाते हैं. पापा को देख कर बेटा भी उदास हो जाता है इसलिए उसे ही हमेशा मन पक्का करके छोडने आना पडता है.

एक हमारे पडोसी हैं जब से उनकी बेटी की शादी हुई है तब से वो चुप से हो गए हैं.  बेटी जब भी मिलने घर आती है वो उससे गले लग कर खूब रोते हैं. अब जब उसके भी बेटी हो गई है उनके वापिस जाने के बाद वो अकेले बैठ कर खूब रोते हैं फ़िर  हार कर उनकी पत्नी को मन मजबूत करके उन्हे चुप करवाना पडता है.
एक मित्र तो और भी कमाल है. उनकी लडकी 25 साल की हो गई है. जब भी उसके लिए कोई रिश्ता आता है तो वो किसी छोटे बच्चे की तरह रोने लग जाते हैं.  दीपक जब से पेपर मे प्रथम आया और उनके घर जब भी बधाई का फोन आता उसके पापा भावुक हो उठते.
मोहन जी की पत्नी जब तक अस्पताल  मे थी वो उनसे मिलने नही गए क्योकि वो उन्हे बीमार नही देख सकते थे.  वो अपना ही दिल पकड कर बैठ गए कि उन्हें ही कही कुछ ना हो जाए ..
ऐसे ना जाने कितने उदाहरण है इस बारे मे … जिससे बस एक ही बात सामने आती है कि आदमी भी नरम दिल के इंसान होते हैं बस वो दिखाते नही है अपने दिल मे ही रखते हैं यह बात आपको भी पता होगी … है ना … तो अगर आप किसी को पत्थर दिल आदमी बोले तो बोलने से पहले सोच लें क्योकि नाजुक हैं आदमी… !!!

June 17, 2015 By Monica Gupta

बाल कहानी अहसास

 

 writing on paper photo

बाल कहानी अहसास

प्रिय मम्मी,

मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपको क्या और कैसे लिखूं पर मुझे माफ कर दो। मेरी उन गलतियों की जोकि मैंने की और आपको तंग किया। आप आज अस्पताल में मेरी ही वजह से हैं, लेकिन सच मानो, मेरा न तो कोर्इ गन्दा दोस्त है और न ही मैं इंटरनेट या टी.वी. देखकर बिगड़ा हूं। मुझे खुद भी नहीं पता कि मैं ऐसा क्यों हो रहा हूं। वैसे तो मैंने बहुत गलतियां की हैं पर कुछ एक के लिए मैं ………………!आपको याद होगा कि एक दिन आपने मुझसे बार-बार पूछा था कि चुप-चुप क्यों हूं। असल में मैंने जानबूझ कर अनिल को बाल मारी थी। उसे आँख के नीचे सात टांके लगे थे। नोटिस मिला कि आपको बुलाया है तो मैंने झूठ-मूठ अपनी तरफ से ही लिख दिया कि मैं बीमार हूं इसलिए आ नहीं सकती। आपके सार्इन भी कर दिए थे। झूठ के हस्ताक्षर किये थे ना इसलिए डर रहा था कि सच्चार्इ पता लगेगी तो मैं फँस ही ना जाऊँ। एक बार जब आपने मेरी पसन्द का खाना नहीं बनाया तो मैं मुंह फुला कर अपने कमरे में चला गया था।

सन्नी लिख ही रहा था तभी दरवाजे की घंटी बजी। सन्नी ने फटाफट अपनी चिठ्ठी तकिए के नीचे छिपा दी और दरवाजा खोलने चला गया। बाहर सन्नी के दादा जी खड़े थे। वो अन्दर आ गए और बोले कि उसकी मम्मी को ग्लूकोज लग रहा है, ब्लड़ प्रेशर बहुत कम है। एक घण्टे में उसके पापा खिचड़ी लेने आएंगे। चाची बनाकर तैयार रखेगी। सभी ने हामी की मुद्रा में गर्दन हिला दी। चाची मम्मी की बीमारी के कारण कुछ दिनों के लिए यहां आर्इ हुर्इ हैं, पर चाची को अपने बेटे नमन के अलावा कोर्इ दिखता ही नहीं, सन्नी से तो वो सीधे मुंह बात ही नहीं करती। कल मैगी बनार्इ और चाकलेट केक बनाया तो सारा अकेले ही नमन ही खा गया। सन्नी सोच रहा था कि मम्मी होती तो उसका कितना ख्याल रखती। सन्नी ने दादाजी को बताया कि उसकी चाची अभी बाजार गर्इ हुर्इ है। आने वाली होगी।

