Monica Gupta

Writer, Author, Cartoonist, Social Worker, Blogger and a renowned YouTuber

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July 6, 2015 By Monica Gupta

Best Wishes- Happy New Year

 

best wishes photo

Photo by Sandie Edwards

Best Wishes- Happy New Year

आओ विश करें

नया साल शुरु होता नही कि सकंल्पो की बौछार शुरु हो जाती है. अच्छी बात है सकंल्प लेने कोई बुराई नही है पर कम से कम उसकी लाज तो रखनी चाहिए. हर बात को टालने के अभ्यस्त हम फिर टाल देते है कि कुछ समय और ठहर जाते हैं. कर लेगें, हम कौन सा भागे जा रहे हैं. सोच तो लिया है ना बस …

इन दिनो वैसे एक चिंता और भी हम लोगो मे पाई जाती है और वो है शुभकामनाएं देना. असल में, देने मे कोई परेशानी नही है पर देनी किस किसको हैं ये परेशानी का विषय बन जाता है उसका सबसे मुख्य कारण है हर साल हमारी जिंदगी मे नए लोगो का आवागमन होता रहता है या फिर जो लोग पिछ्ले साल बहुत काम आए इस साल इनकी महत्ता उतनी नही रही.  तो ज्यादा कंफ्यूजन से बचने के लिए मैने बिना समय गवाएं चार कैटेगिरी बना ली.

1 धक्के से
2 मजबूरी से
3 जरुरी से
4 दिल से

आप सभी इस बात से इत्तेफाक रखते होग़े कि कई बार कुछ शुभकामनाएं ना चाह्ते हुए धक्के से फोन करके हमे देनी पडती हैं. मसलन अपनी ससुराल मे या फिर अपने मकान मालिक को जो हमे फूटी आखँ ही नही सुहाता. समय की नजाकत को भापँ कर जीती मक्खी निगलनी ही पडती है.

अब बात मजबूरी की आती है.अब मेरी बात से आप इंकार कर ही नही सकते कि भले ही हमारी सम्पादक से जान पहचान हो ना हो पर उसे शुभकामनाएं भेजेगे जरुर.(भई, नही तो हमारा लेख कैसे छपेगा)ऐसे ही जिन से हमे हमारा काम निकलवाना है,पैमैंट निकलवानी है चाहे वो सरकारी नौकरी मे ही हो.चाहे वो कितने ही भाव ही क्यो ना खा रहा हो हमारा फोन ना उठा रहा हो पर हमे भी ढीठ बन कर लगातार उसे फोन मिलाते ही रहना है. जब तक वो फोन न उठा ले उसके बाद चाहे हमे कितना ही समय लगे उन्हे बताने मे कि हम कौन बोल रहे हैं. इसी का नाम मजबूरी है.
अब बारी आती है जरुरी से की. मेरे हिसाब से ये वाकई मे जरुरी है उन लोगो को शुभकामनाएं देने की जो जाने अंजाने सारे साल किसी ना किसी रुप मे हमारे काम आते हैं जैसे कि डाक्टर, गैस बुक करने वाले, बैंक मे काम करने वाले जो जाते ही हमारा सारा काम ना सिर्फ जल्दी निबटवा देते है बल्कि चाय भी पिलाते हैं. उधर गैस वाले तुरंत सप्लाई भेज देते हैं. वही अपने डाक्टर साहब भले ही फोन पर कितना ही व्यस्त क्यो ना हो वो हमे देखते ही फोन का चोंगा रख देते हैं. बच्चो की ट्यूशन सर या क्लास टीचर को भी बहुत जरुरी है शुभकामनाएं देना क्योकि सारे साल उन्होने ही तो ख्याल रखना है बच्चों को अच्छे अकं देने मे.

अब बात आती है दिल से की. ये आवाज दिल से ही निकलती है.अब भला जो हमारे साथ दफ़्तर मे कंधा मिलाकर काम करे मोना, रोजी पिंक आदि उन्हे तो विश करना बनता ही है न और जो सोशल नेट वर्क की साईट पर हैं उन्हे तो और भी ज्यादा और जल्दी विश करना हमारा हक बनता है.कही वो नाराज ना हो जाए या हमसे पहले कोई दूसरा की ना बाजी मार ले जाएं. वही दूसरी तरफ बास की माता जी का स्थान है भले ही बास को विश करे ना करे पर इनकी माता श्री या पत्नी श्री को दिल से प्रणाम करने को मन करता है. भई, आप भले ही कुछ भी समझे पर नौकरी मे तरक्की की चाह तो आपको भी होगी. है ना. तो मै आपसे अलग थोडे ही ना हूँ.
तो कुल मिला कर बताने का तात्पर्य़ ये है कि हमे संकल्प लेने की बजाय फोन करने वालो की लिस्ट मे ज्यादा जोर देना चाहिए ताकि हमारा आने वाला समय सुखद और मगंलमय हो.
आप हमारे प्रिय पाठकगण हैं तो आपकी जगह दिल से वाले कालम मे ही है आप सभी को  ढेर सारी शुभकामनाएं.

