Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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July 9, 2015 By Monica Gupta

मुद्दे ही मुद्दे

मुद्दे ही मुद्दे

इतने सालों से सोनी चैनल पर CID चला आ रहा है हमें शायद हमें इसलिए अच्छा लगता  है कि आज क्राईम हुआ सीआईडी आई और देखते ही देखते जांच हुई और अगले ही पल रिपोर्ट सामने और फिर कैदी सलाखों के पीछे. पर हकीकत ये नही है हकीकत वो है जो हम आप हर रोज देखते है… आज मर्डर हुआ कम से कम दस दिन जांच मे लगेगें और इस बीच आरोपी पर क्या यातना बीतेगी उसकी कोई चिंता नही.

हमारे देश मे जांच टेस्ट  सैंटर इतने कम है कि रिपोर्ट  आते आते मामला ही ठंडा पड जाता है..

दूसरा नुक्स है हमारी कछुए की चाल चलती न्याय प्रणाली .. बीस बीस साल हो जाते हैं तारीख पर तारीख … बस …

तीसरा हमारी जुगाड संस्कृति … रिश्वत का कितना भी विरोध करें हम जुगाड हमेशा से ही हमे प्रिय रहा है..

चौथी बात है मीडिया … तेज और तेज खबर दिखाने के चक्कर में  भिन्नभिन्नाती मक्खियों की उपाधि मिल जाती है… पता नही वो क्यो भूल जाती है कि जरुरत उनसे ज्यादा जनता को है लेकिन मारी मारी भागी भागी दौडती भागती रहती है …

फिर बात आती है महिला सुरक्षा की … मुद्दे बहुत है जिन पर हमें,  मीडिया को, नेता को, सरकार को, प्रशासन  को उठाना चाहिए क्योंकि इन्हें दूर किए बदला  आना सम्भव नही ….

man thinking photo

Photo by taufiq @ eyecreation

 

 

July 9, 2015 By Monica Gupta

Clean India

clean india by monica gupta

Clean India

बात ज्यादा पुरानी भी नही है जब स्वच्छ भारत अभियान शुरु हुआ था. शुरुआती दौर अच्छा था … सब सडको पर आते थे फोटू करवाते … कुछ तो और भी महान थे कूडा खुद ही लेकर आते सडक पर गिराते फोटू करवाते ,मीडिया को बुलवाते और हो जाता स्वच्छ अभियान … निसंदेह अभियान अच्छा था पर कम जागरुकता और ढुल मुल प्रशासन का रवैया और बात बात पर आखं दिखा कर हडताल करवाने वाले स्वच्छ भारत के जमादार …

आज आलम ये है कि स्वच्छता अभियान मे सफाई करते करते अभियान ही साफ हो कर रह गया …

 

Clean India

 

July 9, 2015 By Monica Gupta

गुस्सा अच्छा है

cartoon commentator

गुस्सा अच्छा है

पता नही अकसर लोग कहते मिलते जाते हैं कि गुस्सा नही करना चाहिए. गुस्सा सेहत के लिए अच्छा नही होता वगैरहा वगैरहा. पर गुस्सा तो अच्छा है. सच में, बहुत अच्छा है.

अब घर की ही बात करें तो घर पर कई बार आपको लगता होगा कि आज चपाती बहुत मुलायम बनी है जोकि अकसर नही बनती है या आज कपडे बहुत साफ धुले है जोकि अक्सर साफ नही धुलते.ये सब गुस्से की ही महिमा है कि गुस्सा आटा गूंथते समय या कपडे धोते समय निकाला जाता है और नतीजा हमारे सामने होता है.

गुस्सा करने से सेहत अच्छी रहती है वो इसलिए कि जब हमे बहुत ज्यादा गुस्सा आता है तब खाना खाने का मन नही करता.मुहँ फुला कर चुपचाप लेट जाते है.एक तरह से उपवास ही हो जाता है. हाँ, पानी जरुर ज्यादा पी लेते है. भई, किसी तरह पेट तो भरना ही है ना.