दादाजी अपना न्यूज चैनल लगा कर बैठ गए। सारा घर कितना गंदा हो रहा था। उसकी मम्मी सारा दिन घर कितना साफ रखती थी। सन्नी अपनी बात मम्मी तक चिठ्ठी के माध्यम से पहुंचाना चाह रहा था। उसे डर लग रहा था कि वो जल्दी से चिठ्ठी लिखे, और वो उड़ कर उसकी मम्मी तक पहुंच जाए और मम्मी उसको माफ करके ठीक होकर जल्दी से घर आ जाए।
सन्नी की मम्मी सन्नी को बहुत प्यार करती थी। पर जबसे सन्नी आठंवी क्लास में आया है तभी से कुछ बदल गया है। सीधे मुंह बात नहीं करता, उलटे सीधे जवाब देता, मम्मी कोर्इ घर का काम कहती तो साफ मना कर देता। मम्मी ने कर्इ बार प्यार से तो कर्इ बार गुस्से से समझाया पर उसने कभी समझने की कोशिश नहीं की। लेकिन आज शायद मम्मी को अस्पताल तक ले जाने का दोषी शायद वो खुद ही है।
सन्नी जल्दी से चिठ्ठी लिख कर मम्मी तक पहुंचाना चाहता था। वो चाह रहा था कि जब अस्पताल में मम्मी के लिए खिचड़ी जाए तो वो चिठ्ठी भी चली जाए। उसकी चाची भी बाजार से आ गर्इ थी और बर्तनों की उठा-पटक तेज हो गर्इ।
सन्नी अपने कमरे में गया और तकिए के नीचे से चिठ्ठी निकाली ………….. कमरे में चला गया था। उसने आगे लिखना शुरू किया …………. मम्मी, आपने बहुत मनाया और रात को होटल से खाना मंगवाने का वायदा भी किया पर मैं मुँह बना कर ही पड़ा रहा और उसी शाम मैंने आपके पर्स से पाँच सौ रूपये चुरा लिए थे। आप तो मेरे ऊपर शक कर ही नहीं सकती थी और काम वाली बाई तुलसी को आपने काम से निकाल दिया। वो बेचारी रोती रही कि उसने चोरी नहीं की ……….। उसके बाद आपने दूसरी कामवाली भी नहीं रखी और मैंने भी आपको सच्चार्इ नहीं बतार्इ। एक बार संजय अंकल आए थे तो मैंने उनकी सिग्रेट भी पी थी पर थोड़ी सी।
जब आप हर रोज सुबह मुझे स्कूल जाने के लिए उठाती, मुझे दूध देती और मेरे बालों को सहलाती तो मुझे बड़ा गुस्सा आता कि क्या है, सुबह-सुबह मेरी नींद खराब कर देती हैं ……….. काश मम्मी की तबियत ही खराब हो जाए ताकि न मुझे दूध पीना पड़े और न ही स्कूल जाना पड़े। सारा दिन घर पर मजे से बैठ कर टी.वी. देखूं। पर मम्मी, सच, आज आपको अस्पताल गए चार दिन हो गए हैं। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि चालीस दिन हो गए हैं।