ये लेख Best Wishes आओ विश करें   कैसा लगा जरुर बताईगा …  🙂

June 24, 2015 By Monica Gupta

बाल कहानी

बाल कहानी

  100रभ की 6तरी

( अंको को शब्दों के साथ जोड़कर कहानी का आनन्द लें)

2पहर के समय बर7 शुरू हो गर्इ। स्कूल से लौटते समय 100रभ ने अपनी कमीज की आस् 3 ऊपर कर ली थी। उसने पिताजी को बहुत बार 6तरी लाने को कहा था पर वो टाल देते थे। आज उसका जन्मदिन है पर उसकी 100तेली माँ ने उसे अभी तक बधार्इ भी नही दी। जब उसने स्कूल में अपने 2स्तों को यह बात बतार्इ तो वह उल्टे ही 100रभ के कान भरने लगे कि 100तेली माँ के आ4-वि4 अच्छे नही होते। वह हमेशा बच्चों में 2ष ही निकालती हैं और अत्या4 करती हैं। कर्इ बार तो उन्हें 6ड़ी से भी पीटती है। कर्इ बार तो बच्चे इतने ला4 हो जाते है कि घर से भागने की 9बत ही आ जाती है।

स्कूल की छुटटी के बाद वह सोचता हुआ जा रहा था कि 100तेली माँ से उसकी कभी अनबन भी नही हुर्इ पर आज उन्होनें बधार्इ क्यों नही दी। क्या वो भी उसे घर से निकाल देंगीं? लगता है, अब तो पिताजी भी उसे प्यार नही करते। 6तरी भी शायद इसीलिए नही लाकर दे रहे हैं। इसी सोच में उसे रास्ते में 1ता दीदी मिली। वो हमेशा वे2 के बारे में अच्छी-अच्छी बातें बताया करती थी। उन्होनें उसके घर का समा4 जाना और 2राहें पर से अपने घर चली गर्इ। वो 6मियाँ राम जी की 2ती थी। उसके और 100रभ के पिताजी बहुत अच्छे 2स्त थे। 1ता दीदी के पिताजी 9सेना में 9करी करते थे और 100रभ के पिता सवार्इ मानसिंह में रोगियों का उप4 करते।

यही सोचते-सोचते उसका घर आ गया और उसने ड़रते-ड़रते दरवाजे़ पर 10तक दी पर दरवाज़ें खुला था। कमरे में किसी की आहट ना पाकर वो चुपचाप अपने कमरे में चला गया। उसकी हैरानी की कोर्इ सीमा नही रही जब उसने अपनी 4पार्इ पर 100गात रखी देखी। 100गात खोलने पर उसमें सुन्दर सी 6तरी मिली। जैसे ही उसने पलट कर देखा तो उसकी माताजी और पिताजी जन्मदिन की बधार्इ ताली बजा कर दे रहे थे। उस समय तीनों की आँखें नम थी।

आज का दिन 100रभ के लिए ढ़ेरो खुशियाँ लेकर आया था। उसे अपनी माँ का प्यार मिला। माँ ने बताया कि शाम को तोहफा देकर चौंका देना चाहते थे। इसीलिए सुबह बधार्इ नही दी। अब उसके मन में कोर्इ शंका नही थी कि मम्मी पापा उसे बहुत प्यार करतें हैं। अपनी नर्इ 6तरी लेकर वो 2स्तों को दिखाने बाहर भागा। बाहर धूप निकल आर्इ थी और सुन्दर सा इन्द्रधनुष सुनहरी 6ठा बिखेर रहा था।

umberella photo

Photo by oatsy40

रोचक बाल कहानी 100रभ की छतरी

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई कहानी

आपको कैसी लगी … जरुर जरुर बताईगा 🙂

June 17, 2015 By Monica Gupta

बाल कहानी अहसास

 