एक बात और कि शांति बहुत हो जाती हैं.सास बहू या पति पत्नी सब चुप हो जाते है. यहाँ तक की टीवी भी बंद कर दिया जाता है नाराजगी दिखाने के लिए गुस्से में.

नाखूनो की कटाई हो जाती है क्योकि गुस्से मे हम अपने नाखूनो को चबाने लगते है.

हाँ, गुस्से मे भगवान का नाम बहुत लिया जाता है कि भगवान के नाम पर अब बस चुप करो . ओम शांति.गुस्सा जाने के बाद खुद पर हंसी बहुत आती है वो भी अच्छी बात है. सबसे बडी बात जब तक आग हमारे सीने मे नही होगी हम जीत नही पाएगे. अगर किसी ने चैंलज कर दिया को तुम डाक्टर या पत्रकार किसी कीमत पर नही बन सकते. बस यही बात एक आग बन जाती है और गुस्से मे ही सही हम वो बन कर दिखाते है.. अब आप को गुस्सा आ रहा है कि लेख अच्छा नही लगा तो आप इस पर कमेंट लिखेग़ें फिर मैं उसका जवाब  दूंगी फिर आप दुबारा लिखेगें इसी बहाने आपका लेखन भी सुधर जाएगा और आप टवीटर या फेसबुक पर लिख कर जाने माने कमेंटेटर बन सकते हैं …तो  सोचना क्या गुस्सा अच्छा है ना…

कैसा लगा आपको ये गुस्सा … मेरा मतलब ये लेख … जरुर बताईगा 🙂  और अगर इसी को लेकर आपके अपने अनुभव हो जो हमसे सांझा करना चाहे तो भी आपका स्वागत है …

July 7, 2015 By Monica Gupta

हिंसक होते बच्चे

हिंसक होते बच्चे

कई बार लगता है कि बच्चो की गुस्सैल और हिंसक होती प्रवृति के जिम्मेदार और कोई नही हम खुद ही है. कारण भी एकदम ठोस है. असल में, बदलते समय के साथ साथ हमारी करनी और कथनी मे फर्क आता गया जो हम महसूस ही नही कर पाए और बच्चे इस बदलाव को सह नही पाए.

 

kids fighting photo

Photo by Tony Fischer Photography

यकीनन हम बच्चो को किताबी पाठ पढाते रहे कि सदा सच बोलो . ईमानदारी का जीवन अपनाओ. बडो का आदर करो. नकल करने से जीवन मे कभी सफल नही होगे.पर हकीकत मे हम उनके आगे कुछ और ही परोसते रहे.

मसलन, अकसर झूठ बोलने पर हम ही उन्हे उकसाते हैं.पाठ ईमानदारी का पढाते हैं और आफिस से रिश्वत या तो ले कर आते हैं या उनके सुखद भविष्य के लिए दे कर आते हैं और तो और परीक्षा हाल मे बच्चो को नकल मारने के लिए सदा उत्साहित करते हैं ताकि कही अच्छी जगह दाखिला होने मे कोई दिक्कत ना आए.

जुगाड संस्कृति से हमेशा बच्चो को जोडे रखना चाहते हैं ताकि कोई दूसरा बच्चा उसको काट करके आगे ना निकल जाए. बडो का आदर करने का पाठ तो पढा देते हैं पर हम घर पर अपने ही बडे बुजुर्गो से ऊची आवाज मे बात करते हैं.

ऐसे मे अगर हम अपनी गलती मान लें तो कोई छोटे नही बन जाएगे.बच्चो का सही मार्गदर्शन हमारा पहला और आखिरी कर्तव्य होना चाहिए….