मम्मी, आपकी बहुत याद आ रही है अब प्लीज, घर आ जाओ। मेरी सारी गलतियों की सजा पिटार्इ करके दे दो। सन्नी के लिखे अक्षर धुंधले हो गए। पर वो जल्दी से चिठ्ठी लिखकर उसे मम्मी तक पहुंचाना चाह रहा था इसलिए उसने फटाफट आँसू पोंछे और लिखना जारी रखा।
मम्मी, मैं आपसे माफी मांगता हूं और वायदा करता हूं कि जितना प्यार से आप मुझसे बात करती हो उससे भी ज्यादा प्यार से रहूंगा आपका कहना मानूंगा और आपके हाथ से सुबह-सुबह दूध पी पीऊंगा। मम्मी पता है आज मैं मंदिर भी गया था वहां से चरणामृत पीकर आपकी तबियत की भगवान से विनती की कि हे भगवान जी, मेरी मम्मी को फटाफट ठीक कर दो।
तभी आवाज आर्इ कि उसकी चाची ने सारा सामान टोकरी में रख दिया है। सन्नी के पापा भी घर आ गए थे बोले कुछ तबियत ठीक है। उसने फटाफट कागज मोड़ कर उस पर ‘सिर्फ मम्मी के लिए लिख दिया और प्लेट के नीचे नैपकिन के ऊपर अपनी चिठ्ठी को धड़कते दिल से रख दिया। मम्मी का हँसता चेहरा बार-बार उसे नज़र आ रहा था।
पापा जल्दी में थे और चले गए। सन्नी डर रहा था। मम्मी पढ़ेगी तो क्या सोचेगी ……….. अगर उस चिठ्ठी को किसी और ने पढ़ लिया तो ……….!!
पर अब कुछ नहीं हो सकता था चिठ्ठी जा चुकी थी। सन्नी को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने इतनी जल्दी में चिठ्ठी क्यों दे दी। ना नीचे ढ़ंग से अपना नाम लिखा। बिना खाना खाए अपना कमरा ठीक करके वो चुपचाप सो गया। चाची एक बार उससे खाने का पूछने आर्इ लेकिन उसके मना करने पर उन्होंने दुबारा उससे पूछा नहीं। बस, अब सन्नी मन ही मन चाह रहा था कि मम्मी जल्दी घर आ जाए …………. तो वो कभी भी मम्मी को तंग नहीं करेगा। उधर उसे चिठ्ठी का भी डर लग रहा था कि मम्मी उसके बारे में क्या सोचेंगी। वो मन ही मन चाहने लगा कि मम्मी वो कागज देखे ही नहीं और खाना वापिस आने पर वो उस चिठ्ठी को फाड़ कर फैंक देगा। और हमेश के लिए अच्छा बच्चा बन जाएगा। यह बात भी बिल्कुल सच है कि उसकी मम्मी बहुत प्यार करती थी और जब वो बतमीजी से बोलता, कहना नहीं मानता तो वो उसकी बातें दिल से लगा लेती उधर से काम वाली बार्इ के जाने के बाद वो सारा काम खुद करने लगी। टैन्शन और काम के बोझ से अचानक उनकी तबियत बिगड़ गर्इ और अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। आज सन्नी को महसूस हो रहा था कि वो मम्मी के बिना  कुछ भी नहीं। पापा तो काम में ही व्यस्त रहते हैं और दादी-दादा गाँव में रहते हैं चाची-चाचा दूसरे शहर में रहते हैं।
यहीं सोचते-सोचते वो सो गया। शाम को आँख खुली तो पापा की आवाज आ रही थी कि अस्पताल में उन्होंने खाना नहीं खाया। पर तबियत बेहतर है शायद कल घर ही आ जाए। सन्नी उठ कर बाहर भागा। उसने टोकरी में देखा तो चिठ्ठी वैसी ही रखी मिल गर्इ शायद किसी ने पढ़ी ही नहीं थी। सन्नी ने फटाफट टोकरी से वो चिठ्ठी निकाल कर उसे अपनी अलमारी में छिपा दिया। सोच कि समय मिलने पर फैंक दूंगा।
मम्मी कल घर आ जाएगी तो आज घर का माहौल कुछ हलका था। सन्नी सभी से बात कर रहा था और चाची के साथ घर की सफार्इ भी करवा रहा था। उसमें एक नया जोश भरा था।
बड़ी मुश्किल से दिन बीता। दोपहर को मम्मी घर आ गए। वो बहुत कमजोर लग रही थीं। सन्नी ने मम्मी को फल काट कर दिए। शाम को मम्मी के पास ही लेटा रहा था। एक-दो दिन में चाची और दादा जी भी चले गए थे। मौका मिलते ही उसने वो चिठठी भी फाड़ कर फैंक दी थी। मम्मी अब काफी ठीक होने लगी थी।

पर एक बात सन्नी को कभी पता नहीं लगेंगी कि उस दिन मम्मी ने उसकी चिठ्ठी पढ़ ली थी लेकिन सन्नी को महसूस तक नहीं होने दिया ताकि उसे दुख न हो कि उनके बेटे ने कितने गलत काम किए हैं। पर अब उसने गलती सुधार ली है और वायदा किया है तो उनके लिए यही बहुत था। उस दिन अस्पताल में चिठ्ठी पढ़ने के बाद उनसे खाना नहीं खाया गया और सन्नी की बाल सुलभ भावनाओं को समझते हुए चिठ्ठी उसकी जगह पर रखकर उन्होंने वापिस भिजवा दी थी। घर में ये बात किसी को भी पता नहीं चली।
अब सब ठीक है। सन्नी अच्छा बच्चा बन गया है। मम्मी का कहना मानता है और स्कूल में किसी से झगड़ा नहीं करता। सन्नी खुश है कि मम्मी ने उसकी चिठ्ठी नहीं पढ़ी और मम्मी खुश है कि सन्नी ने चिठ्ठी में अपनी सारी गलितयों को मानकर माफी माँग ली है और अब वो सुधर रहा है। तुलसी ने भी काम पर आना दुबारा से शुरू कर दिया। सन्नी ही उसे लेकर आया। मम्मी के पूछने पर सन्नी ने बताया कि जब आपकी तबियत बिल्कुल ठीक हो जाएगी तब दुबारा हटा देना। मम्मी ने सब जानते-बूझते उससे कुछ नहीं कहा और मेरा अच्छा बेटा कहकर उसे बाँहों में ले लिया।

बाल कहानी अहसास …. कहानी आपको कैसी लगी… आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है 🙂

June 16, 2015 By Monica Gupta

जवाब लाजवाब

जवाब लाजवाब

उफ़………….. इनकी हाजि़र जवाबी

हाजिरजवाबी अनूठी कला है, जब इसमें हास्य व्यंग्य का मिश्रण हो जाए तो मजा दुगुना हो जाता है और अगर यह हास्य व्यंग्य विश्व प्रसिद्ध हस्तियों का हो तो कहना ही क्या……..।
इस लेख में हम कुछ विश्व प्रसिद्ध हस्तियों के चुटीले अंदाजो से आपको रूबरू करवा रहे हैं।