 writing on paper photo

बाल कहानी अहसास

प्रिय मम्मी,

मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपको क्या और कैसे लिखूं पर मुझे माफ कर दो। मेरी उन गलतियों की जोकि मैंने की और आपको तंग किया। आप आज अस्पताल में मेरी ही वजह से हैं, लेकिन सच मानो, मेरा न तो कोर्इ गन्दा दोस्त है और न ही मैं इंटरनेट या टी.वी. देखकर बिगड़ा हूं। मुझे खुद भी नहीं पता कि मैं ऐसा क्यों हो रहा हूं। वैसे तो मैंने बहुत गलतियां की हैं पर कुछ एक के लिए मैं ………………!आपको याद होगा कि एक दिन आपने मुझसे बार-बार पूछा था कि चुप-चुप क्यों हूं। असल में मैंने जानबूझ कर अनिल को बाल मारी थी। उसे आँख के नीचे सात टांके लगे थे। नोटिस मिला कि आपको बुलाया है तो मैंने झूठ-मूठ अपनी तरफ से ही लिख दिया कि मैं बीमार हूं इसलिए आ नहीं सकती। आपके सार्इन भी कर दिए थे। झूठ के हस्ताक्षर किये थे ना इसलिए डर रहा था कि सच्चार्इ पता लगेगी तो मैं फँस ही ना जाऊँ। एक बार जब आपने मेरी पसन्द का खाना नहीं बनाया तो मैं मुंह फुला कर अपने कमरे में चला गया था।

सन्नी लिख ही रहा था तभी दरवाजे की घंटी बजी। सन्नी ने फटाफट अपनी चिठ्ठी तकिए के नीचे छिपा दी और दरवाजा खोलने चला गया। बाहर सन्नी के दादा जी खड़े थे। वो अन्दर आ गए और बोले कि उसकी मम्मी को ग्लूकोज लग रहा है, ब्लड़ प्रेशर बहुत कम है। एक घण्टे में उसके पापा खिचड़ी लेने आएंगे। चाची बनाकर तैयार रखेगी। सभी ने हामी की मुद्रा में गर्दन हिला दी। चाची मम्मी की बीमारी के कारण कुछ दिनों के लिए यहां आर्इ हुर्इ हैं, पर चाची को अपने बेटे नमन के अलावा कोर्इ दिखता ही नहीं, सन्नी से तो वो सीधे मुंह बात ही नहीं करती। कल मैगी बनार्इ और चाकलेट केक बनाया तो सारा अकेले ही नमन ही खा गया। सन्नी सोच रहा था कि मम्मी होती तो उसका कितना ख्याल रखती। सन्नी ने दादाजी को बताया कि उसकी चाची अभी बाजार गर्इ हुर्इ है। आने वाली होगी।

दादाजी अपना न्यूज चैनल लगा कर बैठ गए। सारा घर कितना गंदा हो रहा था। उसकी मम्मी सारा दिन घर कितना साफ रखती थी। सन्नी अपनी बात मम्मी तक चिठ्ठी के माध्यम से पहुंचाना चाह रहा था। उसे डर लग रहा था कि वो जल्दी से चिठ्ठी लिखे, और वो उड़ कर उसकी मम्मी तक पहुंच जाए और मम्मी उसको माफ करके ठीक होकर जल्दी से घर आ जाए।
सन्नी की मम्मी सन्नी को बहुत प्यार करती थी। पर जबसे सन्नी आठंवी क्लास में आया है तभी से कुछ बदल गया है। सीधे मुंह बात नहीं करता, उलटे सीधे जवाब देता, मम्मी कोर्इ घर का काम कहती तो साफ मना कर देता। मम्मी ने कर्इ बार प्यार से तो कर्इ बार गुस्से से समझाया पर उसने कभी समझने की कोशिश नहीं की। लेकिन आज शायद मम्मी को अस्पताल तक ले जाने का दोषी शायद वो खुद ही है।
सन्नी जल्दी से चिठ्ठी लिख कर मम्मी तक पहुंचाना चाहता था। वो चाह रहा था कि जब अस्पताल में मम्मी के लिए खिचड़ी जाए तो वो चिठ्ठी भी चली जाए। उसकी चाची भी बाजार से आ गर्इ थी और बर्तनों की उठा-पटक तेज हो गर्इ।
सन्नी अपने कमरे में गया और तकिए के नीचे से चिठ्ठी निकाली ………….. कमरे में चला गया था। उसने आगे लिखना शुरू किया …………. मम्मी, आपने बहुत मनाया और रात को होटल से खाना मंगवाने का वायदा भी किया पर मैं मुँह बना कर ही पड़ा रहा और उसी शाम मैंने आपके पर्स से पाँच सौ रूपये चुरा लिए थे। आप तो मेरे ऊपर शक कर ही नहीं सकती थी और काम वाली बाई तुलसी को आपने काम से निकाल दिया। वो बेचारी रोती रही कि उसने चोरी नहीं की ……….। उसके बाद आपने दूसरी कामवाली भी नहीं रखी और मैंने भी आपको सच्चार्इ नहीं बतार्इ। एक बार संजय अंकल आए थे तो मैंने उनकी सिग्रेट भी पी थी पर थोड़ी सी।
जब आप हर रोज सुबह मुझे स्कूल जाने के लिए उठाती, मुझे दूध देती और मेरे बालों को सहलाती तो मुझे बड़ा गुस्सा आता कि क्या है, सुबह-सुबह मेरी नींद खराब कर देती हैं ……….. काश मम्मी की तबियत ही खराब हो जाए ताकि न मुझे दूध पीना पड़े और न ही स्कूल जाना पड़े। सारा दिन घर पर मजे से बैठ कर टी.वी. देखूं। पर मम्मी, सच, आज आपको अस्पताल गए चार दिन हो गए हैं। लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि चालीस दिन हो गए हैं।