कैसा लगा आपको ये लेख हिंसक होते बच्चे …. जरुर बताईएगा 🙂

July 7, 2015 By Monica Gupta

बीमार का हाल

बीमार का हाल

sick lady in hospital  photo

Photo by Internet Archive Book Images

मेरी एक जानकार बहुत बीमार थी. काफी समय अस्तपाल मे भी रही. छुट्टी मिली और घर आ गई. मैने फोन करके मिलने को कहा तो उसने बेहद शालीनता से मना कर दिया.

उसने कहा कि कुछ ही दिनों की बात है वो ठीक हो जाएगी तब वो खुद ही फोन कर देगी. तब जरुर आना. बातो बातों मे उसने बताया कि मिलने वाले बीमार की नही अपनी सहूलियत के हिसाब से आते और धंटों बैठ कर गप्पे भी मारते और चाय वाय पी कर आराम से जाते हैं.

एक रिश्तेदार तो इसलिए नाराज हो कर चले गए कि उसने खाने को नही पूछा.. बीमारी करके वैसे ही किसी का हंसना बोलना अच्छा नही लगता …  ये तो लोगो को सोचना चाहिए … अगर उसने मुझे बुला लिया   और दूसरों को मना कर दिया तो भी सब बुरा मान जाएगे …. इसलिए मना कर रही हूं …

सभी को मना किया है. प्लीज बुरा मत मानना…!!!

मैने बिल्कुल बुरा नही माना बल्कि बहुत सही है…  अस्पताल में तो टाईम फिक्स होते हैं पर घर पर फिक्स नही कर सकते..  वाकई में लोग अपनी सहुलियत देख कर ही आते हैं और एक बार आकर आराम से  बैठ जाते हैं …

अब मैं उसके जल्दी से ठीक होने की प्रार्थना कर रही हूं ताकि उससे मिल सकूं…

वैसे आप भी अगर किसी बीमार से मिलने जाते होंगें तो कम समय ही लगाते होंगे .. है ना … अगर नही तो जरा नही बहुत सोचने की दरकार है क्योकि बीमार का हाल अच्छा नही है … !!!

July 7, 2015 By Monica Gupta

बढता काम्पीटिशन

बढता काम्पीटिशन

thinking future photo

Photo by lindaaslund

आजकल काम्पीटीशन इतना बढ गया है कि बहुत विचार विमर्श चलता रहता  है कि बच्चे को कौन सा क्षेत्र दिलवाया जाए. द्फ्तर मे बास का बेटा इंजीनियर है एक बार तो मन आता है कि ये पढाई सही है.

शर्मा जी का विचार है कि डाक्टरी भी बुरी नही है घर मे एक डाक्टर हो तो अच्छा रहता है. पर जब लाल बत्ती वाली ग़ाडी देखते हैं तो मन करता है कि बच्चा सरकारी अफसर ही बने. बडा सा घर हो. नौकर चाकर आगे पीछे घूमे.

वही एक एक चैनल के  reporter को देख कर कभी कभी मन करता है कि TV पर आए news पढे और मशहूर हो जाए…

वही पडोस के मियाँ जी कहते हैं कि बच्चे को सीधा विदेश भेज दो. वहाँ पढाई भी करेगा और कमाई भी. उधर दादी ने रट लगा रखी है कि बचपने मे उनका मन था कि वो singer बने पर अपना शौक तो पूरा नही कर पाई अब अपनी पोती को गायिका बनाना चाह रही है कि वो रिएल्टी शो मे गाए और वो उसके साथ टीवी पर जाए.

उन्होने तो साडी और ज्वैलरी भी डिसाईड कर ली जो वो उस शो मे पहन कर जाएगी. समझ नही आ रहा कि किस की बात माने .

जी क्या कहा आपने?? … बच्चे से पूछ लें कि वो क्या चाहता है. कमाल करते है आप. जिंदगी का इतना बडा फैसला बच्चे पर कैसे छोड दें. उसे भले बुरे की समझ ही कहा है…. रहने दे आप. हम खुद ही सोच लेगे.

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