सरोजनी नायडू
भारत कोकिला सरोजनी नायडू को कौन नही जानता। एक प्रखर राजनैतिक कार्यकर्ता, संवेदनशील कवयित्री और देश की स्वतंत्रता ही जिनका उददेश्य था। वो समय-समय पर हल्की-फुल्की टिप्पणियाँ करने से बाज नही आती थी। एक बार वो किसी सम्मेलन में गर्इ। वहाँ फोटो खीचने के लिए फोटोग्राफरों की लार्इन लग गर्इ। तब उन्होनें उनसे कहा, चलो भर्इ, जल्दी करो। मैं सब ओर से एक जैसी ही हूँ, मोटी और गोल-मटोल।

मार्च 1947 में जब वो प्रथम एशिआर्इ संबंध सम्मेलन के प्रतिनिधियों की बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित की गर्इ तो हाल खचाखच भरा हुआ था। वो उठी। भीड़ का जायजा लिया और बोली कि इस अपार भीड़ को देखकर मैं इतनी भावुक हो उठी हूँ कि मेरे मुहँ से आवाज ही नही निकल पा रही है। किसी महिला के मुहँ से आवाज ना निकलना कोर्इ मामूली बात नही है।

एक बार एक राजनैतिक कार्य के सिलसिले में गोपाल कृष्ण खोखले श्यामवर्णी नायडू से मिले और सोचा कि उनके रंग पर उन्हें खिजाया जाए। अत: उन्होने मुस्कुराते हुए चुटकी ली,  क्या आप मृत्यु के इतनी निकट पहुँच गर्इ हैं कि उसकी परछार्इयों ने आपकी ऐसी रंगत बना दी है। सरोजनी उनका मतलब समझ गर्इ। मगर वह बिल्कुल नही झिझकी और हँस कर बोली,  नहीं मैं जीवन के इतने निकट आ गर्इ हूँ कि उसकी तपिश ने मुझे झुलसा दिया है।

विनोबा भावे
विनोबा भावे ने स्वयं को निर्धनों और शोषितो से जोड़े रखा। उन्होनें भूदान आंदोलन के जरिए सामाजिक सुधारो को नर्इ दिशा दी। सौम्य और मृदुभाषी विनोबा अपनी नपी तुली टिप्पणियों की बदौलत स्वयं को विवादो से दूर ही रखते थे। एक बार कुछ पत्रकार विनोबा जी का साक्षात्कार लेने उनके आश्रम गए। विनोबा जी ने उनका सत्कार किया और पत्रकारों के प्रश्न का जवाब  देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन उन्होंने माँग रखी कि पहला प्रश्न वो पूछेंंगें। पत्रकार सोचने लगे कि आखिर विनोबा जी के मन में क्या है। तब विनोबा ने उनसे पूछा कि वो किस भाषा में अपने दिए गए प्रश्नों के उत्तर की अपेक्षा करतें हैं। पत्रकार जानते थे कि आचार्य भाषाविद हैं। उन्होनें निश्चय किया कि भाषा के चयन का निर्णय वे खुद ही लें। पर सभी पत्रकार जड़वत रह गये जब आचार्य ने उत्तर दिया कि उनकी नजर में सर्वोतम भाषा मौन भाषा है। और शांत भाव से आश्रम में टहलने लगे।

सर सी.वी. रमन

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सर सी.वी. रमन को कौन नही जानता। उन्होनें प्रकाश के संगठन और व्यवहार पर नया सिद्धांत खोज निकाला, जिसे रमण प्रभाव के नाम से जाना गया। इस विशिष्ट खोज की 25वीं जयंती के अवसर पर वो पैरिस गए हुए थे। वहाँ कुछ फ्रांसीसी वैज्ञानिको ने इस मौके पर भव्य समारोह का आयोजन किया। वर्दी में सजे-धजे बैरे अतिथियों को मनपसंद पेय पेश कर रहे थे। एक बैरा रमण के पास आया और उसने शैम्पेन भरे गिलासो की ट्रे उन की ओर बढ़ा दी लेकिन रमण ने उसे नही लिया। बार-बार उन्होनें विनम्रता से इंकार किया कि वह पीते नही है लेकिन फिर सोचने लगे कि उन्हें इस इंकार का कोर्इ कारण अवश्य बताना होगा। इसी उधेड़बुन में लगे थे कि जल्दी ही उन्हें अपनी समस्या का समाधान मिल गया। उनके पास खड़ी एक महिला ने अपने साथी को बताया कि यह प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर सी.वी. रमण हैं। यह रमण प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। बस, यह बात सुनकर जो दोस्त उन्हें पीने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, वह उनकी ओर मुडे़ और बहुत सौम्यता से बोले,  मित्रों, आपने अल्कोहल पर रमण प्रभाव अवश्य देखा होगा पर मैं आपको रमण पर अल्कोहल प्रभाव देखने का अवसर कभी नही दूँगा। उनके इस विनोदपूर्ण जवाब  से लोगों में हँसी के फव्वारे फूट गये।