मम्मी, आपकी बहुत याद आ रही है अब प्लीज, घर आ जाओ। मेरी सारी गलतियों की सजा पिटार्इ करके दे दो। सन्नी के लिखे अक्षर धुंधले हो गए। पर वो जल्दी से चिठ्ठी लिखकर उसे मम्मी तक पहुंचाना चाह रहा था इसलिए उसने फटाफट आँसू पोंछे और लिखना जारी रखा।
मम्मी, मैं आपसे माफी मांगता हूं और वायदा करता हूं कि जितना प्यार से आप मुझसे बात करती हो उससे भी ज्यादा प्यार से रहूंगा आपका कहना मानूंगा और आपके हाथ से सुबह-सुबह दूध पी पीऊंगा। मम्मी पता है आज मैं मंदिर भी गया था वहां से चरणामृत पीकर आपकी तबियत की भगवान से विनती की कि हे भगवान जी, मेरी मम्मी को फटाफट ठीक कर दो।
तभी आवाज आर्इ कि उसकी चाची ने सारा सामान टोकरी में रख दिया है। सन्नी के पापा भी घर आ गए थे बोले कुछ तबियत ठीक है। उसने फटाफट कागज मोड़ कर उस पर ‘सिर्फ मम्मी के लिए लिख दिया और प्लेट के नीचे नैपकिन के ऊपर अपनी चिठ्ठी को धड़कते दिल से रख दिया। मम्मी का हँसता चेहरा बार-बार उसे नज़र आ रहा था।
पापा जल्दी में थे और चले गए। सन्नी डर रहा था। मम्मी पढ़ेगी तो क्या सोचेगी ……….. अगर उस चिठ्ठी को किसी और ने पढ़ लिया तो ……….!!
पर अब कुछ नहीं हो सकता था चिठ्ठी जा चुकी थी। सन्नी को खुद पर गुस्सा आने लगा कि उसने इतनी जल्दी में चिठ्ठी क्यों दे दी। ना नीचे ढ़ंग से अपना नाम लिखा। बिना खाना खाए अपना कमरा ठीक करके वो चुपचाप सो गया। चाची एक बार उससे खाने का पूछने आर्इ लेकिन उसके मना करने पर उन्होंने दुबारा उससे पूछा नहीं। बस, अब सन्नी मन ही मन चाह रहा था कि मम्मी जल्दी घर आ जाए …………. तो वो कभी भी मम्मी को तंग नहीं करेगा। उधर उसे चिठ्ठी का भी डर लग रहा था कि मम्मी उसके बारे में क्या सोचेंगी। वो मन ही मन चाहने लगा कि मम्मी वो कागज देखे ही नहीं और खाना वापिस आने पर वो उस चिठ्ठी को फाड़ कर फैंक देगा। और हमेश के लिए अच्छा बच्चा बन जाएगा। यह बात भी बिल्कुल सच है कि उसकी मम्मी बहुत प्यार करती थी और जब वो बतमीजी से बोलता, कहना नहीं मानता तो वो उसकी बातें दिल से लगा लेती उधर से काम वाली बार्इ के जाने के बाद वो सारा काम खुद करने लगी। टैन्शन और काम के बोझ से अचानक उनकी तबियत बिगड़ गर्इ और अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। आज सन्नी को महसूस हो रहा था कि वो मम्मी के बिना  कुछ भी नहीं। पापा तो काम में ही व्यस्त रहते हैं और दादी-दादा गाँव में रहते हैं चाची-चाचा दूसरे शहर में रहते हैं।
यहीं सोचते-सोचते वो सो गया। शाम को आँख खुली तो पापा की आवाज आ रही थी कि अस्पताल में उन्होंने खाना नहीं खाया। पर तबियत बेहतर है शायद कल घर ही आ जाए। सन्नी उठ कर बाहर भागा। उसने टोकरी में देखा तो चिठ्ठी वैसी ही रखी मिल गर्इ शायद किसी ने पढ़ी ही नहीं थी। सन्नी ने फटाफट टोकरी से वो चिठ्ठी निकाल कर उसे अपनी अलमारी में छिपा दिया। सोच कि समय मिलने पर फैंक दूंगा।
मम्मी कल घर आ जाएगी तो आज घर का माहौल कुछ हलका था। सन्नी सभी से बात कर रहा था और चाची के साथ घर की सफार्इ भी करवा रहा था। उसमें एक नया जोश भरा था।
बड़ी मुश्किल से दिन बीता। दोपहर को मम्मी घर आ गए। वो बहुत कमजोर लग रही थीं। सन्नी ने मम्मी को फल काट कर दिए। शाम को मम्मी के पास ही लेटा रहा था। एक-दो दिन में चाची और दादा जी भी चले गए थे। मौका मिलते ही उसने वो चिठठी भी फाड़ कर फैंक दी थी। मम्मी अब काफी ठीक होने लगी थी।

पर एक बात सन्नी को कभी पता नहीं लगेंगी कि उस दिन मम्मी ने उसकी चिठ्ठी पढ़ ली थी लेकिन सन्नी को महसूस तक नहीं होने दिया ताकि उसे दुख न हो कि उनके बेटे ने कितने गलत काम किए हैं। पर अब उसने गलती सुधार ली है और वायदा किया है तो उनके लिए यही बहुत था। उस दिन अस्पताल में चिठ्ठी पढ़ने के बाद उनसे खाना नहीं खाया गया और सन्नी की बाल सुलभ भावनाओं को समझते हुए चिठ्ठी उसकी जगह पर रखकर उन्होंने वापिस भिजवा दी थी। घर में ये बात किसी को भी पता नहीं चली।
अब सब ठीक है। सन्नी अच्छा बच्चा बन गया है। मम्मी का कहना मानता है और स्कूल में किसी से झगड़ा नहीं करता। सन्नी खुश है कि मम्मी ने उसकी चिठ्ठी नहीं पढ़ी और मम्मी खुश है कि सन्नी ने चिठ्ठी में अपनी सारी गलितयों को मानकर माफी माँग ली है और अब वो सुधर रहा है। तुलसी ने भी काम पर आना दुबारा से शुरू कर दिया। सन्नी ही उसे लेकर आया। मम्मी के पूछने पर सन्नी ने बताया कि जब आपकी तबियत बिल्कुल ठीक हो जाएगी तब दुबारा हटा देना। मम्मी ने सब जानते-बूझते उससे कुछ नहीं कहा और मेरा अच्छा बेटा कहकर उसे बाँहों में ले लिया।

बाल कहानी अहसास …. कहानी आपको कैसी लगी… आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है 🙂

June 16, 2015 By Monica Gupta

छुट्टियों की न करें छुट्टी

छुट्टियों की न करें छुट्टी ..
छुट्टी का नाम लेते ही चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान आ जाती है और अगर यही छुट्टियाँ महीने की हो तो.. बस फिर तो कहना ही क्या. अब गर्मी आ गई है और ये लाई है ढेर सारी छुट्टियाँ .
पूरी मौज मस्ती, आराम, नेट, पिक्च्चर,फोन, मोबाईल, मैसेज, दोस्त और भी ना जाने क्या क्या.