अल्बर्ट आइंस्टीन

 

albert einstein photo

Photo by Smithsonian Institution

अल्बर्ट आइंस्टीन भौतिकी के क्षेत्र में हुए सभी आधुनिक विकासों के श्रेय के हकदार हैं। अपने बारे में उन्होंनें कुछ पत्रकारों और फोटोग्राफरों के बारे में कहा कि वो अजायब घर में रखने लायक वस्तु हैं। वह मुख्यधारा से छिटक कर बाहर गिर गए हैं। फोटोग्राफरों द्वारा विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें खींचने के बाद उनसे उनके व्यवसाय के बारे में पूछा गया तो उन्होंनें तपाक से जवाब दिया कि वो तो माड़ल का काम ही कर रहें हैं, तरह-तरह के पोज़ में फोटो खिचवा कर। उनसे जब उनकी खोज के बारे में जनप्रतिक्रिया की राय पूछी गयी तो उन्होंनें कहा कि अगर मेरा सिद्धांत सफल रहा तो जर्मन दावा करेंगें कि मैं एक जर्मन हूँ। और सिवस कहेंगें कि मैं एक सिवस हूँ। किन्तु यदि असफल रहा तो सिवस कहेंगें कि मैं जर्मन हूँ और जर्मन कहेंगें कि मैं एक यहूदी हूँ।
एक बार आइंस्टीन के बेटे ने उनसे पूछा कि वो इतने प्रसिद्ध कैसे हैं। इस पर उन्होंनें कहा कि  बेटे, एक बार एक अंधा कीड़ा फुटबाल पर चलने कि कोशिश कर रहा था उसे यह नही मालूम था कि वो गोल है। मगर इस मामले में मैं भाग्यशाली निकला, यह बात मेरे ध्यान में आ गर्इ।
एक बार आइंस्टीन ने फोटोग्राफर ए.डब्लयू रिचडऱ्स से मजाक में कहा  मुझे अपने चित्रों से नफरत है। यदि इनकी वजह न होती…….. फिर अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए बोले कि इनकी वजह न होती तो वो………. एक औरत नज़र आते।

जवाब लाजवाब

अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग
पेनिसलिन की खोज के लिए प्रसिद्ध अलैक्जैंड़र फ्लेमिंग मितभाषी व्यकित थे। एक बार वो बंदरगाह के निकट होटल में ठहरे जहाज को पानी में तैरते देख रहे थे। उन्हें वो दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन भूख तेज़ लगने के कारण वो भोजनकक्ष की ओर चल पड़े। तभी सामने से दो पत्रकार आ रहे थे। उन्होंनें अदब से नमस्ते करके यह पूछना चाहा कि जब एक महान वैज्ञानिक नाश्ते के लिए जा रहा हो तो उसके मन में क्या विचार उमड़ते हैं। फ्लेमिंग ने भी अपनी मुद्रा गम्भीर कर ली और बोले कि विचार तो बहुत उमड़ते हैं। पत्रकार भी अपने पैन लेकर तैयार हो गए कि शायद कोर्इ ऐसी बात सुनने को मिले जो कल की सुर्खियाँ बन सकें। फ्लेमिंग ने कहा कि वो वाकर्इ में इस समय विशेष बात ही सोच रहा हूँ। यह खबर आपके लिए किसी वरदान से कम नही होगी……..। लेकिन जल्दी ही उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। उत्तर मिला, मैं एक विशेष बात सोच रहा हूँ कि मैं नाश्ते में कितने अंडे़ खाँऊ……… एक या …… दो………

जवाब लाजवाब

June 16, 2015 By Monica Gupta

झंडा उंचा रहे हमारा

झंडा उंचा रहे हमारा

 

indian flag photo

Photo by Darshan Simha

 

हमारा तिरंगा
बच्चों, मैं भारत की शान हूँ। तीन रंग लिए मैं सभी को निराला और मन भावन लगता हूँ। पता है, मैं हूँ कौन? जी हाँ, मैं हूँ भारत देश का ध्वज, यानि झण्ड़ा।
जब भी आप मुझे लहराते-फहराते देखते होंगे तो आपके मन में विचार जरूर उठता होगा कि आखिर मेरा जन्म कब कहाँ और कैसे हुआ। आज मैं आपको अपने सफर की कहानी सुनाता हूँ। मेरा रूप जैसा आप आज देखते हैं ऐसा नहीं था। मुझमें समय-समय पर बहुत बदलाव आए पर अब मेरी पहचान बन चुकी है। विदेशों में अनेक झण्ड़ों के बीच में मैं शान से इठलाता हूँ। पता है, 29 मर्इ, 1953 को मैं एवरेस्ट पर लहरा रहा था। मेरी कहानी कोर्इ एक दिन या एक समय की छोटी सी कहानी नहीं है। मेरा मस्तक ऊँचा रखने के लिए हजारों वीर सैनिकों ने बलिदान दे दिया। अपना खून पानी की तरह बहा दिया पर मेरी शान कम ना होने दी।
आपने रामायण या महाभारत तो जरूर पढ़ी होगी। उस समय की पताका या झण्ड़ा यानि मैं लम्बे त्रिभुज आकार में था। मेरे ऊपर भगवान सूर्य का चित्र अंकित रहता था। लंका में भी अलग प्रकार का झण्ड़ा फहराया जाता था। संस्कृत में भगवान विष्णु की पूजा में लिखे एक श्लोक को गरूड़ ध्वज कहा गया जबकि गीता में अर्जुन के ध्वज को कपि ध्वज के नाम से जाना गया। समय-समय मेरे रूप में परिवर्तन आता रहा। अंग्रेज़ी राज्य द्वारा स्थापित सरकारी भवन व मुख्य स्थानों पर यूनियन जैक फहराने लगा। बीसवीं सदी के शुरू में जब देशवासियों की कुछ आँखें खुली। अंग्रेज़ी अत्याचारों से जनता तंग आ चुकी थी। पता है, भारत का पहला झण्ड़ा 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौराहे पर फहराया गया। तब मुझमें तीन रंग लाल, पीला और हरा थे। लाल रंग वाले भाग में आठ सफेद कमल थे। बीच वाले पीले रंग पर नीले रंग में वन्देमातरम लिखा था। नीचे हरे भाग पर बायीं तरफ सफेद सूर्य और दायीं ओर आधे चन्द्रमा के बीच एक तारा बना हुआ था।
मैड़म कामा के दिमाग  में देश के लिए झण्ड़ा तैयार करने का विचार आया। जो झण्ड़ा उन्होंने बताया उसमें केसरिया, सफेद तथा हरा रंग रखा गया। पता है, केसरिया भाग में कमल तथा सात नक्षत्र थे। वन्देमातरम को विशेष लोकप्रियता मिली हुर्इ थी। बंकिम चन्द्र चटर्जी जोकि बगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार थे उन्होंने वन्देमातरम की रचना 1882 र्इ0 में की थी। समय धीरे-धीरे चल रहा था कि अचानक जलियाँवाला बाग के घटनाक्रम ने मेरा रूप ही बदल दिया। सन 1923 में झण्ड़े रंग-रूप, आकार का ध्यान रखा गया। मेरी लम्बार्इ और चौड़ार्इ में तीन और दो का अनुपात रखा गया। तीन रंग लाल, हरा, तथा सफेद रखा गया। सफेद रंग पर चरखे को अंकित किया गया। मुझ पर चरखा इस कारण लगाया गया क्योंकि गाँधीजी स्वदेशी प्रचार कर रहे थे। खददर को उस समय विशेष मान्यता दी गर्इ थी। सिर्फ चरखा ही लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकता था। इसलिए चरखे को मुझ पर अंकित करवाने की विशेष मान्यता मिली। अभी बात कुछ बननी शुरू ही हुर्इ थी कि सन 1923 में मर्इ महीने में नागपुर के वासी ने रोक दिया। बस तब काफी कहा-सुनी हुर्इ और झण्ड़ा सत्याग्रह का आरम्भ हो गया। 18 जुलार्इ 1923 को झण्ड़ा सत्याग्रह दिवस मनाने की घोषणा हो गर्इ थी और पता है इस आन्दोलन के कर्णधार कौन थे- लौह पुरूष सरदार वल्लभ भार्इ पटेल।
मेरे बारे में अनेको गीत लिखे गए जो उन लोगों के लिए प्रेरणा बने जो चाहते थे कि भारत आजाद हो, स्वतंत्र हो। समूचे राष्ट्र का एक ही लक्ष्य बन गया था कि यूनियन जैक के स्थान पर जब मैं फहरूंगा वही दिन हमारा सर्वश्रेष्ठ दिवस होगा। वीरों की मेहनत रंग लार्इ। 26 जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाने की परम्परा पणिड़त जवाहर लाल नेहरू द्वारा आरम्भ की गर्इ। फिर मुझमें काफी बदलाव आए। चरखे का रूप छोटा कर दिया गया। हर रंग विशेष सूचक बना दिया गया। सन 1933 र्इ0 में मुम्बर्इ में एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि मेरा रंग तिरंगा ही होगा और 3 गुणा 2 का आयताकार होगा और मेरे तीन रंग भगवा, श्वेत तथा हरा होगा। 30 अगस्त,1933 र्इ0 का दिन ध्वज दिवस के रूप में मनाया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भी यह साबित कर दिया कि राष्ट्रीय ध्वज ही किसी देश के गौरव का चिन्ह है और मेरा सम्मान ही देश का सम्मान है।
22 जुलार्इ 1947 र्इ0 को मुझे नया रूप प्रदान किया गया। अनुपात भी पहले वाला था, रंग भी तीन थे किन्तु सफेद रंग पर बने चरखे के स्थान पर चक्र अंकित कर दिया गया। यह चक्र सारनाथ के स्तम्भ से लिया गया जोकि लगभग ढ़ार्इ हजार से भी पहले अशोक ने बनवाया था। इसी स्तम्भ के ऊपर बनी शेरों की त्रिमूर्ति राज्य चिन्ह के रूप में स्वीकार की गर्इ।
चक्र में चौबीस रेखाएं हैं। इनका अभिप्राय चौबीस घण्टों से बताया गया है। दिन-रात, चौबीस घण्टे हम अपने कार्यों  में लगे रहे यही प्रेरणा हमें चक्र देता है। दूसरी ओर चक्र का अर्थ हम गतिशीलता से भी लगा सकते हैं। जहाँ एक ओर सफेद रंग को विद्वानों ने सादा जीवन उच्च विचार का प्रतीक माना है वहीं हरा रंग विश्वास का प्रतीक है जोकि मनुष्य की अनिवार्य अच्छार्इ है। हरियाली को भी हरे रंग में माना गया है। मुझ में हरे रंग को इसलिए भी स्थान मिला है क्योंकि भारत कृषि प्रधान देश है। केसरिया रंग की प्रेरणा से ही वीरों में, नौजवानों में त्याग और बलिदान की ललक बढ़ी थी।
सच, मैं किसी राज्य या वर्ग का ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का हूँ। मैं जहाँ भी लहराऊंगा उन सभी को स्वतंत्रता, प्रेम और भार्इचारे का सन्देश देता ही रहूंगा।
झण्ड़ा ऊंचा रहे हमारा
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