 

cartoon smile by monica guptaछुट्टियों की न करें छुट्टी
सच बात है, पर इस बात मे भी कोई दो राय नही कि जहाँ छुट्टियो मे बच्चो के चेहरे खुशी से चमक जाते हैं वही दूसरी ओर घर मे मम्मी का तनाव भी थोडा सा बढ जाता है.खासकर उनका जो गृहणी हैं क्योकि अपनी दिनचर्या मे तो वो सुबह बच्चो, बडो को स्कूल,कालिज और दफ्तर भेज कर कुछ पल अपने भी आराम के निकाल लेती थी टीवी देख लिया,फोन पर गप्पे लगा ली पर अब चौबीसो धंटे की धमा चौकडी मे आराम कहाँ.
छुट्टियो मे, बच्चो का एक छ्त्र राज हो जाता है. सुबह उठने का समय अजी मतलब ही नही कि समय पर उठ जाए और नाश्ता ले लें. 10 बजे तक तो सोना ही होता है जिसकी वजह से घर मे ना सफाई ढंग से हो पाती है और ना ही झाड पोछ और घर बिखरा बिखरा सा ही लगता है ऐसे मे मम्मी लोग का पारा चढना स्वाभाविक ही होता है. नाश्ते का समय सही नही हुआ तो लंच के समय की भी छुट्टी हुई समझो. और फिर उपर से बच्चो की फरमाईश कि ये खाना है वो खाना है यहाँ जाना है वहाँ जाना है. फिर बच्चो के दोस्त भी कम नही होते और अगर छुट्टियो मे मेहमान ना आए तो छुट्टी लगती ही नही. उफ …!!!!
और एक बात कि अगर घर मे एक बच्चे की छुट्टी हो और दूसरे बडे बच्चे की परीक्षा चल रही हो तो एक मस्ती और दूसरा pin drop silence चाहता है ऐसे मे आप सोच सकते है कि घर मे जबरदस्त तनाव का माहौल बन जाता है.
ऐसे मे आप छुट्टी की छुट्टी ना होने दें यानि घर पर अपने बडे से या मम्मी लोग से पूरा सहयोग करके चले.  धमाल,हल्ला गुल्ला शोर शराबा सब करें पर limit मे रह कर ही करें ना करने पर आपको सुबह सुबह से ही जो डांट पडनी शुरु होगी तो सारा दिन आपका भी कोप भवन मे बीतेगा और सभी सदस्यो को भी तनाव झेलना पड सकता है.

सभी का मूड off हो जाए तो वाकई मे छुट्टी की छुट्टी ना हो जाए घर पर कहना मान कर मिलजुल कर रहना पडेगा. मेहमान के आने पर बजाय खुद भी बैठ कर आर्डर करने के घर मे मदद करवाए .कभी मम्मी के लिए खुद उठ कर कुछ काम करे. और समय मिलने पर आराम से बैठ कर उनकी मदद ले ताकि आपका होमवर्क समय पर पूरा हो सके.
सबसे ज्यादा जरुरी बात ये है कि छुट्टियो मे summer camp या कोई भी hobby class join करें अपनी छुट्टी को व्यर्थ ना जाने दें. कुछ ना कुछ रचनात्मक जरुर ही करें.
अब आप यही कहेगे कि इतनी मुश्किल से तो छुट्टियाँ मिली है तो इसमे भी काम. पर यह काम आपकी आगे आने वाली जिंदगी मे बहुत काम आएगा इस बात का तो पक्का यकीन है और कौन सा आपको पूरा दिन ही उस काम मे लगे रहना है मुश्किल से एक या दो धंटे का होगा उस के बाद तो पूरा दिन आपका है आप जैसा चाहे उस का फायदा उठाए और अगर बिलकुल भी कुछ करने का मन नही है तो भी एक अच्छे बच्चे की तरह घर पर रहे या जहाँ भी रहने जाए वहाँ इतनी अच्छी प्रकार से रहे कि सभी आपके वापिस जाने के बाद आपको याद करे ना कि कन्नी काटे.
यकीनन काम मुशकिल जरुर है पर नामुमकिन नही है अगर आप प्यार देगे तो आपको प्यार ही मिलेगा वो भी ढेर सारा. इसलिए छुट्टियो मे खूब सारा enjoy करें और छुट्टी की छुट्टी ना होने दें.
जाते जाते एक चुटकुला …
एक बच्चा मच्छर उडना सीख रहा था. जब पहली बार उडा और लोगो के बीच मे पहुचां तो बहुत खुश हुआ और वापिस आकर अपने मम्मी पापा को बताया कि लोग तो मुझसे बहुत खुश हैं. मै जहाँ भी गया उन्होने मेरा स्वागत तालियाँ बजाकर कर किया ….