जय हो                         जय हो                                            जय हो

June 16, 2015 By Monica Gupta

हम और हमारी नकारात्मक सोच

हम और हमारी नकारात्मक सोच

be positive photo

Photo by h.koppdelaney

कल ही हमारे मित्र विदेश से लौटे. उनको रिसीव करने हम भी एयर पोर्ट गए.वहाँ कार मे बैठ्ने से पहले उन्हे मिठाई खिलाई तो उन्होने उसका रैपर कोई कूडा दान ना दिखाई देने की वजह से सड्क पर ना डाल कर अपनी जेब मे ही डाल लिया. जबकि हमारे ही भारतीय मित्रो ने खुद तो मिठाई के रैपर को जमीन पर ही फेंक दिया और हसँते हुए अपने मित्र को सलाह देने लगे कि भई, यह तो भारत है यहाँ सब कुछ होता है यहाँ क्या सोचना … पूरी सडक अपनी है कही भी फेंक दो … बे वजह जेब क्यो खराब करनी है …उस समय तो मैं चुप रही पर वापिस लौट्ते वक्त यही सोचने लगी कि सारे आरोप सरकार पर लगा कर हम निशचिंत होकर बैठ जाते है कि सरकार ये नही कर रही वो नही कर रही बिना यह जाने कि हम क्या कर रहे है यह हमारी नकारात्मक सोच नही तो क्या है. अगर हम सभी अपना अपना फर्ज़ समझ ले तो क्या नही हो सकता.
हम विदेशो की बात करते हैं कि वहा कठोर कायदे कानून है वहाँ सफाई रखनी जरुरी होती है नही तो फाईन लग जाता है वगहैरा वगहैरा . पर उसके मुकाबले हम यहा क्या कर रहे हैं सिवाय कोसने के कि हम कितने गंद मे रह रहे हैं …
और तो और बार बार मना किया जाता है कि गाडी चलाते समय सीट बेल्ट बाँध ले. हम मे से कितने बाधँते है. हाँ , अगर सामने चैकिंग़ हो रही होगी तो फाईन के चक्कर मे फटाफ़ट लगा लेग़ें … गाडी चलाते समय मोबाईल का इस्तेमाल भी नही करने की सलाह दी जाती है. पर हम तो महान है ना सबसे व्यस्त आदमी है अगर बात नही की तो लाखो का नुकसान जो हो जाएगा. हाँ, अगर कोई ट्क्कर वक्कर हो गई तो दोष अपना नही मानेग़ें …
अगर हम अपनी नकारात्मक सोच हटा कर सकारत्मक सोचेगे और समाज मे रहते हुए नियमो का पालन करेगें तो हमारा देश भी आदर्श देश बन सकता है.
यही बात काफी हद तक मीडिया पर भी लागू होती है वो समाज को सच्ची दिशा दिखा सकता है पर उसकी सोच भी कम नही है मार पिटाई, खून खराबा, अन्धविश्वास, फालतू की फिल्मी खबरो आदि से भरी रहती है खबरे पर जब बात आती है कुछ ऐसी खबरो की जिनसे समाज मे चेतना आए … वो तो गायब ही रहती है अब ताजा उदाहरण ही है कि एक स्कूली बच्चे ने एवरेस्ट पर जीत हासिल की और सबसे कम उम्र का विजेता बन गया कोई बच्चो का खेल नही था कि वो ऐसे ही चढ गया पर वो खबर भी ना के बराबर रही. जब मैं कुछ बच्चो का इंटरवयू लेने पहुची कि उन्हे यह जान कर कैसा लगा कि उनकी ही उम्र का अर्जन ऐवरेस्ट को जीत कर लौटा है. उन्हे तो हैरानी हुई क्योकि इस बात की जानकारी ही नही थी उन बच्चो को कि ऐसा भी हुआ है अब भला बताओ कि समाज के सामने अगर उदाहरण ही नही रखे जाएगे तो समाज तरक्की कैसे करेगा सिर्फ क्राईम से तो गाडी नही चलेगी ना.