छुट्टियों की न करें छुट्टी

June 15, 2015 By Monica Gupta

काश मैं अध्यापक होता

काश मैं अध्यापक होता

 

cartoon arvind kejriwal by monica gupta

काश मैं अध्यापक होता

वैसे बचपन से सपने सभी देखते हैं कि मै बडा होकर ये बनूगां या वो बनूगां. तो जनाब, मेरा भी बचपन से सपना था कि काश मैं अध्यापक बनूं इसलिए नही कि मै पढने मे बहुत होशियार था. असल मे, आप से क्या छुपाना. मैंं पढाई मे बहुत कमजोर था पर दिक्कत की कोई बात नही थी क्योकि हमारे सर जी टयूशन मे पूरी मदद करते थे और हम भी समय समय पर उनके घर का छोटा मोटा काम करके जैसे कि जन्मदिन पर उपहार ले जाना, कपडे प्रैस करवा करवाना, जूता ठीक करवाना ,दर्जी से कपडे लाना या गैस बुक करवाना और अक्सर अपना गैस सिलेंडर ही दे आना वगैरहा वगैरहा करके उन्हे खुश रखते और हमे जाने अनजाने पेपर की जानकारी हो जाती और बिना पढे ही पास हो जाते और तो और कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जब पेपर चैक होने आते तो वो हमे पास बुला कर चुपचाप सारा पेपर लिखवा देते यानि पूरा सहयोग दोतरफा रहता.

शिक्षक की भूमिका

अब सर जी के इतने ऐशो आराम देख कर मन मे बचपन से ही इच्छा हिलोरे मारने लगी थी कि अगर कुछ बने तो टीचर ही बने और पूरी जिन्दगी आराम से बिताए क्योकि उन्हे ना तो स्कूल जाने की टेंशन और ना पैसो की क्योकि ट्यूशन से भरपूर कमाई थी.

क्या कुछ नही था उनके घर मे.सुख सुविधाओ का सारा सामान था.बच्चे अच्छे स्कूल के होस्टल मे पढ रहे थे . बस यही सब बाते दिल को छू गई और जब मैने अपनी दिल की बात सभी घर वालो को बताई तो घर के सभी लोग मेरा निणर्य सुन कर फूले नही समाए और जुट गए उसे पूरा करने मे.

अजी नही नही … पढाई और अच्छे अंक नही.बल्कि अच्छे सिफारिशी और खाऊ पीऊ नेता की तलाश में. बहुत जल्दी तलाश खत्म भी हो गई और कुछ सालो बाद मेहनत रंग लाई और मेरा सपना पूरा हुआ. पांच लाख रुपए देकर बात पक्की हो गई और मेरी पहली पोस्टिंग शहर से बहुत दूर के गांव मे सरकारी स्कूल के अध्यापक के तौर कर दी गई.

मै खुशी मे फूला ना समाया और अपना बोरिया बिस्तर लेकर नए सपने लिए गांव पहुंचा. सोचा था गांव के लोग स्वागत मे खडे होग़ें पर ऐसा कुछ नही हुआ बल्कि कुछ लोग इस इंतजार मे खडे थे कि कब मास्टर आए और पढाना शुरु करे. खैर पहला दिन था ना सोचा धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा.

अगले दिन कक्षा लेते हुए मैने ट्यूशन का जिक्र क्लास मे कर दिया कि कोई भी आ सकता है. अगले दिन पूरा गांव स्कूल मे इक्क़ठा हो गया और धमकी भी दे डाली कि खबरदार आगे से ट्यूशन का नाम भी लिया.जो पढाना है जितना पढाना है स्कूल के समय मे पढाओ और फिर भी नतीजा अच्छा ना आया तो आपकी खैर नही….!

मैने बडी मुश्किल से थूक गटका और कक्षा मे चला गया. पढाते पढाते मै सोचने लगा कि शायद पिछले कुछ सालो मे समय बहुत बदल गया है. खैर मैने हिम्मत नही हारी. अगले सप्ताह मैने धोषणा कर दी कि आने वाली 16 को मेरा जन्मदिन है पर हाय रे यहां भी किस्मत ने साथ नही दिया.कक्षा मे खडे होकर सभी बच्चो ने ताली जरुर बजा दी पर किसी एक बच्चे की तरफ से उपहार ….अजी मतलब ही नही.