हम और हमारी नकारात्मक सोच
हम सभी को एक दूसरो पर दोष डालने की बजाय खुद को अच्छा बनाना होगा अपनी सोच सकारात्मक रखनी होगी अच्छे उदाहरण समाज के सामने रखने होग़ॆं ताकि उनका अनुकरण किया जा सके. इसमे आपसे अच्छी भूमिका तो कोई निभा ही नही सकता …

हम और हमारी नकारात्मक सोच

June 10, 2015 By Monica Gupta

Blood Donors -blood donors list

Blood Donors -blood donors list

Blood Donors भगवान का दूसरा रुप होते हैं. स्वैच्छिक रुप में रक्तदान करने से अच्छी कोई अन्य समाज सेवा हो ही नही सकती… क्या आप हैं रक्तदाता …

Blood Donors -blood donors list

कुछ समय पहले किसी परिचित का फोन आया कि मथुरा या अलीगढ मे एक महिला को ओ नैगेटिव रक्त की जरुरत है उस महिला की सर्जरी होनी है. मैने तुरंत नम्बर खोजे.राजस्थान के भीलवाडा से राजेद्र माहेश्वरी जी की मदद से मथुरा में रक्तदाता से सम्पर्क तो हुआ पर बात नही बनी और महिला को आनन फानन अलीगढ ले कर जाना पडा. वहां ओ नैगेटिव का कोई ऐसा रक्तदाता जानकारी मे नही था इसलिए चाह कर भी सहायता नही हो पाई.

क्या आप हैं रक्तदाता 

एक पोस्ट में मैने अलग अलग राज्यों के कुछ ऐसे ही लोगो के नम्बर मांगें थे जो रक्तदान के क्षेत्र मे बहुत काम कर रहे हैं ताकि रक्तदाताओ का एक ऐसा नेट वर्क बनें कि कम से कम हमारा समाज मे इतना तो योगदान हो कि रक्त की कमी से कोई जिंदगी का साथ न छोडे.

 

Blood Donors -blood donors list

Blood Donors -blood donors list

Blood Donors

मुझे इस बात की बहुत खुशी भी है जब मैने यह अभियान शुरु किया तब मात्र चार नाम थे और उसके बाद राजस्थान के भीलवाडा, सूरत गढ, भरतपुर, हनुमान गढ व छ्तीस गढ के कोरबा , महाराष्ट्र के चालीस गांव, Rishikesh, मुम्बई,  पंजाब में पटियाला, सूरत, दिल्ली व इंदौर से ऐसे लगभग 50 रक्तदाताओं से सम्पर्क हुआ कि उन्होनें विश्वास दिलाया कि जहां तक सम्भव होगा वो किसी को रक्त की कमी से जान से हाथ नही धोने देंगें.

और आज भोपाल और पूना से भी रक्तदाता जुडे और यही विश्वास दिलाया कि कही भी अगर रक्त की जरुरत पडे तो वो इंतजाम करवा कर रहेंगें …

मेरे लिए इतना सुनना ही बहुत था. पर अभी भी बहुत रास्ता बाकि है… पर खुशी है कि लोग बहुत अच्छे मिल रहे हैं … अगर आप अपने शहर मे किसी ऐसी शख्सियत को जानते हैं या आप खुद ही हैं तो जरुर बताए !!!

 

Blood Donors भगवान का दूसरा रुप होते हैं. स्वैच्छिक रुप में रक्तदान करने से अच्छी कोई अन्य समाज सेवा हो ही नही सकती… क्या आप हैं रक्तदाता …

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रक्तदान और अमिताभ बच्चन

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