खैर, एक दिन मैने एक बच्चे से कहा कि अपने घर का 5 किलो शुद देसी घी लेकर आना क्योकि शहरो मे तो मिलावट होती है ना. लडका सुबह सुबह घी ले आया और पीछे पीछे उसके पिता डंडा ले कर पहुंच गए कि घी के पैसे अभी दे दो क्योकि अक्सर बाद मे उन्हे याद नही रहता. मेरा तो सिर ही घूम गया. मरता क्या न करता. उसी समय रुपए देने पडे वो भी शहरी रेट से ज्यादा. मेरे पूछ्ने पर वो बोले कि शुद्द घी है खालिस है तो पैसे तो यकीनन ज्यादा लगेंगे ही.

उधर स्कूल मे स्टाफ ना के बराबर था. लगभग 200 बच्चो के स्कूल मे एक मैं और एक दूसरे अध्यापक और एक चपडासी था. अक्सर सरकारी काम कभी गणना तो कभी किसी दूसरे काम से हमारी डयूटी लग जाती तो दूसरे टीचर की क्लास भी लेनी पडती और कई कई बार तो चपडासी भी बनना पडता.

कभी गलती से किसी बच्चे से पीने के लिए पानी मंगवा लिया तो अगले दिन पूरा गांव इक्ट्ठा हो जाता कि हमारे बच्चे यहां पढने आते है ना कि यहां के चपडासी हैं. मै स्कूल मे 5 मिनट कभी देरी से पहुंचता तो गांव वाले गेट पर ताला लिए खडे रह्ते कि ऊपर शिकायत करगें कि मास्टर देरी से आते है और धमकी देते कि अगर आगे देरी से आए तो स्कूल को ताला ही लगा देगें.

मेरे तारे पूरी तरह गर्दिश मे चल रहे हैं.कभी किसी बच्चे ने अच्छा काम किया और मैने प्यार से सिर पर हाथ फेर दिया तो गांव वाले भडक लाते है कि बच्चे को छेड दिया. मास्टर का करेक्टर सही नही है और अगर किसी बच्चे ने सही काम नही किया और मैने गुस्सा कर दिया तो भी मुसीबत खडी हो जाती कि मास्टर पिटाई करता है.

कुल मिला कर मै हैरान परेशान हूं कि मैने टीचर बनने का सपना क्यो देखा. बार बार खुद को चिकोटी काट रहा हूं कि काश यह सब सपना ही हो पर अफसोस यह सच है सपना नही.

अब मुझे कैसे भी झेलना ही पडेगा. काश मैं अध्यापक होता … की बजाय यह कहना ज्यादा सही है कि काश मै अध्यापक “ना” होता.

काश मैं अध्यापक होता

काश मैं अध्यापक होता  आपको कैसा लगा … जरुर बताईएगा !!

June 10, 2015 By Monica Gupta

Mouth organ

Mouth organ … बहुत दिनों के बाद मणि का बेटा दो दिन के लिए घर आया. नाश्ते के बाद बेटे ने अपना बैग खोला और बोला आखॆं बंद करो आपके लिए कुछ है. फिर मणि के हाथ कुछ पकडा दिया. हाथ मे लेते ही मणि चौंक गई और आखें खोलती हुई बोली अरे !!! Mouth organ !! इतने साल हो गए .. इसका क्या करुगी.. भूल भाल गई हूं सब !!

बेटे ने कहा जब बचपन में आप हमे Mouth organ बजा कर सुनाती थीं तो आप खुद ही कहती थीं कि एक बार बजाना आ जाए तो जिंदगी भर नही भूल सकते .. मणि ने भी जानॆ अनजाने Mouth organ होठों से लगा लिया . वही मणि मुझे दिखाने लाई थी और डबडबाई आखें, खुशी … उससे कुछ बोला ही नही जा रहा था.

 

Mouthorgan  photo

Photo by Nina J. G.

मैं हाथ में mouth organ लिए ….उसकी तरफ देख कर सोचे जा रही थी….  बहने दे ये आसूं … .. सच, छोटी छोटी खुशियों में कितना सारा प्यार अपनापन और अहसास छिपा होता है

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छोटे बच्चों की सारी जिद मान लेना सही नही

Blogging Tips in Hindi

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